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बच्चियों से दरिंदगी, देश में मनुविधान लागू होने का प्रमाण

Published On :    19 Apr 2018   By : MN Staff
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महिलाओं और मासूम बच्चियों के साथ घटित हो रही वीभत्स घटनाएं इस बात का चीख-चीखकर प्रमाण दे रही है कि भारत में अब कानून का राज नहीं, बल्कि उस कानून का राज स्थापित हो चुका है, जिसका दंश सदियों से मूलनिवासी बहुजन समाज भुगत रहा है। यही देश की सत्ता पर काबिज शासक वर्ग के नीतियों का आधार है। 


इसी देश की मूलनिवासी बहुजन आबादी को सभी मानवीय हक एवं अधिकारों से वंचित करने का काम किया है। इसकी वजह से इस देश की सामाजिक व्यवस्था में वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था, ऊंचनीच, भेदभाव, क्रमिक असमानता, अलगीकरण और स्त्रीदासता पर आधारित व्यवस्था आज भी जिंदा है। 


जबकि इस देश में हमारे महापुरूषों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी एवं कठिन संघर्ष के माध्यम से इस देश में स्थापित ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करके इस अत्याचारी व्यवस्था का अंत ही नहीं किया, बल्कि इस देश में ऐसी व्यवस्था की स्थापना किया जिसमें सभी लोग बिना किसी भेदभाव और लड़ाई-झगड़े के रह सकें। जिसका जीता-जागता दस्तावेजी प्रमाण समतामूलक संविधान है। 


जिसमें भारत में रहने वाले शोषित, पीड़ित हर स्त्री, पुरूष के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ने का अधिकार दिया है, लेकिन जिस दिन से इस देश की सत्ता एवं व्यवस्था पर विदेशी ब्राह्मणों ने कब्जा किया जिसने पहले लोकसभा चुनाव 1952 से लेकर आज तक देश की लोकतांत्रिक   की सभी मशीनरी पर अनियंत्रित कब्जाकर इस देश में फिर से मनुस्मृति (मनुविधान) लागू करने में कामयाब हो चुका है, जिसके चलते आज देश में अराजकता का रिकार्ड टूट रहा है। तथा प्राथमिकता के आधार पर मूलनिवासी बहुजनों के हक एवं अधिकारों को खत्म कर रहा है।

आज शासक वर्ग ऐसी मानसिकता एवं विचारधारा के समर्थन में लोगों को मीडिया के माध्यम से खड़ा कर रहा है जिससे इस देश में महिलाओं के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लग गया है।। आज देश का मीडिया  ऐसी मानसिकता का प्रचार-प्रसार करने मे महारत हासिल कर चुका है जिसके माध्यम से महाभारत और रामायण जैसे राजनैतिक ग्रंथों की विचारधारा लोगों के दिलोदिमाग में बैठ चुकी है। 


जिसमें महिलाएं सिर्फ सेक्स सिम्बल बन चुकी हैं। आज देश का मीडिया, बालीवुड की फिल्म, धारावाहिक और विज्ञापन में केवल महिलाओं एवं लड़कियों को एक ऐसे एंगल पर दिखाने का काम कर रहा है जहां पर महिलाओं के प्रति लोगों के अंदर घातक प्रवृत्त का निर्माण हो रहा है जिसका परिणाम सामने है कि आज महिलाएं ही नहीं, बल्कि मासूम बच्चियां यौन हिंसा, बलात्कार एवं गैंग रेप की शिकार हो रही हैं। 


हाल ही में कठुआ, उन्नाव तथा सूरत में घटित घटनाओं में बेटियां मनुवादी मानसिकता का शिकार बन रही हैं। जिसमें अधिकांश लोग मनुवादी हैं या हिन्दुत्ववादी हैं, जिन्होंने प्रकृति की ऐसी अनमोल कृति को अपनी हवस का शिकार बना रहा है जो हमेशा ही प्रेम, बंधुत्व, भाईचारा की प्रतिमूर्ति बनकर हमेशा ही लाड़प्यार पाने की अपेक्षा रखती हैं। आज ब्राह्मणवादी मानसिकता और विचारधारा ने उस महिला जाति के अस्तित्व को ही झकझोर कर रख दिया है। 


इसका मूलकारण कोई और नहीं, बल्कि इन्हीं यूरेशिन ब्राह्मणों के पाखंडी ग्रंथ जिनको उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का दर्जा दे रखा है। जिसमें महाभारत, रामायण और सभी पुराण एवं स्मृतियां हैं, जिनको देश का मीडिया मसाला लगाकर प्रस्तुत करता है। जबकि असल सच्चाई तो यही है कि इन विदेशी यूरेशियन के द्वारा लिखे गये पांखडी धर्मग्रंथ रामायण एवं महाभारत महाकाव्य के नाम पर प्रचारित किया जाता है जो वास्तव में महिलाओं के मान-सम्मान और स्वाभिमान को चोट पहुंचाने के लिए ही लिखे गये राजनैतिक ग्रंथ हैं, जिनमें महिलाओं के लिए ऐसी-ऐसी गंदी भाषा का प्रयोग किया गया है जिसको मुंह से उच्चारित करने में भी शर्म आती है। 


उसी मानसिकता के डेली प्रचारित होने से आज महिलाओं एवं मासूम बेटियों को अत्याचारों, अमानवीयता का शिकार बनाया जा रहा है। जिसका परिणाम सामने है कि आज महिलाओं के अलावा मासूम बच्चियों को ब्राह्मणवादी भेड़ियों द्वारा हवस का शिकार बनाया जा रहा है। अभी कठुआ और उन्नाव गैंग रेप का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि उत्तर प्रदेश के एटा एवं गुजरात के राजकोट में क्रमशः 08 और 09 वर्ष की मासूमों को मनुवादी भेडियों ने निवाला बना डाला। 


यह देश में जबरन थोपी जा रही मनुवादी मानसिकता का परिणाम है जो इन विदेशी ब्राह्मणों के पाखंडी धर्मग्रंथों से निकलकर पूरे भारतीय समाज को दूषित कर रही है। आप अगर हम सभी मूलनिवासी बहुजनो को अपने समाज की बेटियों के मान-सम्मान, स्वाभिमानों को बरकरार रखना है तो हमें वर्ण, जाति, भेदभाव तथा ऊंचनीच पर आधारित व्यवस्था का परित्याग करना होगा। 


परित्याग करना ही नहीं, बल्कि समूल नाश करना तथा अभी से प्रयास करने का प्रण करना होगा और महिलाओं को अपनी अस्मिता एवं मानसम्मान और स्वाभिमान को बरकरार रखने के लिए अपनी मूलनिवासी समाज में जन्मी वीरांगनाओं और माताओं के प्रेरणास्रोत बनकर ब्राह्मणवादी विचारधारा के बीमार भेड़ियों को सबक सिखाने के लिए वीरांगना फूलन देवी से सीख लेनी होगी।

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