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सांस लेने की पाबंदी

Published On :    27 Jun 2018   By : MN Staff
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दिल्ली वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक बीते छह साल में 52 हजार से ज्यादा पेड़ काटे गए हैं। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में मौजूद आबादी की जरुरत के हिसाब से 9 लाख पेड़ कम हैं और फॉरेस्ट कवर सिर्फ 11 फीसदी ही बचा है। 


साउथ दिल्ली के इलाकों सरोजिनी नगर, कस्तूरबा नगर, नौरोजी नगर, नेताजी नगर, त्याग राज नगर और मोहम्मदपुर में करीब 14000 पेड़ काटे जाने पर हाईकोर्ट ने फिलहाल 4 जुलाई तक रोक लगा दी है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई के करते हुए कहा कि 2 जुलाई को एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के फैसले के बाद ही कोर्ट अपना रुख तय करेगा। उधर एनबीसीसी (नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन) ने कोर्ट से कहा कि एनजीटी ने नए पेड़ लगाने की शर्त पर ये पेड़ काटने की इजाजत दे दी थी।


दिल्ली में वायु प्रदूषण की बिगड़ती स्थिति के बावजूद पेड़ काटने का ये पहला मामला नहीं है, दिल्ली वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक बीते छह साल में 52 हजार से ज्यादा पेड़ काटे गए हैं। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में मौजूद आबादी की जरुरत के हिसाब से 9 लाख पेड़ कम हैं और फॉरेस्ट कवर सिर्फ 11 फीसदी बचा है। 


सरकार काटे जा रहे पेड़ों की संख्या 14000 बता रही है, जबकि प्रोटेस्ट कर रहे लोगों के मुताबिक यह संख्या 16500 के आस-पास है। एनबीसीसी सीएमडी अनूप कुमार मित्तल ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शन कर रहे लोग काटने वाले पेड़ों की संख्या जानबूझकर बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे हैं।


हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स मिनिस्ट्री ने पेड़ काटे जाने के खिलाफ विरोध बढ़ता देख 21 जून को एक प्रेस रिलीज जारी कर सफाई दी थी। मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आरोप भी लगाया है कि कुछ शातिर लोग मामले का गलत पक्ष लोगों के सामने रख रहे हैं और जनता को गुमराह कर रहे हैं। 


मिनिस्ट्री ने सफाई देते हुए कहा है कि इन इलाकों में कुल 21040 पेड़ हैं, जिनमें से 14031 पेड़ काटे जाने हैं। जबकि 6834 पेड़ बचा लिए जाएंगे और 1213 पेड़ों को ट्रांसप्लांट कर दिया जाएगा। इन पेड़ों के काटे जाने के एवज में 1,35, 460 नए पेड़ लगाए जाएंगे। इसके बाद इलाके में कुल पेड़ों की संख्या 1,58,935 हो जाएगी। 


सरकार के मुताबिक पेड़ काटने और नए लगाने के लिए 1-10 के नियम का पूरी तरह पालन किया जाएगा। इस प्रेस रिलीज में यह भी बताया गया है कि फिलहाल इन इलाकों में ग्रीन एरिया 13 से 38 प्रतिशत के बीच है, लेकिन प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद ये बढ़कर 41 से 58 प्रतिशत तक हो जाएगा। इसके अलावा फिलहाल बनी सोसायटीज में ग्राउंड कवर 27 से 67 फीसदी तक है, जबकि री-डवलपमेंट के बाद ये घटकर सिर्फ 15 से 31 प्रतिशत रह जाएगा।


दिल्ली हाईकोर्ट में एनबीसीसी ने जो स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है उसके मुताबिक नौरोजी नगर में 1454 पेड़ काटने की अनुमति का नोटिफिकेशन 15 नवंबर 2017 को जारी किया गया था, लेकिन अभी यहां 1302 पेड़ ही काटे गए हैं। नेताजी नगर में कुल 2294 हरे पेड़ काटने की अनुमति दी गई थी, हालांकि अभी यहां 202 पेड़ काटे गए हैं, जबकि किदवई नगर में पेड़ काटने की अनुमति का नोटिफिकेशन 2014 में ही जारी कर दिया गया था और यहां अभी तक 1123 पेड़ काटे गए हैं। 


उधर मोहम्मदपुर में 447 पेड़ काटने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन पर्यावरण और वन विभाग के मंत्री ने काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या कम करने की बात लिखकर फाइल लौटा दी थी। हालांकि प्रोटेस्ट कर रहे लोगों का आरोप है कि यहां अवैध तरीके से पेड़ काटे गए हैं। इसके आलावा सरोजनी नगर में 11000 पेड़ काटने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन संख्या काफी ज्यादा होने की वजह से फाइल लौटा दी गई थी। 


इसके बाद 606 पेड़ काटने का प्रस्ताव दोबारा भेजा गया, लेकिन वो भी मंजूर नहीं हुआ। बता दें कि त्यागराज नगर में भी 100 पेड़ काटने के लिए मंजूरी मांगी गई थी लेकिन मिली ही नहीं। गौरतलब है कि कस्तूरबा नगर और श्रीनिवासपुरी जैसे इलाकों में पेड़ काटने के लिए अब तक कोई प्रस्ताव ही नहीं भेजा गया है।


पर्यावरणविद् और पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्थाएं जो दिल्ली में पेड़ काटने के खिलाफ जारी प्रोटेस्ट का हिस्सा हैं, सरकार के दावों से इत्तेफाक नहीं रखते। ग्रीन सर्कल एनजीओ के केवी सिल्वराजन का कहना है कि 18 फीट गोलाई वाला 100 फीट ऊंचा एक पेड़ एक साल में 260 पाउंड यानी 118 किलो ऑक्सिजन देता है। हालांकि ऑक्सिजन कितनी पैदा होगी ये उनकी किस्म, मोटाई और उनके प्रकार पर निर्भर करता है। नीम और पीपल सबसे ज्यादा मात्रा में ऑक्सिजन छोड़ते हैं जबकि जंगली कीकर से ऑक्सिजन नहीं के बराबर मिलती है।


एक अध्ययन के मुताबिक एक व्यक्ति 24 घंटे में 22 हजार बार सांस लेता है और दो छायादार पेड़ चार सदस्यों वाले एक परिवार को जीवनभर ऑक्सिजन दे सकते हैं। जानकारों का मानना है कि सरकार को 40 से 50 साल पुराने पेड़ों को काटने की बजाए तकनीक का उपयोग कर स्थानांतरित करने का प्रयास करना चाहिए। 


एक पेड़ काटने की जगह 10 पौधे लगाने से जल्द कोई राहत नहीं मिलेगी, क्योंकि पौधे को बड़ा होने में सात से आठ साल और कैनोपी बनने में 25 साल लग जाते हैं। कैनोपी ही प्रदूषण रोकती है और छाया देती है, इस प्रोजेक्ट के लिए पेड़ काटने और उसी जगह लगे पौधे को पेड़ बनने में समय लगेगा, क्योंकि पौधे प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद ही लगाए जा सकेंगे। 


पेड़ काटने का प्रभाव इलाके के ईकोसिस्टम और प्रदूषण के स्तर पर भी सीधे तौर पर देखने को मिलेगा। दिल्ली में तेजी से बढ़ते प्रदूषण का कारण भी लगातार जारी कंस्ट्रक्शन और पेड़ कम होते जाना ही है। दिल्ली में प्रदूषण का आंकड़ा पिछले पांच साल में चार गुना तक बढ़ा है और पिछले छह साल में डवलपमेंट के नाम पर 52 हजार छायादार पेड़ों की बलि चढ़ा दी गई। 


सोशल ऐक्शन फॉर फॉरेस्ट ऐंड इन्वाइरनमेंट के अनुसार दिल्ली का ग्रीन कवर लगातार कम हो रहा है लेकिन फिर भी एनसीआर के कई शहरों से अब भी बेहतर हैं। बीते 5 सालों में प्रगति मैदान का रिडिवेलपमेंट, मेट्रो और सड़कों को चौड़ा करने के लिए काफी पेड़ काटे गए हैं जिसका प्रभाव प्रदूषण के रूप में साफ दिखाई दे रहा है।

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