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शर्मशार होती देश की सबसे बड़ी पंचायत

Published On :    8 Apr 2018   By : MN Staff
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विधायिका लोकतंत्र का वह महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं जहां से हर प्रकार यानि मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। यह बात बाबासाहब डा. अम्बेडकर ने करीब छः दशक पहले कहीं थी लेकिन देश के मौजूदा हालात का आकलन करें तो आज शासक वर्ग की मेहरवानी से देश की सबसे बड़ी पंचायत शर्मसार हो रही है जिस पर आज यूरेशियन लोगों का अनियंत्रण कब्जा है। जिसमें महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने की बजाय उसका समय बरबाद कर रहा है। 


जिसका नाटक कांग्रेस भाजपा भलीभांति प्ले कर रही है। पिछले 5 मार्च 2018 से शुरू हुआ संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण भी लगभग पूरी तरह से हंगामें की भेट चढ़ गया है सत्र के पहले चरण में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई कर्कस बहस जिसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी के जुमलेबाज भाषणों के अलावा कुछ भी उल्लेखनीय काम नहीं हो सका। 


कथित आजादी के बाद भारत की सत्ता में सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भारतीय जनता पार्टी की रही हो। उनकी कोशिश हमेशा ही संसद को कम से कम चलाने उसकी उपेक्षा करने या उससे मुंह चुराने और उसका मनमाना इस्तेमाल करने की रही है। शासक वर्ग की इसी प्रवृत्ता के चलते ही देश की सबसे बड़ी पंचायत में हंगामा नारेबाजी हमारे लोकतंत्र का स्थायी भाव बन चुका है।


पिछले कुछ दशकों के दौरान शायद ही संसद का कोई ऐसा सत्र रहा होगा जिसका आधे से ज्यादा समय हंगामें की भेट न चढ़ा हो, देश के 70 सालों के संसदीय इतिहास में यह पहला अवसर है जब देश का आम बजट और वित्त विधेयक बगैर किसी बहस के पारित हुआ ऐसा ही इतिहास छः माह पूर्व भी इसी मोदी राज में रचा गया था जिस समय संसद का शीतकालीन सत्र का आयोजन किया गया था। 


जो विपक्ष के दबाव में महज खाना पूर्ति के लिए आयोजित किया गया था जो बेहद संक्षिप्त महज 14 दिन ही चला था, किसी भी संसदीय लोकतंत्र में संसद यानि विधायिका चले और जनहित के गम्भीर मुद्दों पर अधिक सार्थक बहस होना चाहिए यह जिम्मेदारी विपक्ष की होती है।


मगर सत्तासीन सरकार की जिम्मेदारी कहीं और अधिक होती है लेकिन वर्तमान समय में पूरे सत्र के दौरान सत्ताधारी मोदी सरकार की तरफ से इस प्रकार की कोई इच्छा या कोशिश फिल हाल नहीं दिखी। संसद की कार्यवाही देखकर तो यहां लग रहा था कि वर्तमान समय में कांग्रेस और भाजपा ने मिली भगत करके विधायिका को जंग का मैदान बना दिया है और पीठासीन अधिकारी केवल मूक दर्शक बनकर इस जंग के मैदान में निर्वाचित प्रतिनिधियों से शान्ती बनाये रखने की अपील करते नजर आये जो संसद की कार्यवाही स्थगित करते रहे। 


वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति की ओर से भी संसद को चलाने की ऐसी कोई संजीदा पहल करते नजर नहीं आये जिससे संसद की कार्यवाही सुचारू से चल सके। वर्तमान समय में दोनों सदनों में कार्यवाही का बराबर स्थगित होना सरकार के मनमाफिक ही था। अगर स्थिति इस प्रकार की नहीं बनती और संसद का संचालन सुचारू से चलता तो सरकार को कई मोर्चों पर घेरा जा सकता था। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है क्या भारत में वर्तमान परिस्थितियों में संसद में वास्तविक विपक्ष है। 


जब इसका ठीक से आंकलन करते हैं तो यह निष्कर्ष निकलता है भारत में वास्तविक रूप से विपक्ष कोई है ही नहीं। जिससे जनहित के मुद्दों पर चर्चा होने की बजाय केवल संसद का समय बरबाद किया जा रहा है यह केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि सत्ता पक्ष भी यूरेशियन है और विपक्ष भी यूरेशियन लोगों का ही है। 


जो जनहित पर चर्चा करने की बजाय केवल अपने स्वहित में संसद का समय जाया करते नजर आ रहे हैं जो वास्तविक लोकतंत्र की निशानी नहीं कही जा सकती है। सत्ता पक्ष और विपक्ष में एक जाति का नेतृत्व होने के कारण वर्तमान समय में संसद का समय सिर्फ हंगामें नारेबाजी की भेट चढ़ गया। जिसके कीमती समय का आंकलन किया जाय तो संसद की कार्यवाही में देश के करोड़ों किसानों मजदूरों की खून पसीने की कमाई पानी की तरह बहा दी।


संसद की कार्यवाही में कितना रूपये खर्च होता है इसको सुनकर आप चौंक जायेंगे आंकड़ों के अनुसार संसद की कार्यवाही में महज एक मिनट में 2.50 लाख रूपये खर्च होते हैं अगर इसका प्रतिघण्टा वार आकलन किया जाये तो 150 करोड़ रूपये प्रति घण्टे संसदीय कार्यवाही पर खर्च होता है। इसको यदि दिन में आकलन किया जाय तो एक दिन की कार्यवाही में 1800 करोड़ रूपये खर्च होते हैं। 


इतनी महत्वपूर्ण कार्यवाही के प्रति आज के निर्वाचित प्रतिनिधि कितने गम्भीर है कि उन्होंने संसद का कीमती समय के 30 दिन बगैर मतलब के नारेबाजी और हंगामें की भेट चढ़ा दिये। अगर मानलिया जाय की शासक वर्ग ने संसद की कार्यवाही 30 दिन तक नहीं चलने दी तो इसका मतलब यह हुआ कि 1800x30=54000 करोड़ का देश को चूना लगा दिया। यह सत्ता पक्ष और विपक्ष की मिली भगत का परिणाम है। 


अगर देश में वास्तविक विपक्ष होता और वह ठीक से अपनी भूमिका अदा करता तो सत्ता पक्ष की बोलती बन्द की जा सकती थी कारण साफ है कि सत्ता पक्ष एवं विपक्ष एक ही जाति का होने के कारण मोदी राज में बेपटरी होती अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारों की फौज, नित नये उजागर होते घोटाले जिसमें सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेतृत्व के करीबी लोगों की भूमिका और उनका जनता की गाढ़ी कमाई लूटकर विदेश भागना, लड़ाकू विमानों का विवादास्पद सौदा, देश के विभिन्न भागों में जातीय और साम्प्रदायिक तनाव तथा कश्मीर में बिगड़ते हालात आदि महत्वपूर्ण मुद्दों पर वास्तविक विपक्ष नहीं होने के कारण सार्थक बहस नहीं होना सच्चे लोकतंत्र की निशानी नहीं कहा जा सकता है।


यह सब एक जाति विशेष के लोगों की सत्ता पर अनियंत्रित कब्जे के कारण हो रहा है जिसके कारण अब मूलनिवासी बहुजनों को इस अनियंत्रित सत्ता के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए अभी से प्रण करके पूरे बंदोवस्त के साथ भारत मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में कमर कसकर उतरना होगा तभी मूलनिवासियों की सम्पूर्ण आजादी का लक्ष्य हासिल होगा।

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