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मूलनिवासी बहुजनां की सम्पूर्ण आजादी की जंग

Published On :    11 Apr 2018   By : MN Staff
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भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब विदेशी यूरेशियन ब्राह्मणों द्वारा उत्पन्न विनाशकारी प्रक्रियाएें मूलनिवासी बहुजन समाज को प्रताड़ित करती है, उनका शोषण करती है, अन्याय अपनी चरम सीमा पार कर जाता है, तब किसी न किसी महान क्रान्तिकारी का जन्म होता है। 


यही कारण है माली समाज में (जो कि ब्राह्मणों के अनुसार शूद्र मानी जाती है) 11 अप्रैल 1827 को माता चिमणाबाई के गर्भ से राष्ट्रपिता जोतिराव फुले का जन्म हुआ। 


इनके पिता का नाम श्री गोविन्द राव फुले था, इनकी पत्नी का नाम साबित्री बाई फुले था। राष्ट्रपिता जोतिराव फुले का जीवन अत्यन्त कठिनतम संघर्षों का एक ऐतिहासिक मिसाल है। लेकिन भारतीय इतिहास में कहीं भी देखने को नहीं मिलता है।


राष्ट्रपिता जोतिराव फुले ने अपनी सारी जिंदगी 85 प्रतिशत मूलनिवासियों की आजादी के लिए लगाई। मूलनिवासी बहुजनों की आजादी की सर्वप्रथम लड़ाई लड़ने वाले राष्ट्रपिता जोतीराव फुले ही हैं। 


जिन्होंने मूलनिवासियों के अंदर आजादी की चाहत पैदा की और संघर्ष किए इसलिए इनको  सर्वप्रथम क्रान्तिकारी माना गया है। इसी के साथ मूलनिवासी समाज ने उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधी से भी नवाजा है। लोगों को आज भी यह भ्रम है कि देश के राष्ट्रपिता गांधी हैं। 


मगर सही मायने में इतिहास का अवलोकन किया जाये तो पता चलता है कि भारत की मूलनिवासी बहुसंख्यक समाज के राष्ट्रपिता गांधी नहीं, बल्कि जोतिराव फुले हैं। यह अकाट्य सत्य आज भी 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज को पता नहीं है। 


क्यों नहीं पता है? क्योंकि उनका जो सच्चा इतिहास है वह शासक वर्ग ने छुपा दिया है और मूलनिवासियों के इतिहास के ऊपर ब्राह्मणवाद का इतिहास खड़ा कर दिया है। इसलिए जिंदगी भर ब्राह्मणवाद की दलाली करने वाले और उसकी मलाई चाटने वाले गांधी को मूलनिवासियों ने राष्ट्रपिता मान लिया। 


क्योंकि देश के शासक वर्ग ने उनके सच्चे राष्ट्रपिता जोतीराव फुुले को छुपा लिया और नकली राष्ट्रपिता गांधी को मूलनिवासियों के सामने प्रोजेक्ट कर दिया और मूलनिवासियों ने मान भी लिया कि गांधी ही हमारे राष्ट्रपिता हैं। अगर देश के 85 प्रतिशत मूलनिवासियों ने अपने इतिहास का अध्ययन किया होता तो उन्हें पता चलता कि गांधी तो सपने में भी राष्ट्रपिता नहीं हो सकता। 


जिसने अपनी सारी जिन्दगी मूलनिवासियों का राम नाम सत्य करने में लगाया और ब्राह्मणवाद का पालन-पोषण करता रहा, वह हमारा और हमारे देश का राष्ट्रपिता कैसे हो सकता है? हमारा राष्ट्रपिता तो वही हो सकता है जिसने हमारी आजादी के लिए अपनी जान की बाजी लगाई हो, हमें ब्राह्मणवाद से मुक्त करने के लिए अपनी जान को जोखिम में डालकर 85 प्रतिशत मूलनिवासियों को ब्राह्मणवाद के जहर से बचाने का काम करता रहा। 


क्या हम ऐसे आदमी को राष्ट्रपिता कहें जिसने हमारा राम नाम सत्य करने के लिए अपनी जान भी देने के लिए तैयार था? क्या हम उस व्यक्ति को राष्ट्रपिता कहें, जिसने हमारे बाबासाहब अम्बेडकर को मजबूर करके पूना-पैक्ट के तहत समाज में दलाल और भड़वों का निर्माण किया। 


क्या हम उस व्यक्ति को राष्ट्रपिता कहें, जिसने यह तक कह दिया था कि अगर अंग्रेज लोग अलग से अछूतों को अर्थात इस देश के मूलनिवासियों को आजादी देते हैं तो ऐसी आजादी हमें हरगिज नहीं चाहिए? क्या ऐसा पाखंडी और धूर्त व्यक्ति हमारा और हमारे देश का राष्ट्रपिता हो सकता है? हां यह जरूर कहा जा सकता है कि ऐसा व्यक्ति जिसने सारी जिंदगी ब्राह्मणवाद की गुलामी की और ब्राह्मणवाद को बढ़ाता रहा वह विदेशी यूरेशियन ब्राह्मणों का राष्ट्रपिता हो सकता है और भारत के चन्द लोग जो ब्राह्मणवाद का समर्थन करते हैं उनके राष्ट्रपिता हो सकते हैं। 


मगर यह कहा जाये कि गांधी जी पूरे देशवासियों के राष्ट्रपिता हैं तो यह पूरी तरह से देशवासियों के ऊपर ‘मान न मान, मैं तेरा मेहमान’ वाली जैसी कहावत होगी। खैर यहां पर मूलनिवासियों के राष्ट्रपिता, गांधी हैं या उनका पुरखा जोतिराव फुले हैं? इस पर काफी विस्तार से बताने के लिए अलग से लिखित चर्चा किया जायेगा। 


मगर यहां पर हम अपने उन महापुरूष को जानना और समझना चाहते हैं जिन्होंने 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज को ब्राह्मणों की गुलामी से आजाद करने के लिए लड़ाई लड़ी। यहां पर जोतिराव फुले की एक बहुत  ही महत्वपूर्ण बात याद आती है, जिसमें राष्ट्रपिता जोतीराव फुले ने ‘ब्राह्मणवाद’ का पोस्टमार्टम (चीरफाड़) करते हुए कहा है कि ‘जिस तरह से अमरबेल बिना जड़ के होती है और जिस वृक्ष पर डाल दी जाती है, उसे खोखला करके सुखा देती है और उसका अस्तित्व हमेशा-हमेशा के लिए मिट जाता है जबकि वह खुद हरी-भरी रहती है।


इसलिए देश का 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज यह समझ ले कि ‘ब्राह्मणवाद’ अमरबेल है। जो हमें बरबाद कर खुद आबाद रहती है। राष्ट्रपिता जोतीराव फुले ने कर्म के बजाए जन्म पर आधारित कलुषित ब्राह्मणवाद को समूल नष्ट करने का वीणा उठाया। उन्होंने जाति व्यवस्था जो ब्राह्मणों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से बनायी गयी है उसका जमकर विरोध किया और सिर्फ विरोध ही नहीं किया, बल्कि उसका खात्मा करने के लिए मूलनिवासियों को जागृति का हथियार भी दिया। 


जिसके जरिए मूलनिवासी, ब्राह्मणों की हर एक कलुषित विचारधारा को मटियामेट कर सकता है और हमेशा-हमेशा के लिए ब्राह्मणवाद की खटिया खड़ी कर सकता है। जोतिराव फुले ने सबसे पहले जागृति का मशाल इस देश की मूलनिवासी महिलाओं को थमाया। 


क्यांकि जोतीराव फुले यह जानते थे कि यदि पुरूष के बजाए मूलनिवासी महिलाओं को शिक्षित किया जाए तो पूरा मूलनिवासी बहुजन समाज और इसकी आने वाली पीढ़ी अपने आप शिक्षित हो जायेगी। शिक्षित नारी अपने बच्चों को हर हालत में शिक्षा दिलायेगी। यदि उसकी आर्थिक परिस्थिति अच्छी नहीं है तो वह अपने ज्ञान से ही घर में बच्चों को पढ़ायेगी। 


सन् 1848 ई. में पूना स्थित भिडे हवेली में राष्ट्रपिता जोतीराव फुले ने पहली पाठशाला खोलकर ब्राह्मणवाद की खटिया खड़ी कर दी और ब्राह्मणवाद के पिताश्री यूरेशियन ब्राह्मणों की बुद्धि को ठिकाने लगा दिया। इसीलिए तो कहा जाता है कि भारत का वह प्रत्येक नागरिक जो मूलनिवासी है, जब वह जोतीराव फुले की बात करता है तो उसके अंदर एक क्रान्तिकारी योद्धा की झलक दिखाई देती है।


मगर आज अफसोस इस बात का है कि राष्ट्रीय जनसंख्या के आधार पर 52 प्रतिशत हमारा मूलनिवासी ओबीस समाज होते हुए भी जोतीराव फुले के संगठन, जागृति एवं उनकी विचारधारा को महत्व नहीं दे रहा है, बल्कि विदेशी ब्राह्मणों के साथ अतीत से ही गांधी द्वारा चलाये गये ‘ब्राह्मणों की आजादी के आंदोलन’ में पूर्ण सहयोग देते रहा, फलस्वरूप हमारा पिछड़ा समाज न तो आज तक स्वयं ऊंचा बन सका और न ही सवर्णों ने उनका ऊंचा बनना स्वीकार किया। 


यहां तक कि सर्वप्रथम उनकी आजादी की लड़ाई लड़ने वाला जोतीराव फुले का संघर्ष भी याद नहीं रहा। यदि यह सब उन्हें याद रहता तो आज हमारे पिछड़े समाज को अपने उत्थान एवं अधिकारों की प्राप्ति के लिए किसी के मुँह की तरफ देखना नहीं पड़ता। 


85 प्रतिशत मूलनिवासियों के आजादी के लिए किये गये आजीवन संघर्ष के लिए महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण 85 प्रतिशत मूलनिवासी समाज को राष्ट्रपिता जोतीराव फुले की क्रान्ति और कर्तव्य का अनुसरण करना होगा, और भारत मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन को कामयाब बनाकर राष्ट्रपिता जोतिराव फुले सहित मूलनिवासी समाज के सभी संत महापुरूषों के अधूरे आन्दोलन को पूरा करते हुए आजादी हासिल कर सकता है।

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