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भाजपा द्वारा आरक्षण का समर्थन क्यों?

Published On :    7 Apr 2018   By : MN Staff
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देश की सत्ता में सत्तासीन संघ संचालित आज आरक्षण खत्म न करने की रट क्यों लगा रही है ऐसा वह मजबूरी में कर रही है जिससे आरक्षित वर्गों के अन्दर पनप रहे विद्रोह को शान्त किया जा सके। जिस पार्टी का जन्म ही संविधान और संवैधानिक अधिकारों का विरोध करने के लिए ही हुआ है जिसने हमेशा ही मूलनिवासी बहुजनों के संवैधानिक अधिकारों का विरोध किया उसके द्वारा आरक्षण का समर्थन करना बहुत ही गम्भीर एवं चौकाने वाली बात है। 


जबकि सच्चाई यह है कि सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाली, देश में मनुका राज्य स्थापित करने वाली कांग्रेस पार्टी ने संदियों से अधिकार वंचित लोगों यानि मूलनिवासी बहुजनों को मिले अधिकारों को खत्म करने की शुरूआत कांग्रेस ने की।


जिसका भरपूर साथ और सहयोग भारतीय जनता पार्टी ने दिया है। जो आज आरक्षण खत्म करने की रट लगा रही है जो मूलनिवासी बहुजनों के हक एवं अधिकारों की कट्टर विरोधी रही है। कांग्रेस ने अपने 57 वर्ष के शासन काल में मूलनिवासी बहुजनों के संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता के आधार पर खत्म करने का काम किया है, और विपक्ष में रहकर भाजपा ने बखूबी उसका साथ दिया है। 


यानि कि मतलब साफ है कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी और बामपंथी दलों की नीतियां अलग अलग हैं लेकिन उका उद्देश्य एक है ये सभी दिखने में अलग है लेकिन ये मिलकर हमेशा ही मूलनिवासी बहुजनों के खिलाफ नीतियां लागू करती रही हैं वही काम आज भी जारी है। 


ऐसा कदम ये मनुवादी दल क्यों उठा कर रहे हैं और इसका मकसद क्या है? जब इन प्रश्नों का शासक वर्ग कि इतिहास को ध्यान में रखकर आकलन करते हैं तो निष्कर्ष सामने आता है कि 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू हुआ। 


उस समय से इस देश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित हुआ और सभी वंचित वे सभी अधिकार मिले जिनको शासक वर्ग ने खत्म कर दिया था उसी दिन से भारत में मनुवाद का एक ही झटके में खात्मा हुआ था और मूलनिवासी बहुजन को शिक्षा सम्पित्ति और हजारां अधिकार मिले उन्हीं अधिकारों की बदौलत सन् 1970 के आसपास मूलनिवासी समाज में बुद्धिजीवी वर्ग का निर्माण हुआ तथा वह शासन प्रशासन में पहुंचने लगा तथा हर क्षेत्र में विदेशी यूरेशियन को टक्कर देने लगा जो इन सवर्णों को हजम नहीं हुआ तो इन विदेशी यूरेशियनों ने उसी समय विचार किया कि अभी तो केवल एससी, एसटी के मिले हक और अधिकारों से हमको इतनी परेशानी हो रही है अगर कहीं 52 प्रतिशत ओबीसी भी जागृत होकर अपने हक एवं अधिकारों की मांग करने लगा तो फिर हमारा क्या होगा? 


इसी संभावित खतरे को भांप कर कांग्रेस ने भाजपा के सहयोग से संविधान को बगैर हाथ लगाए ही मूलनिवासी बहुजनों के संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने की योजना पर काम करने लगी। तो यहां पर सवाल है कि ये संवैधानिक आरक्षण क्या है यह कितने प्रकार का होता है? इसकी जानकारी हमें होना चाहिए आरक्षण प्रतिनिधित्व का मामला है लोकतंत्र का प्राणतत्व प्रतिनिधित्व होता है यानि आरक्षण कोई रोजी रोटी या नौकरी का मामला नहीं बल्कि देश की लोकतांत्रिक मशीनरी में हिस्सेदारी का महत्वपूर्ण मामला है।


जो हमारे महापुरूषों में अर्थक संघर्षों के बाद अपने समाज के प्रति सच्ची निष्ठा से दिलाया है जिस पर शासक वर्ग की गिद्ध नजर हमेशा ही रही है यह कितना महत्वपूर्ण अधिकार है यह इसी बात से समझा जा सकता है कि इसे डा. बाबासाहब अम्बेडकर ने मौलिक अधिकारों में शामिल किया था क्योंकि वे इन विदेशी यूरेशियन लोगों की बदमासी को भलीभांति जानते थे इसलिए आरक्षण को इन लोगों की चरित्र धोखेबाजी को भांपकर मौलिक अधिकारों में शामिल किया तब जाकर हमें हजारों अधिकार प्राप्त हुए।


देश में लागू संविधान के अन्तर्गत संदियों से सभी मानवीय अधिकारों से वंचित लोगों को मानवता के सच्चे मसीहा डा. बाबासाहब अम्बेडकर ने संविधान बनाते समय मूलनिवासी बहुजनों की हिस्सेदारी के लिए तीन प्रकार के आरक्षण का प्रावधान किया सबसे पहला है राजनैतिक आरक्षण  दूसरा शिक्षा में आरक्षण तीसरा नौकरियों में आरक्षण।


इस प्रकार से केवल राजनैतिक आरक्षण को घटाया बढ़ाया जा सकता है लेकिन शिक्षा में आरक्षण और नौकरियों में आरक्षण खत्म करने का किसी भी विधिमण्डल को अधिकार नहीं है ना किसी निर्वाचित सरकार को भी खत्म करने का अधिकार है। संविधान में शिक्षा को आर्टिकल 21 में और नौकरियों में आरक्षण को अनुच्छेद 15(4), 16(4) में रखा गया इतना ही प्रमोशन में भी आरक्षण का प्रावधान किया गया है। शासक वर्ग हमेशा ही राजनैतिक आरक्षण को बढ़ाने का काम करता है तो जानकारी के आभाव में हमारे मूलनिवासी बहुजन समाज के लोग बहुत खुश होते हैं। 


कि हमारा आरक्षण बढ़ गया है इसको खत्म करने के समर्थन में तो बाबासाहब डा. अम्बेडकर ने भी सन् 1955 में बात कहीं थी। जिसको इन शासक जातियों ने जानबूझकर खत्म नहीं किया बल्कि शिक्षा में आरक्षण और नौकरियों में आरक्षण को खत्म करने के लिए कांग्रेस की सरकार ने 1990-91 में नई आर्थिक नीतियें की शुरूआत की जो मूलनिवासी बहुजनों के अधिकारों में डाका डालने की गम्भीर साजिश थी। 


जिसमें इस प्रकार का प्रावधान किया गया कि देश की शिक्षा सरकारी क्षेत्र एवं सरकार नियंत्रित क्षेत्र का एलपीजी के माध्यम से निजीकरण कांग्रेस ने शुरू किया और भाजपा ने उसका पूरा साथ सहयोग दिया आज उसी का परिणाम है कि कांग्रेस ने मूलनिवासी बहुजनों के 80 प्रतिशत अधिकार खत्म किये और शेष 20 प्रतिशत अधिकारों को खत्म करने का काम भाजपा सरकार कर रही है. 


जिसके कारण आज आरक्षण लगभग शून्य हो चुका है जो कुल मिलाकर भाजपा और कांग्रेस की मिली भगत का घातक परिणाम है आज अधिकांश सरकारी सेक्टर पूंजीपति, उद्योगिक घरानों के नियंत्रण में जा चुका है जिसका नतीजा है कि बहुजन समाज में पैदा हुए दलाल और भड़वे निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग कर रहे हैं जो संवैधानिक आरक्षण शून्य बनाने का हथकण्डा है। कुल मिलाकर आज शासक वर्ग ने आरक्षण पूरी तरह खत्म कर दिया है। 


जिसके लिए कांग्रेस, भाजपा और कम्युनिष्ट बराबर जिम्मेदार है जिसमें वर्तमान सत्ता  धारी भाजपा शून्य हो चुके आरक्षण को खत्म नहीं करने की रट लगा रही है। इन मनुवादी राजनैतिक दलों को सबक सिखाने का समय आ रहा है तो बहुजन समाज को इनकी अच्छे ढंग से खबर लेना चाहिए और ऐसा सबक इन सभी को सिखाना चाहिए कि ये दोबारा सत्ता में आने लायक ही न रहे तभी हम सच्चे अर्थों में फुले-शाहू-अम्बेडकर विचारधारा के सच्चे अनुयायी हैं ऐसा हमें प्रण करना होगा।

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