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आखिर किसान गुस्से में क्यों हैं

Published On :    21 Jun 2018   By : MN Staff
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मध्य प्रदेश समेत सात राज्यों में किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया है। उन्होंने 10 दिनों तक फल, सब्जी और दूध की सप्लाई बंद करने का फैसला किया है। आंदोलन को भड़कने से रोकने के लिए सरकार ने कई जगहों पर धारा 144 लगा दी है। 


लेकिन सवाल ये कि आखिर किसान इतने गुस्से में क्यों है। आखिर क्यों किसान फलों और सब्जियों को मंडी में बेचने की बजाय फेंक रहा है। हजारों लीटर दूध सड़कों पर बहा दे रहा है।


मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे शिवकुमार के मुताबिक आंदोलन की बड़ी वजह फसल का सही दाम न मिल पाना है। किसान फसल की लागत भी नहीं निकाल पा रहा है। 


सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का एलान किया, लेकिन वो भी नहीं मिल रहा है। उस पर कर्ज इतना हो चुका है कि सुसाइड करने पर मजबूर है और खरीदार न मिलने से फसल सड़ जाती है।


किसानों को फसल का सही दाम न मिलने की दो वजहें हैं। पहली फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी न मिलना और दूसरी वजह है भावांतर योजना। फसल को उगाने में किसान के कुछ पैसे खर्च होते हैं। जिसे फसल की लागत कहते हैं। 


जब फसल की पैदावार ज्यादा होती है तो बाजार में उस फसल का रेट कम हो जाता है और फसल का खर्च भी नहीं निकल पाता। किसान को घाटा न हो इसलिए सरकार ने फसल को मंडी में बेचने के लिए एक रेट तय करती है। जिसके कम रेट पर कोई भी व्यापारी किसान से फसल नहीं खरीद सकता है उसे ही न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एनएसपी कहते हैं।


दिक्कत एनएसपी से नहीं बल्कि उसे लागू कराने में है। अगर कलेक्टर चाह ले तो कोई किसान न ही आंदोलन करे और न ही सुसाइड। मंडी एक्ट के तहत कलेक्टर की जिम्मेदारी है कि वो सुनिश्चित करे कि किसान का अनाज एनएसपी से कम दाम पर न बेचा जाए। 


लेकिन ऐसा नहीं होता है। कलेक्टर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता है। वो मंडी में आकर देखता तक नहीं कि किस कीमत पर किसानों का अनाज खरीदा जा रहा है। कलेक्टर मॉनिटरिंग करने लगे तो किसानों की कई बड़ी समस्या दूर हो जाए। किसानों को उनके अनाज का सही दाम मिलने लगेगा। 


जब सरकार ने देखा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने भावांतर योजना लागू की। लेकिन भावांतर योजना समझने से पहले मॉडल रेट समझना होगा। जिसके आधार पर भावांतर तय होता है। मंडी में किसी अनाज का मॉडल रेट उस राज्य समेत आस पास के तीन राज्यों की उस अनाज के मंडी रेट का औसत निकालकर तय किया जाता है। 


किसी अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य से मॉडल रेट घटाकर उस अनाज का भावांतर निकाला जाता है। जैसे-सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 3050 रुपए हैं और मंडी में मॉडल रेट 2640 रुपए। अगर किसान मंडी में सोयाबीन 3050 रुपए या उससे अधिक के रेट में बेचता है तो उसे योजना का कोई लाभ नहीं मिलेगा। 


किसान एमएसपी से कम और मॉडल रेट से अधिक जैसे 2850 रुपए रेट में सोयाबीन बेचता है तब किसान को सरकार 3050-2850= 200 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से पैसे देगी। वहीं तीसरी कंडीशन आती है जब किसान मॉडल रेट से कम यानी 2400 रुपए में सोयाबीन बेचता है तब किसान को सरकार 3050-2640= 410 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से पैसे देगी।


पहली बात तो किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना चाहिए। जो कोई भी सरकार नहीं दिलवा पा रही। अब सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए भावांतर योजना ले कर आई है। एग्रीकल्चर एक्सपर्ट जीएस कौशल ने किसानों से लूट का पूरा खेल समझाया। 


उन्होंने बताया कि मान लीजिए सरकार ने एक किलो चने का एमएसपी 50 रुपए रखा है। मंडी में उसका मॉडल रेट 20 रुपए हैं। जब किसान मंडी में चना बेचने गया तो उससे व्यापारी ने एमएसपी पर नहीं, बल्कि बोली लगाकर कम कीमत पर चना खरीदा। 


माना कि व्यापारी ने किसान से 15 रुपए में चना खरीदा। ऐसे में एमएसपी से कम कीमत पर खरीद की वजह से सरकार ने उसे भावांतर योजना के तहत 50 एमएसपी-20 (मॉडल रेट 30) रूपए दिए। यानी किसान को व्यापारी से 15 रुपए और सरकार से 30 रुपए मिले, कुल मिलाकर 45 रुपए। 


फिर भी किसान को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिला। उसे 50 रुपए मिलने थे लेकिन 45 रुपए ही मिले। पांच रुपए का घाटा हुआ। फसल को उगाने से लेकर मंडी तक पहुंचाने में किसान का काफी पैसा खर्च होता है। 


जैसे फसल की बुआई, सिंचाई और वक्त-वक्त पर खाद का छिड़काव। इसके बाद फसल पक जाए तो उसे बेचने के लिए गाड़ी पर लादकर मंडी पर ले जाना। इन सब में पैसा खर्च करने के लिए अधिकतर किसान बैंक से लोन लेते हैं। 


फसल लेकर किसान मंडी पहुंचता है तो उसे वहां सही दाम भी नहीं मिलता। ऐसे में फसल की लागत तो निकलती नहीं, उल्टा बैंक का कर्ज हो जाता है। आज किसान कर्ज से कराह रहा है।


कृषि एक्सपर्ट के मुताबिक, समाधान वही है जहां से ये समस्या शुरू हुई। यानी किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिले। इसमें सबसे बड़ी भूमिका कलेक्टर की हो सकती है। वो किसानों से वादा करे कि मंडी में उन्हें एनएसपी पर ही फसल का दाम मिलेगा। 


मंडियां किसानों के लिए हैं लेकिन वहां पर आज व्यापारियों का कब्जा है। कई बार जब उनके कहे दाम पर अनाज न बेचो तो वो खरीदारी करने से मना कर देते हैं। जिसका नतीजा यह होता है कि अनाज रखे-रखे सड़ने लगता है या फिर बारिश में खराब हो जाता है। 


ऐसे में सरकार को फसलों को खरीदने की गारंटी का कानून बनाना चाहिए। यदि यह कानून बना भी दिया जाए तो कांग्रेस, भाजपा की सरकरों में उसके क्रियान्वयन का ईमानदारी से होने की गारंटी कैसे दी जा सकती है, जिन्होंने देश के 65 करोड़ किसानों को कही का नहीं छोड़ा है। किसानों का हित तभी हो सकता है जब इस देश की सत्ता एवं व्यवस्था मूलनिवासी बहुजों के हाथों में होगी।

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