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ब्राह्मणों ने भारत में खत्म की वैज्ञानिक शिक्षा

Published On :    20 Apr 2018   By : MN Staff
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 बामसेफ का मूल उद्देश्य आजादी है और आजादी के उद्देश्य में सबसे महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा व्यवस्था है। ‘वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट’ में सबसे घटिया शिक्षा वाली सूची में भारत का नाम दूसरे स्थान पर है। आज जो स्थितियाँ बनी हैं और जो संरचना है, वह बहुत पहले से हमारे देश के विभिन्न हुक्मरानों के द्वारा तैयार किया गया।आज ये स्थिति है कि किसी समाज का आधार स्तम्भ शिक्षा है और विश्व में भारत का नाम सबसे घटिया वाली सूची में आ चुका है। 


विश्व बैंक किसी देश को क्यों सहायता करता है? उसके कुछ नियम हैं। जो देश गरीब और पिछड़ा होता है उस देश को विश्व बैंक सहायता प्रदान करता है तो सवाल ये उठता है कि क्या भारत गरीब देश है? क्या भारत पिछड़ा देश है? जब आप भारत के इतिहास को पढ़ेंगे, तो पता चलता है कि भारत का स्वर्णिम इतिहास रहा है कि भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। सोने की चिड़िया कहने का जो आधार था, आज उन आधारों को खत्म कर दिया गया है। उसी का परिणाम है कि भारत आज शिक्षा के मायने में सबसे घटिया वाली सूची में पहुँच गया है।

एक समय ऐसा भी था जब विश्व में शिक्षा के मामले में भारत पहले नम्बर पर था और उस समय भारत को विश्व गुरू कहा जाता था। विश्व के विभिन्न देशों के विद्यार्थी भारत में शिक्षा ग्रहण करने आते थे और उस समय को बौद्धिक काल के नाम से लोग पुकारते हैं। वो सम्राट अशोक का काल था। वो समय तथागत बुद्ध का समय था और दुनिया के लोग भारत में शोध करने आते थे। 


ऐसा क्या घटित हुआ कि उस व्यवस्था को खत्म करके भारत को इस कगार पर पहुँचा दिया गया है कि आज हम शिक्षा के मामले में सबसे बेकार स्थिति में हैं। हमारे हाथ-पैर कट चुके हैं और अब हम भारत में रेंगने का काम कर रहे हैं। ये बहुत विचारणीय प्रश्न है। बामसेफ इस क्रान्ति को जागृत करने का प्रयास कर रहा है। शिक्षा हमारे समाज के उन्नति के लिए बहुत बड़ा आधार है। तभी तो


बाबासाहब ने ये बात कही थी कि, ‘‘शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पीयेगा वही दहाड़ेगा।’’ स्वर्णिम भारत की जो शासन सत्ता रही है वो शासन सत्ता मूलनिवासियों के हाथ में रही है, लेकिन सम्राट बृहद्रथ मौर्य की हत्या के बाद ब्राह्मणों ने शासन सत्ता को अपने कब्जे में ले लिया। ब्राह्मणवादियों का मुख्य उद्देश्य यहाँ के वैज्ञानिक शिक्षा को नष्ट करना एवं आधारहीन बनाना है। 


अपने इन प्रयासों में वो काफी हद तक सफल भी हो रहा है और भारत की वैज्ञानिक शिक्षा को समाप्त कर दिया है। उसके परिणाम हमारे सामने हैं। हमारे देश में नालंदा और तक्षशिला, विक्रमशिला विश्वविद्यालय जैसे ज्ञान के अद्भुत भण्डारों को नष्ट कर दिया गया और आज काल्पनिक शिक्षा को काल्पनिक ज्ञान के रूप में परोसा जा रहा है। यह हमारे लिए गंभीर चिंतन का विषय है।

विश्व बैंक का आँकड़ा हमारे सामने है। ये पहले से नहीं था। 1991 में जो ब्राह्मणवादी सरकार थी, उन सरकारों ने भारत को मजबूर किया है। 1991 में एक बहुत बड़ा आर्थिक बदलाव किया गया। उस आर्थिक बदलाव में एक निजीकरण शब्द आया था।  निजीकरण का मूल उद्देश्य ही यही था कि शिक्षा से लेकर सम्पूर्ण  लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपंग बना देना। 


क्योंकि दुश्मन जानता है कि समान शिक्षा जब तक समाज में रहेगी, जब तक बौद्धिक विकास होता रहेगा तब तक पूरा समाज ऊपर उठता रहेगा। डॉ. बाबासाहब ने संविधान बनाया और उसमें प्रावधान किया कि किसी देश का निर्माण सरकारें करेंगी और ये सरकारें अपने देश के लोगों को तथा अपने देश के बच्चां को अच्छी और गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करेंगी। सरकार ने 1991 में नई आर्थिक नीति लागू करके अपने आपको इस जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया और शिक्षा को निजीकरण के हवाले कर दिया। उसका परिणाम क्या हुआ?

बाबासाहब ने कहा था कि जो सम्पन्न परिवार के लोग हैं, वो अपने बच्चों को कहीं भी पढ़ा सकते है, पर यहाँ का जो मूलनिवासी हैं, उसके लिए सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता वाली शिक्षा का प्रावधान किया जाए। इसी बिन्दु को काटते हुए सरकार ने प्राइमरी स्कूलों का विकास करने के बजाय प्राइमरी स्कूलों का निजीकरण ही कर दिया। 


उसका परिणाम यह हुआ कि आज उसका कोई मतलब नहीं रह गया है। धनाढय परिवार के बच्चे प्राईवेट स्कूलों में पढ़ते हैं, जो ब्राह्मणों के निजी स्कूल हैं और जहाँ पर ब्राह्मणों का वर्चस्व है तथा वे अपने हिसाब से उन विद्यालयों को चलाते हैं।


बहुजनों के बच्चे सरकारी प्राईमरी स्कूलों में ही पढ़ते हैं, जिसके कारण हमारे बच्चे शैक्षिक रूप से मजबूत नहीं हो पाते हैं। हम पढ़ते भी वही हैं। हमें सुनियोजित ढंग से वो पढ़ाते हैं, जो ब्राह्मणों के द्वारा विषय तैयार किया गया होता है। ये बहुत बड़ा चिन्ता का विषय है कि भारत के संविधान निर्माता का नाम ही विषय से हटा दिया है। ये ब्राह्मणवादियों का सबसे बड़ा षड्यंत्र है। 


उस षड्यंत्र के परिणाम ये हैं कि वर्तमान में ब्राह्मणवादी लोग मनुवादी विचारधारा को पाठ्यक्रम में डाल चुके हैं, वो ब्राह्मणवादी विचारधारा पढ़ा रहे हैं और संस्कृत को अनिवार्य करना चाहते हैं। वे मंत्रों और पुराणों को अनिवार्य करना चाहते हैं, ताकि हमारा समाज वास्तविक इतिहास को न पढ़ पाये, ताकि हमारा समाज हमेशा के लिए ब्राह्मणवाद का गुलाम बना रहे। 


इसी गुलामी को खत्म करने का काम आज भारत मुक्ति मोर्चा बड़े पैमाने पर देशभर में आंदोलन के माध्यम से कर रहा है जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी और इनसे धर्म परिवर्तित अल्पसंख्यकों को साथ सहयोग करना होगा। तभी हम इस ब्राह्मणवादी गुलामी से आजाद हो सकते हैं।

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