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बेरोजगार भारत की वास्तविक तस्वीर

Published On :    3 Apr 2018   By : MN Staff
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देश में सत्तासीन होकर शासक वर्ग ने प्राचीन काल में सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत की कितनी बदरंग तस्वीर बना दी है जो आज अपनी बदहाली के लिए विश्व में जाना जाता है। वैश्विक स्तर पर आज भारत की तस्वीर निरक्षर और भिखारियों के देश के रूप में विख्यात है जबकि मूलनिवसी सर्वश्रेष्ठ सम्राट अशोक महान के समय में भारत शिक्षा और समृद्धि के लिए जाना जाता था यानि यह शिक्षा और ज्ञान, विज्ञान के मामले में विश्व गुरू के रूप में विख्यात रहा है। 


उस समय वर्ण, जाति, भेदभाव, ऊँचनीच, क्रमिक असमानता तथा स्त्रीदासता का नामों निशान नहीं था। चारों ओर समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व तथा न्याय पर आधारित समाज व्यवस्था थी जिसमें प्रजा की वास्तविक सत्ता स्थापित थी चारों ओर खुशहाली का राज था। उस समय बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा का कहीं भी नामो निशान नहीं था। इसीलिए उस समय के इतिहास को स्वर्ण काल के नाम से जाना जाता था क्योंकि उस समय विश्व के सकल घरेलू आय में अकेले भारत का हिस्सा 31 फीसदी था। 


इसलिए भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश के उस समय से बुरे दिन शुरू हुए जिस दिन से इस देश के धरती पर यूरेशियन लोगों ने कदम रखा और यहां के वैभव समृद्धि, खुशहाली पर गिद्ध दृष्टि डालकर अपनी ‘‘फूट डालो, राज करो’’ की नीति अपना कर छल-कपट, दम्भ और पाखण्ड से इस की सत्ता सम्पत्ती और अधिकार पर डाका डालकर यहां के मूलनिवासी महापुरूषों, राजा-महाराजाओं की हत्या करके इस देश के मूलनिवासी कहे जाने वाले समाज को यहां की वैभवशाली समानता पर आधारित सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करके यहां के मूलनिवासी समाज को गुलाम बनाया, गुलाम ही नहीं बनाया। 


बल्कि यहां के मूलनिवासियों की ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करके मूलनिवासियों को शिक्षा, सम्पत्ती और मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया। मूलनिवासी बहुजन समाज को अधिकार वंचित क्यों किया? ये किसी प्रकार का प्रतिशोध न कर सके तथा किये हमारे द्वारा की जाने वाली षड्यंत्रकारी साजिशों की इनको जानकारी नहीं होनी चाहिए, इसलिए शिक्षा से वंचित किया।


क्योंकि शिक्षा ऐसा महत्वपूर्ण अस्त्र है जिसकी मदद से हर मुसीबत का समाधान किया जा सकता है। आज वही अधिकार वंचित मूलनिवासी बहुजन को महापुरूषों के अथक संघर्ष, त्याग और बलिदान की बदौलत ही हक और अधिकार मिले इन अधिकारों का दस्तावेजी सबूत भारत में लागू संविधान है जिसका निर्माण विश्व के प्रकाण्ड विद्वान बाबासाहब अम्बेडकर ने किया।


लेकिन सबसे महत्वपूर्ण ओर विचारणीय प्रश्न यह है कि संविधान द्वारा वंचित समाज को मिले हक-अधिकार आज खत्म करने का काम शासक वर्ग प्राथमिकता के आधार पर कर रहा है। जिसको खत्म करने का काम वह संविधान को बिना हाथ लगाये कर रहा है। जिससे मूलनिवासी बहुजन समाज में हजारों समस्याओं का निर्माण हो रहा है जिसका निर्माता कोई और नहीं बल्कि शासक वर्ग और उसकी राजनैतिक पार्टियों की सरकारों ने किया है क्योंकि आज तक देश की सत्ता में या तो कांग्रेस रही है या फिर भारतीय जनता पार्टी रही है। 


जिन्होंने मूलनिवासी बहुजन को सदियों पुरानी मनुवादी व्यवस्था (जिसका आधार वर्ण जाति, अश्पृश्यता, ऊँचनीच, क्रमिक असमानता तथा स्त्रीदासता पर आधारित) गुलामी पहुंचाने का काम कर रहा हैं जिसमें मूलनिवायिं को इन्सान होने का भी अधिकार नहीं था। इन मनुवादी सरकारों ने मूलनिवासी बहुजन समाज (एससी, एसटी, ओबीसी एवं मायनॉरिटी) को अशिक्षा, गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद तथा भुखमरी और नक्सलवाद जैसी हजारों समस्याओं में लाकर खड़ा कर दिया है। 


संविधान के द्वारा मिले शिक्षा के अधिकार के बदौलत मूलनिवासी बहुजन समाज का युवा शिक्षा की डिग्री, डिप्लोमा लेकर आज रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है। इसका कारण शासक वर्ग है जिसने देश में इस प्रकार की नीतियों को लागू किया है जिसके चलते आज पूरे सरकारी और सरकार नियंत्रित सेक्टर आज निजीकरण की सुनियोजित नीति के तहत औद्योगिक घरानों, पूंजीपतियों, उद्योगपतियों के हाथों में बेचा जा चुका है। जिसके कारण सरकारी क्षेत्र की अधिकांश नौकरियां खत्म हो चुकी हैं जिसका खामियाजा बहुजन समाज के युवा वर्ग को भुगतना पड़ रहा है। 


जो आज बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं जिसका प्रमाण सामने है कि रेलवे में निकले 90 हजार पदों के लिए 2 करोड़ 80 लाख से ज्यादा आवेदन आये हैं यानि 350 आवेदक एक पद के लिए फाइट करेंगे। चौंकाने वाली बात तो यह है कि देश में 40 करोड़ बेरोजगार शिक्षित युवा एक मामूली नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि शासक वर्ग यानि भाजपा-कांग्रेस की सरकारों ने युवा भारत को आज बेरोजगारी की आग में झोंक दिया है। इन बेरोजगारों में अधिकांश युवा मूलनिवासी बहुजन समाज के हैं। जिन्होंने मनुवादी सरकारों से अपने उज्जवल भविष्य सवारने की उम्मीद लगा रखी है। जो यूरेशियन लोगों कीसत्ता  एवं व्यवस्था में सम्भव नहीं है। 

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