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मतदाताओं के साथ धोखेबाजी आधार को वोटर कार्ड से लिंक किया तो.......

Published On :    28 Jun 2018   By : MN Staff
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‘‘वन वोट वन वैल्यू’’ अमीर-गरीब, सबके एक वोट का समान महत्व है, ऐसे में अगर वोटर कार्ड को आधार से लिंक किया गया, तो इसकी क्या गारंटी है कि आपका वोट गुप्त रह पाएगा? आधार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो चुकी है, इस बीच कोर्ट के आदेश से पहले तक चुनाव आयोग करीब 32 करोड़ मतदाताओं के आधार कार्ड इकट्ठा कर चुका है। 


फिलहाल जानना जरूरी है कि यदि मतदाताओं के वोटर कार्ड को आधार कार्ड से लिंक किया जाता है तो उसके क्या नतीजे हो सकते हैं। जाहिर है सरकार और चुनाव आयोग को अपनी तरफ से यह साफ करना चाहिए कि देश के हर मतदाताओं का मत कैसे गोपनीय और सुरक्षित रहेगा, यदि वोटर कार्ड को आधार कार्ड से लिंक किया जाता है? 


इस कहानी की शुरुआत कर्नाटक विधानसभा चुनाव से ही करते हैं, हुबली धारवाड़ सीट का चुनाव परिणाम पहले रोक दिया गया था वजह, ईवीएम में पड़े मत और वीवीपैट (पर्ची) की संख्या में असमानता पाई गई थी यानि, जितने मत डाले गए और जितने मत गिने गए, उनमें अंतर था। 


यह तथ्य सिर्फ एक पोलिंग स्टेशन के ईवीएम की वीवीपैट की गणना से सामने आया, वीवीपैट के अनुसार 459 वोट पड़े थे और चूंकि जीत का मार्जिन 20,000 से अधिक था, अंततः भाजपा उम्मीदवार जगदीश शेट्टर को विजयी घोषित कर दिया गया।


अब सवाल यह उठता है कि ऐसा अंतर अगर एक पोलिंग स्टेशन पर आ सकता है, तो सभी पर क्यों नहीं आ सकता है? चूंकि, सभी पोलिंग स्टेशन के वीवीपैट मतों की गिनती का प्रावधान नहीं है, इसलिए इस तरह के ज्यादातर अंतर का पता ही नहीं चल पाता है, लेकिन हांडी की एक चावल से पता चल जाता है कि भात पका है या नहीं। 


उसी तरह यदि एक ईवीएम और उसके वीवीपैट में गड़बड़ी हो सकती है तो दूसरे में क्यों नहीं हो सकती? क्या इसका कोई फूलप्रूफ जवाब चुनाव आयोग दे सकता है? इस खबर से कहानी की शुरुआत इसलिए करने की जरूरत पड़ी, क्योंकि इस तरह की गड़बड़ियां तब भी हो रही हैं, जब चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को ईवीएम हैक करने की चुनौती दी थी और किसी दल ने इसे हैक करने की न हिम्मत दिखाई और न प्रतिभा। 


वैसे सवाल हैकिंग से अधिक महत्वपूर्ण, तकनीक के साथ छेड़छाड़ का भी है और तकनीक की विश्वसनीयता का भी है। क्या लोकतंत्र की बुनियाद को तकनीक के भरोसे गिरवी रखा जा सकता है? वो भी ऐसे समय में जब राजनीतिक दल मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए साइकोलॉजिकल गेम खेल रहे हैं। 


अब मूल मुद्दे पर बात करते हैं, मूल मुद्दा यह है कि भारत में गुप्त मतदान की व्यवस्था है, अभी ईवीएम को लेकर सवाल उठते रहते हैं। हुबली विधानसभा से भी खबर आई कि वीवीपैट और ईवीएम में दर्ज मतों की गिनती में अंतर पाया गया। ईवीएम बेसिकली एक प्रीलोडेड डेटा के आधार पर काम करता है। 


आने वाले दिनों में अगर वोटर कार्ड को आधार से लिंक किया जाता है, तो मतदान से पहले बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन होगा। इसमें यह गुंजाइश रहेगी कि जो बूथ का चुनाव अधिकारी है और जिसके पास कंट्रोल पैनल होता है, वो चाहे तो इस बात का पता लगा सकता है कि किसी मतदाता ने किसे वोट दिया। ऐसा इसलिए संभव है कि उसके पास मतदाता का बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन डिटेल और उसकी टाइमिंग होगी। 


वो यदि चाहे तो बाद में उस टाइमिंग के हिसाब से अंगूठे के निशान और ईवीएम पर दबाए गए चुनाव निशान का मिलान कर सकता है। यह कोई साइंस फिक्शन का हिस्सा नहीं है, बल्कि दुनियाभर में जिस तरह से हैकिंग हो रही है, उसे देखते हुए संभव लगता है। यदि ऐसा होने की रत्ती भर भी गुंजाइश रहती है तो यह पूरी मतदान प्रक्रिया को बेमानी बना देगा, क्योंकि तब हमारा मत गुप्त नहीं रह सकेगा।


यूआईएडीएआई ने यह स्वीकार किया है कि सरकारी सेवाओं के साथ आधार लिंकिंग की असफलता दर 12 फीसदी है वहीं टेक्निकल एरर अलग से है। यदि वोटिंग सिस्टम में भी बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन अपनाया जाता है (जैसे अभी वोट करने से पहले वोटर कार्ड मिलान और हस्ताक्षर आदि करवाए जाते है, स्याही लगाई जाती है) तो जाहिर है कि उसमें भी वेरिफिकेशन का सक्सेस रेट घट-बढ़ सकता है। 


ऐसे में जिनका भी बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन नहीं हो पाएगा, वो वोटिंग से वंचित भी किए जा सकते हैं। कई ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जिनमें जिस व्यक्ति का आधार कार्ड बना है, बाद में उसके अंगूठे का निशान या आंख की पुतली मेल नहीं खाती मिली है। ऐसे मतदाताओं का क्या होगा? 


क्या वे फिर भी वोट दे सकेंगे? फिर किसी भी संभावित टेक्निकल एरर (कनेक्शन फेल होने या अन्य तकनीकी दिक्कत) के कारण भी कोई मतदाता वोट देने से वंचित हो सकता है। क्या वोटर प्रोफाइल में हेरफेर की आशंका से इंकार किया जा सकता है, जिसका अनुचित लाभ उठाया जा सके? यदि इस पूरी योजना के क्रियान्वयन में कहीं कोई तकनीकी खामी रह जाती है तो क्या उसका गलत फायदा कोई नहीं उठा सकता है? 


ऐसे में मतदाता की संवेदनशील पूर्ण जानकारी क्या गलत तत्वों के हाथ नहीं लग सकती या फिर कैंब्रिज एनालिटिका के तर्ज पर इसका अनुचित तरीके से राजनीतिक लाभ नहीं उठाया जा सकता है? जाहिर है, जब वोटर कार्ड को आधार से जोड़ा जाएगा, तब हमारी चुनाव प्रणाली पूरी तरह से हैकप्रूफ और सुरक्षित होनी चाहिए।


दूसरी तरफ, गौर करने वाली बात यह भी है कि यूआईडीआईए ने आधार कार्ड बनाने के लिए कुछ निजी कंपनियों (विदेशी कंपनियां भी) के साथ समझौते किए हैं। जब आरटीआई के तहत जानकारी लेने की कोशिश कुछ लोगों ने की तो उन्हें आधी-अधूरी सूचनाएं दी गईं। 


यूआईडीआईए ने यह कभी नहीं बताया कि इसने एल-1 आईडेंटिटी सोल्युशन, एसेंचर और दूसरी विदेशी कंपनियों के साथ क्या समझौता किया है। इसके अलावा, ईवीएम चिप आदि बनाने का काम करने वाली कंपनियों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। 


बहरहाल, आए दिन चीन के हैकर्स द्वारा भारतीय मंत्रालयों के संवेदनशील वेबसाइट्स के हैक होने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैकिंग की अन्य घटनाओं को देखते हुए यह आशंका और भी बढ़ जाती है कि हम कैसे अपने मतदाताओं की सूचना सुरक्षित रख पाएंगे?


दैनिक मूलनिवासी नायक शुरू से ही लोगों को आधार के खतरे के बारे में बता रहा है। आधार कार्ड नागरिकों के मौलिक अधिकार (निजता का अधिकार) का हनन करता है। दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में इस तरह की योजना नहीं चलाई जा सकती है। आखिर क्यों, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, चीन, कनाडा और जर्मनी जैसे देशों में भी इस तरह की योजना शुरू करने के बाद बंद कर दी गई? आधार कार्ड बनाने और उसके ऑपरेशन में डिजिटल डाटा का इस्तेमाल होता है। 


इस कार्ड को बनाने के लिए लोगों की आंखों की पुतलियों और अंगूठे का निशान जैसे बायोमेट्रिक डाटा लिए जाते हैं, फिर उसे पासपोर्ट, बैंक एकाउंट और फोन से जोड़ दिया जाता है। लोगों की व्यक्तिगत जानकारियां एक सर्वर में एकत्र की जाती हैं, जाहिर है उस सर्वर पर कभी भी हैकर्स अटैक कर उसे हैक कर सकते हैं और कर भी रहे हैं।

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