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बैक फुट पर सत्ता पक्ष और विपक्ष

Published On :    6 Apr 2018   By : MN Staff
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देश में 25 से 30 करोड़ आबादी वाले अनुसूचित वर्गां के खिलाफ होने वाले देशव्यापी अमानवीय अत्याचारों को रोकने के लिए सन् 1989 में बने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 मार्च 2018 को दिए गये फैसले के खिलाफ जिस भारत बंद का आयोजन किया गया जो पूरी तरह से बेलगाम होकर शाम होते-होते हिंसात्मक रूप में परिवर्तित हो गया, जिसको किसी तरह से कामयाब नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इस हिंसक आन्दोलन में कम से कम 15 निर्दोष लोगों की जानें चली गयीं। 


इस भारत बंद के मामले को लेकर सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों बैक फुट पर आ चुके हैं। विपक्ष जहां केन्द्र सरकार पर ढिलाई बरतने का आरोप लगा रहा है तो वहीं सत्ता पक्ष यह कहकर अपना पल्ला झाड़ रहा है कि केन्द्र सरकार इस मामले में पक्षकार ही नहीं थी। देश की सर्वोच्च अदालत के जिस फैसले को लेकर यह एजीटेशन किया गया। 


इसी मामले में केन्द्र सरकार का भी पक्ष मांगा गया था जिसमें एडिशनल सॉलीसिटर जनरल मनिन्दर सिंह भी पहुंचे थे तो फिर भी केन्द्र सरकार का यह कहना गलत है कि वह पक्षकार नहीं थी। जबकि सच्चाई तो यही है केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सही ढंग से पैरवी करने की कोशिश नहीं की। कहने का तात्पर्य यह है कि सही ढंग से एससी, एसटी, एक्ट की पैरवी नहीं की क्योंकि यह मामला मूलनिवासी समाज के अहम हिस्से से सम्बंधित है। इसकी जानकारी सरकार को अच्छी तरह से है। 


इसलिए भाजपा सरकार ने कोई तर्क संगत पैरवी नहीं की और न ही इस मामले में किसी प्रकार की सक्रियता भी दिखाई। ऊपर से बन्द में मारे गये निर्दोश लोगों की मौत पर जरा भी अफसोस जताने की कोशिश में नहीं की गई।


सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी, एसटी एक्ट पर दिए गये फैसले के खिलाफ किए गये भारत बंद के सात कारण थे जो इस प्रकार से हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च 2018 को अपने फैसले में आदेश दिया है कि एससी, एसटी, एक्ट के तहत सरकार द्वारा गिरफ्तारी ना की जाये और इस एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मुकदमें में तुरन्त ही अग्रिम जमानत दी जाय। 


पुलिस को 7 दिन में जांच करनी चाहिए तथा सरकारी अधिकारी या कर्मचारी की गिरफ्तारी नियुक्ति प्राधिकारी की अनुमति के बिना नहीं ली जा सकती है। इस प्रकार सर्वोच्च अदालत ने इस एक्ट को पूरी तरह से प्रभाव शून्य बना दिया जिसको एससी, एसटी के खिलाफ होने वाले मनुवादी मानसिकता के बीमार लोगों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए बनाया गया था। 


जिसको शासक वर्ग ने सीधे निष्क्रिय न करके अपने वर्चस्व वाली न्यायपालिका का सहारा लिया है। इस एक्ट में बदलाव करके यानि एससी, एसटी एक्ट को निष्क्रिय करके मनुवादी मानसिकता के लोगों ने इन वर्गों के खिलाफ अत्याचारों की खुली छूट दे दी है जो एक प्रकार से एससी, एसटी वर्ग में भय निर्माण करने का हथकण्डा है। 


ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि शासक जातियों को आज यह भली भांति पता चल चुका है कि एससी, एसटी अब लामबन्द होकर मनुवाद के खिलाफ उग्र होकर आन्दोलन में सहभाग करने लगा है और अब वह शासक वर्ग के राजनैतिक दलों का समर्थन न करके फुले-शाहू-अम्बेडकर की विचारधारा के पक्ष में धु्रवीकृत हो रहा है। जिसका आन्दोलन आज बामसेफ, भारत मुक्ति मोर्चा चला रहा है। इतना ही नहीं देश में मनुवाद की बुनियाद कहे जाने वाले ओबीसी को भी यही  जगाने का काम कर रहा है। 


जो आज इन विदेशी यूरेशियन की सारी षड्यंत्रकारी साजिशों से परिचित हो रहा है जिसके चलते वह भी अब शासक वर्ग के खिलाफ लामबन्द हो रहा है क्योंकि बामसेफ के माध्यम से आज ओबीसी को अपने महापुरूषों की उन महत्वपूर्ण बातों का पता चल रहा है जिसको शासक वर्ग ने हमेशा ही छिपाने का काम किया। इसी बात को ध्यान में रखकर ही शासक वर्ग के वर्चस्व वाली न्यायपालिका ने अनुसूचित वर्गों के रक्षा कवच से छेड़खानी की है। 


छेड़खानी करके एससी, एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को प्रभावहीन किया गया है। आज देश में एससी, एसटी एक्ट से इन वर्गों के खिलाफ अत्याचार बन्द नहीं हो रहे हैं। उसका सीधा कारण शासक वर्ग है। सत्ता में एससी, एसटी, ओबीसी और मायनॉरिटी सब पर जुल्म हो रहा है जिसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार शासक वर्ग और उसी की अत्याचारी व्यवस्था है जो भारत के इन मूलनिवासियों को अपनी व्यवस्था का गुलाम बनाने की लिए तरह-तरह के हथकण्डे अपना रहा है। इन्हीं अत्याचारों को खत्म करने का एकमात्र समाधान राष्ट्रव्यापी जनआन्दोलन है जिसकी अगुवाई भारत मुक्ति मोर्चा कर रहा है।

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