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ओबीसी की जागृति से सांसत में संघ

Published On :    21 Apr 2018   By : MN Staff
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आज इसमें कोई शक या संदेह नहीं है कि बामसेफ एवं भारत मुक्ति मोर्चा के सामुहिक प्रयासों से मूलनिवासी बहुजनों में जागृति नहीं आ रही है, बल्कि बामसेफ के माध्यम से मनुवादी व्यवस्था की सदियों से गुलाम, शोषित पीड़ित समाज में तेजी से मूलानिवासी बहुजन महापुरूषों की समानता पर आधारित विचारधारा स्थापित हो रही है और आज सबसे अधिक जागृति का संचार उस तबके में देखा जा सकता है जिसको यूरेशियन ब्राह्मणों ने हमेशा ही अपना पिट्टू समझा जी हां, मैं उसी ओबीसी की बात कर रहा हूं।

जिसकी बदौलत अल्पसंख्यक यूरेशियन ब्राह्मण आज देश की सत्ता में काबिज होकर मूलनिवासी बहजनों को मिले संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने का काम कर रहा है। जिसका सबसे भयानक परिणाम आज 52 प्रतिशत ओबीसी को भुगतना पड़ रहा है। जिसका नतीजा किसी से भी छिपी नहीं है कि कथित आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधानिक प्रावधान के बाद भी उनकी हिस्सेदारी नगण्य है। 


वर्तमान समय में भारतीय लोकतंत्र में 52 प्रतिशत ओबीसी की भागेदारी महज 5.5 प्रतिशत ही हो पायी है वो भी ओबीसी के संविधानिक आरक्षण मिलने के 25 वर्ष बाद भी इतना हिस्सा ही ओबीसी को मिल पाया है। जबकि ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत से ज्यादा है।

भारतीय संविधान के अनुसार उनका संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। यह हासिल क्यों नहीं हो रहा है? क्योकि ओबीसी वर्ग ने कभी भी अपनी संवैधानिक हिस्सेदारी को जानने की कोशिश नहीं की। क्योंकि इस महत्वपूर्ण संवैधानिक हिस्सेदारी की जानकारी इन यूरेशियन लोगों ने नहीं होने दी। 


क्योंकि भारत की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर इन्हीं 3.5 प्रतिशत यूरेशियन ब्राह्मणों का कब्जा कथित आजाद भारत में बना हुआ है। जहां पर मूलनिवासी बहुजन समाज की हिस्सेदारी संख्या के अनुपात में नहीं हो सकी है। क्योंकि चाहे एससी हो, चाहे एसटी हो या फिर ओबीसी हो इनका सबसे अधिक हिस्सा यूरेशियन ब्राह्मण ही खा रहा है। 


जिसका नतीजा सामने है कि आज शासन-प्रशासन में उसकी 80 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि उसकी संख्या महज 3.5 प्रतिशत है। आज 52 प्रतिशत ओबीसी ही नहीं, बल्कि एससी, एसटी एवं इनसे धर्मपरिवर्तित अल्पसंख्यक वर्ग विदेशी यूरेशियन लोगों के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक यानी पांच प्रकार की गुलामी कर रहे हैं। मतलब मूलनिवासी समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ब्राह्मणों की ही गुलामी कर रहे हैं। 


इसी पांच प्रकार की गुलामी को आधार बनाकर जिस दिन से भारत में बामसेफ, राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ और अब भारत मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन मूलनिवासी बहुजन समाज में जन-जागृति का अभियान मूलनिवासी नायक वामन मेश्राम के नेतृत्व में शुरू किया है जो अनवरत जारी है। जो पिछले 40 वर्षो से लगातार चल रहा है। उसी की जन-जागृति का असर आज साफ तौर पर मूलनिवासी बहुजन समाज में देखा जा सकता है। 


इसी जन-जागृति का सबसे अधिक असर आज मूलनिवासी बहुजन समाज के सबसे बड़े तबके ओबीसी में दिखाई दे रहा है। जिसको हमेशा ही विदेशी यूरेशियन ने अपनी सत्ता और गैरबराबरी पर आधारित व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए आधार बना रखा है। जिन्होंने इस वर्ग का हमेशा ही राजनैतिक समर्थन हासिल करने के लिए कभी धर्म के नाम पर, कभी आस्था के नाम पर, कभी भावनात्मक मुद्दों के नाम पर इस्तेमाल किया है। जब कुछ देने की बात सामने आयी है तो हमेशा ही ओबीसी के पिछवाड़े पर लात मारने का काम किया है।

यानी मेरे कहने का अर्थ यह है कि ब्राह्मणों ने 52 प्रतिशत ओबीसी को हमेशा इस्तेमाल करो और फेंक दो की रणनीति से इस्तेमाल किया है। जिसका जीता-जागता सबूत उमा भारती, कल्याण सिंह, साध्वी ऋतंभरा और विनय कटियार तथा वर्तमान समय में सच बोलने पर प्रवीण तोगड़िया को इस्तेमाल करके फेंक दिया है। जिन्होंने हमेशा ही समाज का फायदा न देखकर हमेशा ही अपना फायदा देखा। ऐसे लोगों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था का दलाल कहा जाय तो ज्यादा बेहतर होगा। 


क्योंकि समाज के इन दलाल और भड़वों ने समाजिक हितों की बलि देकर ब्राह्मणों की व्यवस्था को मजबूत किया है। लेकिन आज मूलनिवासी बहुजन समाज में दुश्मन द्वारा पैदा किए गये दलाल और भड़वों और जिनकी ये चाटुकारिता करते हैं वे बामसेफ, भारत मुक्ति मोर्चा जैसे समाज हितैषी संगठनों की बदौलत उनकी राजनैतिक रोटियां सेंकना बंद हो रहा है। 


इसके साथ-साथ बहुजन समाज को मिले संवैधानिक अधिकारों की जानकारी और मूलनिवासी समाज में जन्में महापुरूषों के बारे में जानकारी मिल रही है। तथा उन्हें यह भी पता चल रहा है कि इन महापुरूषों ने हमारे लिए क्या-क्या किया है? जिनके द्वारा किए गये संर्घष की जानकारी इन विदेशी लोगों ने हमें क्यों नहीं होने दी?

आज बामसेफ के माध्यम से ब्राह्मणों की व्यवस्था के अनुसार शुद्र (ओबीसी) कहे जाने वाले समाज को उन षड्यंत्रों की जानकारी हो रही है। जिससे वो सर्तक हो रहा है। जिसका परिणाम पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में देखने को मिला, जहां पर मूलनिवासी नायक वामन मेश्राम के आवाहन पर बहुजन समाज का रैला उमड़ पड़ा। जहां पर लोगों का समुन्द्र ही दिखाई दे रहा था। 


जिसमें 15-20 लाख लोग शामिल हुए थे। उस ऐतिहासिक गांधी मैदान में अब तक हुई सभी रैलियों का रिकार्ड टूट चुका है जो इस बात का सबूत है कि बहुजन समाज में किस तेजी के साथ जन-जागृति बढ़ रही है। इस जागृति से सबसे अधिक परेशानी आरएसएस के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को हो रही है जिन्होंने मिलीभगत करके मूलनिवासी बहुजन समाज को लोकतंत्र की परिधि से ही बाहर कर दिया है।

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