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महाड़ सत्याग्रह की एतिहासिकता

Published On :    21 Mar 2018   By : MN Staff
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डॉ.आंबेडकर के नेतृत्व में चलाया गया महाड सत्याग्रह शूद्रो-अतिशूद्रों के संघर्षों के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके माध्यम से ब्राह्मणवाद-मनुवाद को खुली चुनौती दी गई थी। इस सत्याग्रह के नब्बे वर्ष पूरे हो रहे हैं। 


क्या है इसकी ऐतिहासिक महाता, आईये इसकी प्रासंगिकता के बारे में जानते हैं। 

भारत के सामाजिक आन्दोलन में महाड़ क्रान्ति दिवस के नाम से जाने जाते चवदार तालाब के ऐतिहासिक सत्याग्रह को तथा उसके दूसरे दौर में मनुस्मृति दहन की चर्चित घटना को दलित शोषितों के विमर्श में वही स्थान, वही दर्जा प्राप्त है जो हैसियत फ्रांसिसी क्रांति की यादगार घटनाओं से सम्बन्ध रखती है। 


यूं कहने के लिए तो उस दिन अछूतों ने और ऐसे तमाम लोगों ने जो अस्पृश्यता की समाप्ति के लिए संघर्षरत थे, महज तालाब का पानी पिया था लेकिन रेखांकित करनेवाली बात यह थी कि इस छोटे से दिखनेवाले इस कदम के जरिये उन्होंने हजारों साल से जकड़ बनायी हुई ब्राहमणवादी व्यवस्था के खिलाफ बगावत का ऐलान किया था।

जानवरों को भी जिस तालाब पर जाने की मनाही नहीं थीं, वहां पर इन्सानियत के एक हिस्से पर धर्म के नाम पर सदियों से लगायी गयी इस पाबंदी को तोड़ कर वह सभी नयी इबारत लिख रहे थे। 


यह अकारण नहीं कि महाड़ सत्याग्रह के बारे में मराठी में गर्व से कहा जाता है कि वही घटना ‘जब पानी में आग लगी थी’ उसने न केवल अछूतों आत्मसम्मान की स्थापना की बल्कि एक स्वतंत्रत राजनीतिक सामाजिक ताकत के तौर पर उनके भारतीय जनता के बीच अपने आगमन का संकेत दिया था। 


अछूतों द्वारा खुद अपने नेतृत्व में की गयी यह मानवाधिकारों की घोषणा एक ऐसा हुंकार था जिसने भारत की सियासी तथा समाजी हलचलों की शक्लोसूरत हमेशा के लिए बदल दी। एक हिन्दू पुरूष या स्त्री, जो कुछ भी वह करते हैं, वह धर्म का पालन कर रहे होते हैं। 


एक हिन्दू धार्मिक तरीके से खाना खाता है, पानी पीता है, धार्मिक तरीके से नहाता है या कपड़े पहनता है, धार्मिक तरीके से ही पैदा होता है, शादी करता है और मृत्यु के बाद जला दिया जाता है। उसके सभी काम पवित्र काम होते हैं। 


एक धर्मनिरपेक्ष नजरिये से वह काम कितने भी गलत क्यों न लगें, उसके लिए वह पापी नहीं होते क्योंकि उन्हें धर्म के द्वारा स्वीकृति मिली होती है। अगर कोई हिन्दू पर पाप करने का आरोप लगाता है, उसका जवाब होता है, ‘अगर मैं पाप करता हूं, तो मैं धार्मिक तरीके से ही पाप करता हूं।’ 


वह तीस का दशक था जिसने ऐतिहासिक महाड सत्याग्रह को एक पृष्ठभूमि प्रदान की। सभी जानते हैं कि देश और दुनिया के पैमाने पर यह एक झंझावाती काल था। महान सर्वहारा अक्तूबर क्रांति के पदचाप भारत में भी सुनाई दे रहे थे। 


नये आधार पर एक नयी कम्युनिस्ट पार्टी बनाने की योजनाएं आकार ग्रहण कर रही थीं। यही वह काल था जब गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने असहयोग आन्दोलन में जोरदार हिस्सा लिया था। 


जातिप्रथा की मुखालिफत करते हुए देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक सामाजिक हलचलें भी इन दिनों तेज हो रही थीं। पतुआखली, वैकोम आदि स्थानों पर होनेवाले सत्याग्रहों के जरिये ब्राहमणवाद तथा जातिप्रथा की जकड़न को चुनौती दी जा रही थी। 


यही वह दौर था जब असहयोग आन्दोलन की असमय समाप्ति के बाद देश में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने के मसले सामने आने लगे थे और हिन्दू तथा मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठनों की गतिविधियों में तेजी देखी गयी थी। 


इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1923 में बम्बई विधान परिषद् में रावसाहेब बोले की पहल पर यह प्रस्ताव पारित हुआ कि सार्वजनिक स्थानों पर अछूतों के साथ होने वाले भेदभाव पर रोक लगायी जाये। बहुमत से पारित इस प्रस्ताव के बावजूद तीन साल तक यह प्रस्ताव कागज पर ही बना रहा। 


उसके न अमल होने की स्थिति में 1926 में जनाब बोले ने नया प्रस्ताव रखा कि सार्वजनिक स्थानों, संस्थानों द्वारा इस पर अमल न करने की स्थिति में उनको मिलने वाली सरकारी सहायता राशि में कटौती की जाय। 


विलायत से अपनी पढ़ाई पूरी करके लौटे बाबासाहेब आम्बेडकर अछूतों शोषितों के बीच जागृति तथा संगठन के काम में जुटे थे, उन्हीं दिनों महाड़ तथा आसपास के कोंकण के इलाके के अछूतों के बीच सक्रिय लोगों ने एक सम्मेलन की योजना बनायी तथा उसके लिए डॉ.अंबेडकर को आमंत्रित किया। 


इस सम्मेलन के प्रमुख संगठनकर्ता थे रामचंद्र बाबाजी मोरे (1903-1972) जिन्होंने अपनी सामाजिक गतिविधियों से पहले से इलाके में अलग पहचान बनायी थी और उनकी अगुआई में कुछ माह पहले ही क्राफोर्ड तालाब सत्याग्रह का आयोजन हुआ था जिसमें सार्वजनिक जल स्रोतों पर अछूतों के समान अधिकार का दावा रेखांकित किया गया था। 


इसे संयोग कहा जाना चाहिए कि महाड़ ही वह भूमि थी जहाँ पर बाबासाहेब के पूर्ववर्ती महात्मा फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज के अछूतों के अग्रणी कार्यकर्ता गोपालबुवा वलंगकर ने अपने जनजागृति की शुरूआत की थी। 


महाड़ उसी कोंकण का इलाका है जहां के एक गांव के स्कूल में बाबासाहब का बचपन बीता था। तीसरा अहम संयोग यह था कि बम्बई विधानपरिषद के प्रस्ताव के बाद महाड़ नगरपालिका ने अपने यहां एक प्रस्ताव पारित कर अपने यहां के तमाम सार्वजनिक स्थान दलितों के लिए खुले करने का निर्णय लिया था। 


महाड़ के वीरेश्वर थिएटर में हो रहे इस सम्मेलन में लगभग तीन हजार लोग एकत्रित थे जिनमें महिलाएं भी भारी संख्या में उपस्थित थीं। सम्मेलन के अपने धारदार भाषण में बाबासाहब ने सदियों से चली आ रही ब्राहमणवाद की गुलामी की मानसिकता से विद्रोह करने के लिए दलितों तथा अन्य शोषितों का आवाहन किया।


महाड़ सत्याग्रह की चर्चित घोषणा में उन्होंने कहा कि ‘‘तीन चीजों का तुम्हें परित्याग करना होगा। उन कथित गंदे पेशों को छोड़ना होगा जिनके कारण तुम पर लांछन लगाये जाते हैं। दूसरे, मरे हुए जानवरों का मांस खाने की परम्परा को भी छोड़ना होगा। 


और सबसे अहम है कि तुम उस मानसिकता से मुक्त हो जाओ कि तुम ‘अछूत’ हो’’ उनका यह भी कहना था कि ‘‘क्या यहां हम इसलिये आये हैं कि हमें पीने के लिए पानी मयस्सर नहीं होता है? क्या यहां हम इसलिये आये हैं कि यहां के जायकेदार कहलानेवाले पानी के हम प्यासे हैं? नहीं, दरअसल इन्सान होने का हमारा हक जताने हम यहां आये हैं।’’ 


सम्मेलन की औपचारिक समाप्ति तथा धन्यवाद ज्ञापन के बाद दृ जिसे महाड़ के सामाजिक कार्यकर्ता अनंत चित्रे ने रखा, उन्होंने बाद में सम्मेलन को सम्बोधित किया और लोगों का आवाहन किया कि प्रस्तुत सम्मेलन को एक महत्वपूर्ण काम को अंजाम दिए बिना पूरा नहीं समझा जाना चाहिए। 


उनका कहना था कि समाज में जारी छूआछूत की प्रथा के चलते आज भी इलाके के अछूतों को चवदार तालाब जो सार्वजनिक ताल

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