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लोग हमारे, सोंच ब्राह्मणों की!

Published On :    14 Jun 2018   By : MN Staff
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‘सनातनी ब्राह्मण एवं प्रगतिशील ब्राह्मण एक शरीर की दो भुजाएं हैं’ यह विषय जब-जब हमारे सामने चर्चा के लिए आता है तब-तब हमारे दिलों-दिमाग में भ्रांति निर्माण करने के लिए जानबूझकर कुछ बातें बिठायी जाती हैं और जब ऐसी बातें हमारे सामने आती हैं तब भ्रांति निर्माण होती है। 


बहुत बार हमें यकीन होने लगता है और हम सोंचते हैं कि दूसरे लोग जो कुछ बोल रहे हैं, उसमें कुछ तथ्य हो सकता है, उन बातों की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। मगर होता यह है कि दूसरी साईड़ रखने वाले जो लोग हैं, उनके हाथ में मीडिया है, अलग-अलग चैनल्स हैं, किताबें लिखने का काम भी वहीं करते हैं। 


प्रवचनकार, संत-महंत भी उनके ही होते हैं, इसलिए उनकी तरफ से बड़े पैमाने पर विचारों का हमला होता है। वो दिन में बारह-बारह घण्टे हमारे दिलों-दिमाग पर अपने विचारों का हमला करते रहते हैं, इसलिए भ्रांति बड़े पैमाने पर चढ़ जाती है।


युवा वर्ग में खास कर नये-नये बने डाक्टर, प्रोफेसर, वकील, इंजीनियर, सरकारी अधिकारी, महत्वपूर्ण पदों पर काम करने वाले, आदि निर्णय प्रक्रिया में सहभागी होने वाले हमारे जो लोग हैं, उनके मन में भी दो कारणों से भ्रांति होती है। 


एक तो जिन कार्यालयों में हमारे लोग काम करते हैं उनके वरीष्ठ अधिकारी आमतौर पर ब्राह्मण या तत्सम ऊँची जाति के होते हैं इसलिए क्या उनका दिल दुखाया जाए? क्या उनके खिलाफ स्पष्ट रूप से टिप्पणी की जाए? आदि सवाल मन में निर्माण होते हैं। 


एक सवाल ऐसा भी निर्माण होता है कि यदि अपने (बॉस) अधिकारी का दिल दुखाते हैं तो हमारा ‘सीआर’ खराब होगा, हमें पूरे ऑफिस में ‘ब्लैक लिस्ट’ किया जाएगा, हमेशा हमारे ऊपर नजर रखी जाएगी, तो क्या ऐसा करने दिया जाए?


दूसरी तरफ ऑफिस में अपने इर्द-गिर्द दोस्त, सहकारी के तौर पर जो लोग काम करते हैं उनमें कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मिठी-मिठी बातें करते हैं, अच्छा बर्ताव करते हैं। सौम्य और मिठी बातों से हमेशा आदमी पिघल जाता है। क्योंकि अपनी तारीफ किसे अच्छी नहीं लगती?  


और हमारे लोग तो बहुत भोले होते हैं, उनकी कुछ इस प्रकार तारीफ की जाती है कि वे एक दम फुलने लगते हैं। और फिर उन्हें लगता है कि ‘ठिक है! चार-दो ब्राह्मण गलत हो सकते हैं किन्तु सभी को गलत कैसे कहा जाए? 


हमारे ही कुछ लोगों ने किसी मोह में या किसी लालच में ऊँची जाति की लड़की के साथ शादी की होगी तो उनकी स्थिति और भी ज्यादा नाजुक होती है। वह आदमी इस कदर सोचने लगता है कि ‘ठिक है! बाकी लोग शायद गलत हो भी सकते हैं लेकिन मेरा जिनके साथ ताल्लुक है वे तो बिल्कुल ही नहीं हो गलत सकते हैं और इस प्रकार ऐसे लोग जब समाज में चर्चा करते हैं तब वे परिवर्तनवादी कार्यकर्ताओं को कहते हैं कि आप एक साथ सभी लोगों पर क्यों टिका करते हैं? यह ठीक नहीं है। जब ऐसे लोगों को पूछा जाता है कि आपकी बिवी किस जाति की है? और जिसे यह सवाल किया जाता है, 


आमतौर पर उसकी बीवी ब्राह्मण या ऊँची जाति की होती है। जब उस व्यक्ति को पूछते हैं कि जहां आप नौकरी करते हैं वहां आपका अधिकारी कौन है, तब सही जवाब बाहर आता है। क्योंकि वह अपनी बोली नहीं बोलता। वह जो बोलता है मुंह उसका होता है, जुबान उसकी होती है, मगर उसका मस्तिष्ठ ब्राह्मणी होती है। वह तो केवल मात्र व्यक्त करने का काम करता है।


जब हम ब्राह्मणवाद की बात करते हैं, ब्राह्मणों की बात करते हैं, वर्ण व्यवस्था या जाति व्यवस्था की बात करते हैं तो हमारे सामने कुछ अनुभव है। एक बात तो यह है कि वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊपर ब्राह्मण हैं। उसके नीचे क्षत्रिय, उसके नीचे वैश्य, उसके नीचे शूद्र और अतिशूद्र।


ब्राह्मण जो सबसे ऊपर है वह केवल पद के लिए, प्रतिष्ठा के लिए उपर नहीं है, बल्कि जो निर्णय प्रक्रिया है, अहम फैसले लेने की जो जगह है वहां पर भी वे ही हैं। उनकी मान्यता सबसे ज्यादा है। उनकी तरफ लोगों का ध्यान जाता है। लोग सिर्फ उनके खिलाफ बातें करते हैं, उनके खिलाफ सोंचते हैं, इतना ही नहीं है। 


परिवर्तन की बातें करने वाले हम लोग उनके खिलाफ सोचते हैं, लेकिन हमें यह कड़वा सच भी कबुल करना होगा कि हमारे ही देश में, हमारे ही समाज में कई प्रतिशत लोग हैं और उनकी संख्या बहुत ज्यादा है कि वे ब्राह्मणों का आदर भी करते हैं, ब्राह्मणों का सम्मान भी करते हैं। ब्राह्मणों की तरफ एक आदर्श व्यवस्था के रूप में देखते भी हैं।


‘संस्कृतिकरण’ का एक सिद्धांत है। दक्षिण भारत के डा. श्रीनिवासन नामक एक समाजशास्त्री ने यह सिद्धांत हमारे सामने रखा है डा. श्रीनिवासन कहते हैं कि ‘जो निचले तबके का आदमी होता है वह अपने ऊपर के तबके के आदमी का अनुकरण करने की कोशिश करता है, उसकी तरफ जाने की कोशिश करता है, वैसा बनने की कोशिश करता है। 


वह जैसे रहता है, जैसी बातें करता है, उसका जैसे रहन-सहन है, उसकी अपनी जो भी लोकप्रिय बातें हैं उसकी तरफ जाने की, वैसा बनने की हर एक वर्ग, हर एक वर्ण कोशिश करता है।’


इस सन्दर्भ में यह बात महत्वपूर्ण है कि ब्राह्मणों का अनुकरण, ब्राह्मण बनने की कोशिश, ब्राह्मण का मॉडल निचे काम करने वाले क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रों और अतिशूद्रों के सामने है। भाषा कैसी होनी चाहिए? ब्राह्मणों जैसी होनी चाहिए। रहन-सहन और बर्ताव कैसा होना चाहिए? 


ब्राह्मणों जैसा होना चाहिए। हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो ब्राह्मणों का अनुकरण करते है। ब्राह्मणों का सम्मान करने वाले लोगों की संख्या हमारी तुलना में कई गुना ज्यादा है। इसलिए इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि जिनके खिलाफ हम बात कर रहे हैं वे न सिर्फ ताकतवर है बल्कि जिनके अन्दर हम काम करते हैं उनमें से बहुत सारे लोग उन्हें मानते हैं। 


इसलिए हमें गहरायी से यह भी सोचना होगा कि हजारों साल में उन्होंने जो काम किया उसका यह नतीजा है कि वे ऐसी जगह जा बैठे हैं कि उन्हें पवित्र माना जाता है, उन्हें सम्मान दिया जाता है, और हम अपने लोगों के हित की बात करने के बावजूद भी हमारे लोग हमसे इतना प्यार नहीं करते जितना ब्राह्मणों के लिए उनके दिलों दिमाग में प्यार है। 


उनको मानने वाला, उनकी तरफ देखकर जिने वाला बहुजन समाज में संख्यात्मक दृष्टि से और गुणात्मक दृष्टि से देखा जाए तो एक बहुत बड़ा वर्ग है, उनकी आबादी हमारी तुलना में बहुत ज्यादा है।


यदि ऐसी स्थिति है तो हमें इस बात पर भी सोचना होगा कि यदि ऐसी स्थिति है तो आखिर क्यों है? पहली बात यह है कि ब्राह्मण ने अपने मीडिया के द्वारा हजारों साल से इस बात को बार-बार लोगों को बताकर, फैलाकर लोगों के दिलों-दिमाग को तराशा है और लोगों ने भी उस बात को गहरायी से अपने अन्दर सम्मीलित कर लिया है। 


एक कारण तो यह है कि शिक्षा का अधिकार ब्राह्मणों के पास था और न सिर्फ शिक्षा लेने का, बल्कि शिक्षा देने का भी अधिकार था। शिक्षा देने वाले, बताने वाले, लिखने वाले वहीं थे, उनके द्वारा हजारों साल जिस बात को बताया गया, हमारी कई पीढ़ियें पर उसका असर हुआ। 


हम पिछले डेढ़ सौ साल से (महात्मा फुले से लेकर आज तक) काम कर रहे हैं लेकिन काम करने वाले हमारे लोगों की आजादी बहुत कम थी और हमें यह मानना ही होगा कि हजारों साल का हमारे लोगों पर जिन बातों का प्रभाव था वह एकाएक खत्म नहीं हो सकता। 


दस-बीस साल में वह खत्म नहीं हो सकता। उसे खत्म करने के लिए हमें ब

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