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जनजाति समूहों में बढ़ती जागृति से संघ में मची खलवली

Published On :    20 Jun 2018   By : MN Staff
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देश में अल्पसंख्यक यूरेशियन लोगों के वर्चस्व एवं व्यवस्था को प्रस्थावित करने के लिए अस्तित्व में आये संगठन आरएसएस में बामसेफ की जनजागृति का खौफ स्पष्ट रूप से असर दिखाई दे रहा है। जिसमें जनजातीय समूहों में बढ़ी जनजागृति से सबसे अधिक संघ में चिन्ता दिख रही है। 


क्योंकि संघ ने हमेशा ही इन समूहों को अपने व्यवस्था के समर्थन में इस्तेमाल किया है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि इन जनजातिय समूहों को शासक वर्ग ने पहले तो अपना गुलाम बनाने के लिए गरीबी भुखमरी यूरेशियनों ने झोंक दिया फिर इनकी गरीबी का फायदा उठाकर इन्हें लालच देकर संघ के जाल में फसाया और अपने हित में इस्तेमाल किया है। 


जिनमें अब बामसेफ भारत मुक्ति मोर्चा एवं ऑफसूट संगठनों तथा आदिवासी एकता परिषद के माध्यम से तेज गति से जानकारी बढ़ रही है जिनको अपने पुरखों के संघर्ष और कार्यों की जानकारी मिलने से उनके अन्दर आपसी समझ, भाईचारा का संचार हो रहा है तथा मूलनिवासी बहुजन समाज के हित चिंतक संविधान निर्माता डा. बाबासाहब अम्बेडकर के बेस कीमती त्याग और बलिदान के माध्यम से संविधान रूपी मिले मानवीय अधिकारों की जानकारी मिलने यह पता चल रहा है कि हमारा असली दोस्त और दुश्मन कौन है?


वे अपने हक एवं अधिकारों की लड़ाई के लिए किस हद तक तैयार हो रहे हैं इसका नजारा झारखण्ड में देखने को मिला। जहां पर सूबे की भाजपा सरकार के खिलाफ आदिवासी जनजातिय समूहों ने जिस एक जुटता का परिचय दिया जिसका नेतृत्व सेंगल अभियान के अध्यक्ष सलखान मुर्मू ने बामसेफ एवं भारत मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम के कुशल नेतृत्व से प्रेरणा लेते हुए सोमवार 18 जून 2018 को जनजातीय समूहों के खिलाफ सरकारी कदम का जिस तरीके से जोरदार तैयारी करके अमूतपूर्व ढंग से बन्द को सफल बनाकर सिद्ध कर दिया कि उन्होंने मूलनिवासी योद्धा वामन मेश्राम के नेतृत्व से समाज का नेतृत्व करने का हुनर सीख लिया है। 


जिस हुनर का प्रदर्शन बहुजन क्रांन्ति मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक वामन मेश्राम ने बहुजन क्रान्ति मोर्चा की राज्यव्यापी परिवर्तन यात्रा को फणनवीस सरकार के द्वारा मुम्बई में असंवैधानिक ढंग से रोकने पर परिचय दिया था जिससे पूरे महाराष्ट्र में आन्दोलन का माहौल बन गया था। ठीक उसी प्रकार का काम सलखान मुर्मू ने भी किया है जिसमें समाज के किसी भी व्यक्ति को जरा खरोच भी नहीं आयी।


इस झारखण्ड बन्द में जनजातीय समूह के सभी नेताओं ने सलखान मुर्मू ने नेतृत्व में हजारों लोगों के साथ सड़कों पर उतर कर जिस एकजुटता का परिचय दिया है, उससे इस बात का एहसास हो रहा है कि अब जनजातीय समूहों में अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए जज्बा जागृत हो चुका है। 


इसके साथ साथ जनजातीय समूहों में पथलगाढ़ी आन्दोलन का भी असर हुआ है। जिसके माध्यम से जनजातीय समूहों को संविधानिक प्रावधानों की जानकारी मिली। जिससे झारखण्ड से लेकर छत्तीसगढ़ सहित सभी आदिवासी बाहुल्य राज्यों में जनजातीय समूहों में बढ़ रही जागृति ने आरएसएस को सकते में डाल दिया है। 


जिससे सभी संघियों में खलबली मच गयी है जिसको संघी जनजातीय समूहों में उपजा असन्तोष करार दे रहे हैं जिससे भयभीत होकर इस जनजागृति को रोकने के लिए संघ प्रमुख ने मोर्चा स्वत सम्भाला है। बामसेफ, भारत मुक्ति मोर्चा तथा आदिवासी सेंगल अभियान राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद के एक मंच पर आकर जो काम शुरू किया गया था उसका परिणाम साफ दिखाई दे रहा है। 


कि जनजातीय समूह अब समाज में नफरत, वैभनस्यता, भेदभाव का बीजारोपण करने वाले संघ के किसी भी वहकावे में आने वाले नहीं हैं, अब वे इन ब्राह्मणवादी संगठनों की दाल गलने देने वाले नहीं है। क्योंकि उनको अब यह जानकारी मिल रही है जिस जानकारी से इन विदेशी यूरेशियन शासक जातियों ने जनजातीय समूहों को वंचित रखा। वह जानकारी अब बामसेफ, भारत मुक्ति मोर्चा जैसे 


क्रान्तिकारी संगठनों के माध्यम से मिल रही है। जिसके कारण अब इस बात का एहसास हो रहा है कि अब वह दिन दूर नहीं जब इस देश में ब्राह्मणवादी, पाखण्डियों के खिलाफ फुल एण्ड फाइनल आजादी की जंग रूपी राष्ट्रव्यापी जनआन्दोलन की शुरूआत होगी जिसको सफल होने से अब कोई नहीं रोक सकता है।

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