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चुनाव आयोग का महाघोटाला

Published On :    12 Apr 2018   By : MN Staff
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चुनाव आयोग हैदराबाद स्थित ईसीआईएल और बेंगलुरु स्थित बीईएल से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें खरीदता है। ईवीएम खरीदी को लेकर दोनों कंपनियों और ईसी के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की खरीदारी में हुई अब तक की सबसे बड़ी धांधली का सनसनीखेज खुलासा सामने आया है जिससे भारत में तहलका मचा दिया है। 


लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा है कि चुनाव आयोग जनता के साथ इतना बड़ा विश्वासघात भी कर सकता है। इस बात का खुलासा उस समय हुआ जब सूचना के अधिकार (आरटीआाई) के तहत मांगी गई जानकारी में ईवीएम सप्लाई करने वाली दो कंपनियों और चुनाव आयोग के आंकड़ों में बड़ी गड़बड़ी सामने आई। 


आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक कंपनियों ने जितनी मशीनों की आपूर्ति की है और चुनाव आयोग को अब तक जितनी मशीनें मिली हैं उनमें करीब 19 लाख का अंतर है। अब सवाल यह है कि आखिर 19 लाख मशीनें गयी कहां? इसकी जवाबदेही कौन अपने ऊपर लेगा?


गौरतलब है कि चुनाव आयोग दो सार्वजनिक क्षेत्र की ईवीएम आपूर्तिकर्ता संस्थान इलेक्ट्रानिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलुरु से ईवीएम खरीदता है। हालांकि दोनों कंपनियों और चुनाव आयोग द्वारा आरटीआई के तहत सामने आये आंकड़ों में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिला। 


इसके अनुसार ईवीएम की खरीद-फरोख्त में गंभीर घालमेल देखने को मिला है, इससे पता चलता है कि यह एक बड़ा षड्यंत्र है, जो उलझता ही जा रहा है। इसके लिए बॉम्बे हाईकोर्ट से पूरे मामले की जांच की मांग की है। सन् 1989-1990 से 2014-2015 तक के आंकड़ों के आंकलन पर चुनाव आयोग का कहना है कि उन्हें बीईएल से 10 लाख 5 हजार 662 ईवीएम मशीनें प्राप्त हुईं। वहीं बीईएल का कहना है कि उसने 19 लाख 69 हजार 932 मशीनों की आपूर्ति की है। 


अब दोनों के आंकड़ों में 9 लाख 64 हजार 270 का अंतर साफ दिख रहा है। ठीक यही स्थिति ईसीआईएल के साथ भी है, जिसने 1989 से 1990 और 2016 से 2017 के बीच 19 लाख 44 हजार 593 ईवीएम की आपूर्ति की थी, लेकिन चुनाव आयोग ने कहा कि उन्हें केवल 10 लाख 14 हजार 644 मशीनें ही प्राप्त हुईं हैं। यानी यहां भी 9 लाख 29 हजार 949 मशीनों का भारी अंतर मिला है। 


इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात तो यह है कि पहले की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि चुनाव आयोग के अनुसार, बीईएल से ईवीएम की खरीद पर 536.02 करोड़ का कुल खर्च हुआ है, जबकि बीईएल का कहना है कि उसे 652.56 करोड़ मिले हैं। यहां ईवीएम के खर्च में भी बहुत भारी अंतर है। जबकि ईसीआईएल से ईवीएम मंगाने पर चुनाव आयोग के खर्च की जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि चुनाव आयोग और ईवीएम बनाने वाली दोनों कंपनियों ने ईवीएम खरीद में भी महाघोटाला किया है, जिसके लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार है।


दिलचस्प बात तो यह है कि ईसीआईएल ने बताया कि उसने 2013-2017 से 2013-2014 के बीच किसी भी राज्य में एक भी ईवीएम की आपूर्ति नहीं की थी, फिर भी ईसीआईएल को चुनाव आयोग के माध्यम से मार्च से अक्टूबर 2012 के बीच महाराष्ट्र सरकार से 50.64 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त हुई। अब सबसे अहम सवाल यह है कि आखिरकार ईवीएम की दो कंपनियों से मिले आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर क्यों है? बीईएल और ईसीआईएल द्वारा आपूर्ति की जाने वाली अतिरिक्त मशीनें वास्तव में कहां गईं? यह गड़बड़ी ईवीएम पर हुए खर्च में मिली है। 


यही नहीं पुरानी ईवीएम नष्ट करने के आंकड़े भी स्पष्ट नहीं है। आंकड़ों के अनुसार 21 जुलाई 2017 को चुनाव आयोग ने कहा कि उसने कोई भी ईवीएम रद्दी में नहीं बेचा है। वहीं, ऐसा माना जाता है कि 1989-1990 की ईवीएम को निर्माताओं द्वारा स्वयं नष्ट कर दिया गया था। चुनाव आयोग ने कहा है कि 2000-2005 के बीच उन्हें मिली (पुरानी, खराब, अपूर्ण) ईवीएम को नष्ट करने की प्रक्रिया अभी भी विचाराधीन है। 


यानी इससे साफ होता है कि सभी मशीनें अब भी चुनाव आयोग के कब्जे में हैं। जो भारत निर्वाचन आयोग की घपलेबाजी का प्रमाण है। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि चुनाव आयोग भी ईवीएम घोटाले में शामिल है जो लोकतंत्र की हत्या करने का पूरी तरह से जिम्मेदार है। क्योंकि चुनाव के समय पूरी प्रक्रिया आयोग निर्देश पही ही सम्पन्न होती है।

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