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जनता के साथ धोखा है लोकपाल बिल

Published On :    4 Jul 2018   By : MN Staff
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सरकार ने लोकपाल बिल का मसौदा तैयार कर लिया है, इस मसौदे की एक रोचक जानकारी-अगर कोई व्यक्ति किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत करता है और वह झूठा निकला तो उसे 2 साल की सजा और अगर सही साबित होता है तो भ्रष्ट अधिकारी को मात्र 6 महीने की सजा। मतलब यह कि भ्रष्टाचार करने वाले की सजा कम और उसे उजागर करने वाले की सजा ज्यादा है। इसके अलावा भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी को मुकदमा लड़ने के लिए मुफ्त सरकारी वकील मिलेगा, जबकि उसे भ्रष्ट और खुद को सही साबित करने के लिए शिकायतकर्ता को अपने खर्च पर मुकदमा लड़ना होगा। यह सरकार का भ्रष्टाचार से लड़ने का नायाब तरीका है, सरकार ने अपनी नीतियां, मानसिकता और विचारधारा साफ कर दी है कि वह भ्रष्टाचार को लेकर कितनी गंभीर है।


एक शर्मनाक बयान आया था, देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. कौशिक बसु का, उन्होंने कहा था कि घूसखोरी को ही वैध बना देना चाहिए। अजीबोगरीब बात यह है कि इंफोसिस के मालिक और देश के जाने-माने उद्योगपति नारायण मूर्ति भी इसका समर्थन करते हैं। अब जब प्रधानमंत्री के इतने करीबी अर्थशास्त्री और नारायण मूर्ति जैसे समझदार लोग घूसखोरी की पैरवी करने लगें तो इस देश का क्या होगा, यह शायद ऊपर वाला भी नहीं बता सकता है, लेकिन सरकार इन सबसे दो कदम आगे है। पहले उसने सीबीआई को सूचना अधिकार कानून से बाहर कर दिया और अब एक कमजोर लोकपाल से यह करने की कोशिश कर रही है कि अधिकारी और नेता देश में मौजूद भ्रष्टाचार के साथ खुद को आनंदित महसूस करते हैं, सब मस्त हैं।


देश की जनता लोकपाल इसलिए चाहती है, क्योंकि वह भ्रष्टाचार से तंग आ चुकी है, लोगों में गुस्सा है। सरकार ने जो लोकपाल बिल तैयार किया है, उससे भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, हां इस पर राजनीति जरूर होगी। हैरान करने वाली बात तो यह है कि प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में होंगे या नहीं, सरकारी चाल को समझना जरूरी है। प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखना उचित है या नहीं, इस पर विवाद चल रहा है। प्रधानमंत्री पर कार्रवाई और उनसे पूछताछ करने का अधिकार किसी भी संस्था को नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इससे संसद और कार्यपालिका दोनों पर असर पड़ सकता है, सरकारी कामकाज में बाधा उत्पन्न हो सकती है और देश में अराजकता आ सकती है। इस तर्क में कोई कमी नहीं है, सरकार भी यही राय दे रही है। लेकिन लोगों को सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है। जनता पिछले चार सालों से निरंतर नए-नए घोटालों से रूबरू हो रही है। कई घोटालों में मंत्री और नेता जेल में हैं, कई मुख्यमंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा, कुछ घोटालों में प्रधानमंत्री का नाम भी जोड़ा जा रहा है।


सही बात तो यह है कि कानून बनने या लोकपाल बनने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, लोकपाल बनाने का मकसद तो यही होना चाहिए कि जो भी भ्रष्टाचार में लिप्त है, उसे सजा मिले और वह बच न पाए। इसकी जरूरत इसलिए है, क्योंकि अब तक भ्रष्टाचार करने वाले लोग कानून को चकमा देने में कामयाब रहे हैं। जिन लोगों को सजा मिली है, उन्हें हम अपवाद मान सकते हैं। सरकार के मसौदे के मुताबिक, लोकपाल के 9 सदस्य होंगे। सुप्रीम कोर्ट के किसी कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश को इसका चेयरमैन बनाया जाएगा। इनमें से आधे न्यायिक सदस्य होंगे, जिन्हें चुनने के लिए सरकार ने एक टीम बनाई है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा और राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष, एक कैबिनेट मंत्री (जिसे प्रधानमंत्री चुनेंगे), एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाईकोर्ट के जज, एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता और एक प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हैं। यही लोकपाल के चेयरमैन और सदस्यों को चुनेंगे। अब एक सवाल उठता है कि इनमें से जितने भी लोग हैं, उसमें सरकारी पक्ष का पलड़ा भारी दिखाई देता है। खतरा इस बात का है कि इनके द्वारा चुने गए लोकपाल भी राजनीति का शिकार हो सकते हैं, जैसा कि सीवीसी के साथ हुआ है। इस लोकपाल को ग्रुप ए के अधिकारियों, मंत्रियों और सांसदों (संसद के बाहर के मामलों में) की जांच करने का अधिकार दिया गया है, लेकिन किसी को सजा देने का हक नहीं है। यह सुप्रीम कोर्ट को सजा के लिए सुझाव दे सकता है, लेकिन मंत्रियों के मामले में यह भी नहीं कर सकता है।


सवाल तो यह भी है कि सरकार सचमुच भ्रष्टाचार से लड़ना चाहती भी है या नहीं? भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए इसके स्वरूप को समझना जरूरी है। भारत के सरकारी तंत्र में अलग-अलग स्तर पर भ्रष्टाचार मौजूद है। सरकार की समस्या यह है कि वह जिन नीतियों को बढ़ावा दे रही है, जिस विचार को सही मान रही है, असल में वही भ्रष्टाचार की जड़ है। 1991 के बाद से भारत में भ्रष्टाचार का स्वरूप बदल गया है। जबसे देश में उदारवाद और निजीकरण का दौर चला है, तबसे उद्योग जगत के जानवरों को समाज में लूट मचाने की खुली छूट दे दी है। पिछले बीस साल का इतिहास यही बताता है कि कॉरपोरेट जगत भ्रष्टाचार का केंद्र बन चुका है। बड़े-बड़े उद्योगों ने अपने मुनाफे के लिए न सिर्फ भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया, बल्कि पूरे सरकारी तंत्र को दूषित कर दिया है। उदारवाद की नीतियां इसलिए लागू की गई थीं कि उद्योग जगत टैक्स चोरी नहीं करेगा, भारत की अर्थव्यस्था में मौजूद काले धन और कालाबाजारी में कमी आएगी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 1991 में उदारवाद की नीतियां लागू करने से पहले काला धन 27 फीसदी था, लेकिन आज यह बढ़कर 52 फीसदी पहुंच चुका है। भ्रष्टाचार की स्थिति इतनी गंभीर है कि भारत सरकार को देश के 57 फीसदी मुनाफे का पता ही नहीं चल पाता है। 


एक आंकड़े के मुताबिक, भारत में हर साल 40 लाख करोड़ रुपये काला धन बनते हैं, जिसका सिर्फ 10 फीसदी हिस्सा विदेश भेज दिया जाता है। विभिन्न राजनीतिक दल, नेता और अधिकारी भ्रष्टाचार के इस भयंकर खेल में एक छोटे खिलाड़ी बन गए हैं, पालतू जीव की तरह बड़े-बड़े उद्योगपतियों की कठपुतली बन गए हैं। देश की जनता का भ्रष्टाचार से रोज सामना होता है। बीडीओ, तहसीलदार, जिला मजिस्ट्रेट, स्कूल, थाना, अस्पताल, कचहरी यानी किसी भी सरकारी विभाग के दफ्तर में घुसते ही आपको पता चल जाएगा कि यह सरकारी तंत्र किस तरह भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है। देश के मंत्रियों और नेताओं की आंखों को यह सब नजर नहीं आता है, लेकिन यह यत्र-तत्र-सर्वत्र मौजूद है। वैसे एक बात माननी पड़ेगी कि यूपीए सरकार की योजनाओं की वजह से भ्रष्टाचार ने अब पंचायत और गांवों तक अपनी पैठ बना ली थी, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना हो, मनरेगा हो या फिर जन वितरण प्रणाली, अब गांव वाले भी भ्रष्टाचार में भागीदारी कर रहे हैं। वहीं काम आज एनडीए सरकार में जोरों से चल रहा है। 


सरकार की मानसिकता पर इसलिए सवाल उठता है, क्योंकि जमीनी स्तर के भ्रष्टाचार से लोकपाल को बाहर रखा गया और बहाना बनाया गया कि यह राज्यों का विषय है, यह दलील न तो उचित है और न तर्कसंगत। दूसरा सवाल यह है कि सीबीआई को लोकपाल से बाहर रखने का क्या मकसद है? इसके अलावा यह कि अगर कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करता है या उसकी जानकारी लोकपाल को देता है तो उसे इस कानून के तहत क्या सुरक्षा मिली है? ऐसे लोगों को सुरक्षा न देकर सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में जनता की हिस्सेदारी खत्म करने की कोशिश की है। यह इस बात का सबूत है कि लोकपाल बिल जनता के साथ धोखा है।

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