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ओबीसी की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन?

Published On :    14 Jun 2018   By : MN Staff
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जैसे जैसे देश में लोकसभा चुनाव 2019 का समय नजदीक आ रहा है वैसे ही दोनों दलों को सबसे याद ओबीसी की सता रही है क्योंकि इसी 52 प्रतिशत को बरगला दोनों ही पार्टियों की राजनीति कामयाब होती रही है। 


इस समय इन दोनों ही दलों की 52 प्रतिशत ओबीसी के लोगों की कुछ ज्यादा ही फिक्र हो रही है। जबकि चाहे सरकार कांग्रेस की रही हो या फिर भारतीय जनता पार्टी की रही हो इन दोनों ही पार्टियों ने अनुसूचित वर्ग के साथ-साथ पिछड़े वर्गों के साथ सबसे अधिक धोखेबाजी की है। 


आज यही दोनों पार्टियां ओबीसी की उपेक्षा का एक दूसरे के ऊपर दोषारोपण करके यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि सबसे अधिक ओबीसी की चिन्ता इन्हीं को सता रही है। जबकि ओबीसी के साथ सबसे अधिक धोखेबाजी कांग्रेस ने की है। 


जिसमें भरपूर सहयोग जनसंघ के रूप में बीजेपी ने दिया है। पहले प्रधानमंत्री पण्डित नेहरू ने सन् 1957 में सभी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को लेटर गोपनीय लेटर लिखा कि पिछड़े वर्ग के आरक्षण पर बिल्कुल ही अमल न किया जाय। 


आज वहीं कांग्रेस ओबीसी सम्मेलन करके ओबीसी से ज्यादा नजदीकी दिखाने का प्रयास कर रही है। वही काम भारतीय जनता पार्टी भी कर रही है। जिसने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा है कि ओबीसी की दुर्दशा के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है जिसने एक छत्र 57 वर्ष तक देश में राज किया है जिसके युवराज राहुल गांधी ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा है कि ओबीसी समुदाय के साथ सबसे अधिक अनदेखी भाजपा ने की है। 


दोनों ही दलों के इतिहास को आधार बनाकर विश्लेषण करें तो पता चलता है दोनों ही दलों ने पिछड़े वर्गों के साथ धोखेबाजी की है। इस देश में वास्तव में पिछड़े वर्गों की असली लड़ाई सबसे पहले डा. बाबासाहब अम्बेडकर ने लड़ी और बाबासाहब ही देश में ओबीसी के संवैधानिक जन्मदाता हैं ऐसा कैसे कहा जा सकता है जिस समय बाबासाहब अम्बेडकर ओबीसी के हिस्सेदारी का मेमोरण्डम सरकार पटेल के सामने लेकर गये तो सरदार पटेल ने तुरन्त सवाल खड़ा किया कि मि. अम्बेडकर ये ओबीसी कौन है? 


जिसके संवैधानिक अधिकारों की आप पैरवी कर रहे हैं बाबासाहब जैसी लीजेन्ट महापुरूष को सरदार पटेल का सवाल तुरन्त ही समझ आ गया और इस बात को ध्यान में रखकर बाबासाहब अम्बेडकर ने ओबीसी को हक और अधिकार देने के लिए मूलनिवासी बहुजन समाज में सबसे बड़े भाई ओबीसी के लिए 340 आर्टिकल की व्यवस्था की। 


इसके बाद अनुसूचित जाति के लिए 341 और अनुसूचित जनजाति के लिए 342 तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए 346 आर्टिकल की व्यवस्था की अनुसूचित वर्गों की गिनती होने के कारण उनके संविधान लागू होते ही अधिकार मिल गये लेकिन ओबीसी के लिए बने 340 आर्टिकल के तहत ही तत्कालीन जवाहर लाल नेहरू सरकार को एक कमीशन बनाने के लिए डा. बाबासाहब अम्बेडकर ने दबाव बनाया जिस पर अमल नहीं करने के कारण ही ओबीसी के अधिकारों के लिए बाबासाहब अम्बेडकर ने 10 अक्टूबर 1951 को कानूनमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था। 


पद छोड़ते ही जवाहर लाल नेहरू पर इतना अधिक दबाव आ गया कि पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी के लिए एक कमीशन नियुक्त करना पड़ा जिसको काका कालेलकर कमीशन के नाम से जाना जाता है।


इसी कमीशन ने ओबीसी की हिस्सेदारी का खाका तैयार करके रिपोर्ट जवाहर लाल नेहरू को सौंप दी जिससे उस रिपोर्ट पर संसद में चर्चा तक नहीं कराई बल्कि कालेलकर कमीशन के चेयरमैन से उसके खिलाफ लेटर लिखवाया और उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया। 


यह जवाहर लाल नेहरू की सबसे बड़ी धोखेबाजी थी पिछड़े वर्गों के साथ। उस समय डा. बाबासाहब अम्बेडकर हमारे बीच नहीं थे इसलिए पिछड़े वर्गों को हिस्सेदारी नहीं मिल सकी। लेकिन भारत के इतिहास में पिछड़े वर्गों की लड़ाई लड़ने वाला बाबासाहब के मिशन पर काम करने वाला संगठन आज भी उनकी लड़ाई को आगे बढ़ा रहा है उसकी मुहिम यानि जनजागृति का असर आज देश भर में ओबीसी में दिखायी दे रहा है कि अपने संवैधानिक हक एवं अधिकारों की लड़ाई के लिए ओबीसी में ललक जागृत हो रही है। 


और बामसेफ के माध्यम से ओबीसी वर्ग को यह मालूम चल रहा है कि आखिर हमारा असली दुश्मन कौन है? हमने जिन महापुरूषों के प्रति अनभिज्ञता दिखाई उन महापुरूषों ने हमारे लिए कितना संघर्ष और कष्ट सहन किया, यह पता चल रहा है जैसे जैसे उसे इन ब्राह्मणों के धोखेबाजी का पता चल रहा है वह ब्राह्मणों से दूरी बनाता जा रहा है। और एससी, एसटी, ओबीसी में आपसी समझ पैदा हो रही है।

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