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न्यायपालिका में संघियों को स्थापित करने की कोशिश में केन्द्र सरकार

Published On :    2 Apr 2018   By : MN Staff
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सबसे लंबे कार्यकाल में कांग्रेस की सरकारों ने देश में नस्लवाद, जातिवाद, मनुवाद को मजबूत किया वहीं मोदी सरकार देश में उस संगठन की विचारधारा को स्थापित करने की कोशिश कर रही है जिसने हमेशा ही इस मनुवाद, जातिवाद, वांशिक भेदभाव, स्त्री दासता की व्यवस्था को मजबूत करने का काम किया है। जिसका आज देश की लोकतांत्रिक मशीनरी पर नियंत्रण है। उसको लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तम्भ न्यायपालिका में वांशिक भेदभाव पर आधारित संघ की विचारधारा को जबरन थोपने की कोशिश कर रही है। जहां पर आज इसी सोच के यूरेशियन लोगों का कब्जा है। 


न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि केन्द्र सरकार ने कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश को सीधे पत्र लिखा है। देश में आज तक ऐसा नहीं हुआ है लेकिन केन्द्र की भाजपा सरकार लोकतंत्र की विभिन्न संस्थाओं पर ‘आक्रमण’ करने का काम कर रही है। वह न्यायपालिका में ‘‘आरएसएस की विचारधारा वाले लोगों को भरने की यानी जजों को नियुक्त करने की कोशिश कर रही है। इतना ही नहीं भाजपा सरकार ने शिक्षा की संस्थाओं में तो आरएसएस के प्रचारक भर दिये हैं, अब ये कोशिश कर रही है कि न्यायपालिका में भी आरएसएस प्रचारक या उनकी मानसिक सोच के लोगों भर दिया जाए। 


अब देश का बहुजन समाज अब इस संविधान विरोधी कार्यों को किसी भी कीमत में बरदास्त नहीं करने वाला है, क्योंकि संविधान के अनुसार लोकतंत्र में सभी को समान हिस्सेदारी हासिल का अधिकार है। सरकार का दोगला रवैया हमें यह मंजूर नहीं है और हम इसका विरोध करेंगे तथा जरूरत पड़ी तो इस बात को जनमानस में भी उठायेंगे। ऐसा लगता है कि जब पूरे देश में अंधेरा छा जाता है तो चौकीदार भी सो जाता है। पूर्ववर्ती सरकारों की भांति इस सरकार ने हर संस्था पर ‘आक्रमण’ किया है। प्रधानमंत्री जब शुरू में संसद आये थे तो उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर संसद में माथा टेका और कहा था कि वह कभी इसकी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करेंगे। 


आज संसद की मर्यादा का रोज उल्लंघन हो रहा है। जिसको भाजपा और कांग्रेस ने जंग का मैदान बना दिया है। आज वह अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर भी बहस नहीं होने दे रहे हैं। हर विधेयक की राज्यसभा में चर्चा होनी चाहिए उसे सरकार धन विधेयक बताकर राज्यसभा में चर्चा ही नहीं होने दे रहे हैं ताकि विपक्ष मतदान न कर सके।


तो अब सवाल खड़ा होता है कि जब आप संसद में चर्चा ही नहीं होने देते हैं तो फिर प्रधानमंत्री ने किस मुंह से मत्था टेका था? संसद के बाद सरकार की दृष्टि मीडिया और न्यायपालिका पर है। यही दो संस्था हैं जो लोकतंत्र की रक्षा कर सकती हैं। पहला मीडिया और दूसरी संस्था न्यायपालिका है, जिस पर सरकार लगातार प्रहार कर रही है। उन्होंने (न्यायमूर्ति) चेलमेश्वर द्वारा प्रधान न्यायाधीश को लिखे एक पत्र का हवाला भी दिया। मोदी सरकार में न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि केन्द्र सरकार ने कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश को सीधे पत्र लिखा है और उनसे एक न्यायाधीश के बारे में जांच कराने को कहा है। यह पत्र एक न्यायाधीश के बारे में शिकायत को लेकर था, इसी न्यायाधीश के बारे में कालेजियम ने दो बार सिफारिश की जा चुकी है। कॉलेजियम का पैमाना सिर्फ ब्राह्मण होना जरूरी है।


न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने इसी मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि केन्द्र सरकार ने किसी मुख्य न्यायधीश को सीधे पत्र लिखा हो। तो सवाल है कि अगर केन्द्र सरकार और न्यायपालिका में तालमेल हो गया तो लोकतंत्र का बचाव ही मुश्किल हो जायेगा। ऐसा ही कदम उठाने की फिराक में केन्द्र सरकार है। यदि सरकार अपने हाथ में न्यायपालिका और मीडिया ले ले तथा उनमें हस्तक्षेप करने लगे तो फिर बच क्या जाएगा? यदि केन्द्र सरकार को जज की दोबारा जांच करवानी ही थी तो कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश की जगह भारत के प्रधान न्यायाधीश को खत लिखा जाना चाहिए था। इस प्रकार कानून मंत्रालय ने कालेजियम और भारत के प्रधान न्यायाधीश को नजरंदाज कर दिया और सीधे कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख दिया। 


आज मोदी सरकार अपने पसंद के लोगों को न्यायपालिका में न्यायाधीश बनाने के लिए मंजूरी दे रही है। जिसमें देरी के कारण उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की काफी कमी हो गयी है। शासक वर्ग का यह खेल काफी लंबे समय से चल रहा है। यही काम कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में भी किया था, अब वहीं काम आज भाजपा की सरकार कर रही है। जिसका कारण है कि न्यायपालिका में आज शासक वर्ग का कब्जा हो चुका है जिसको आरएसएस मय करने का कुत्सित प्रयास मोदी सरकार भी कर रही है।

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