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इस्लाम की विचारधारा में ब्राह्मणवादी मिलावट

Published On :    23 Apr 2018   By : MN Staff
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ब्राह्मणों ने जिस व्यवस्था का निर्माण किया, उसका एक खास मकसद था कि ब्राह्मणों का वर्चस्व कायम रहे। जबकि इस्लाम का अपना मकसद है कि गैर-बराबरी या असमानता को समाप्त करके बराबरी या समानता कायम किया जाए। वैसे तो कुरआन महफूज (सुरक्षित) है। 


मगर जो लोग उर्दू नहीं जानते हैं और इस्लाम को जानना चाहते हैं तो उनके लिए यह कठिनाई है कि इस्लाम वास्तव में क्या है? इसी तरह मैं इस्लामिक साहित्य इकट्ठा कर रहा था, तो वाराणसी के वेद प्रकाश उपाध्याय द्वारा लिखित एक किताब मिली, जिसका नाम है ‘कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब।


’ यह किताब एक इस्लामिक इंस्टीट्यूट के एक मौलाना ने मुझे दिया। उस किताब को लेने के लिए जब मैंने मना किया और कहा कि कुरआन से मुझे कुछ इल्म मिलेगा, इस ब्राह्मण की लिखी किताब से मुझे क्या मिलेगा? उन्होंने कहा कि आप प्रोफेसर हैं, इसलिए आपको इसे भी पढ़ना चाहिए। 


मैंने उस किताब को पढ़ा। उसके अलावा मैंने कई किताबें इस सिलसिले में ढूँढ़ने का प्रयास किया तो अकबर मुहम्मद आजमी का एक ‘मुहम्मद हिन्दू’ किताब मिला। ‘इस्लाम और हिन्दू मत में ईश्वर की कल्पना’ नाम का किताब जाकिर नाईक ने लिखा। जाकिर नाईक की दूसरी किताब ‘हिन्दू और इस्लाम में समानताएं’ मैंने पढ़ी। 


जाकिर नाईक के भाषण बहुत प्रसिद्ध हैं, मगर उनकी किताबें पढ़ने के बाद मुझे बहुत धक्का लगा कि वेद प्रकाश उपाध्याय की बातों को डा. जाकिर नाईक ने स्वीकार किया। वेद प्रकाश उपाध्याय ने सन् 1984 में एक योजना बनाई कि जैसे बुद्धिज्म को ब्राह्मणवाद के साथ जोड़कर खत्म कर दिया गया और बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करके जैसे निगल ही लिया, ठीक उसी प्रकार से पैगम्बर मोहम्मद साहब को भी ‘कल्कि’ का अवतार घोषित किया जाए। 


मेरा कहने का अर्थ यह है कि मुसलमानों को ब्राह्मणों की व्यवस्था नहीं समझने के कारण एक नई समस्या का निर्माण हो गया है कि इस्लाम में ब्राह्मण बहुत भारी संख्या में घुसपैठ कर दिया है। यानि इस्लाम की विचारधारा में ब्राह्मणवादी विचारधारा का मिलावट करने का काम अकेले- अकेले नहीं बल्कि ब्राह्मण संगठित रूप से कर रहे हैं। इसका जीता जागता उदाहरण यह है कि नागपुर में बैठा आरएसएस का प्रमुख मोहन भागवत ने आतंकी आरएसएस का कार्यकर्ता इन्द्रेश कुमार जो हरियाणा का ब्राह्मण है, उसको मुस्लिम संगठन ‘राष्ट्रीय मुस्लिम विचार मंच’ बनाकर उसका राष्ट्रीय प्रभारी बनाया है। 


डा. वेद प्रकाश उपाध्याय ने चार बड़ी बातें उठाई। पहला यह कि पैगम्बर मुहम्मद साहब उत्तर भारत में ‘कल्कि’ के रूप में अवतार लेंगे। ब्राह्मणों ने पुराण इसलिए लिखे कि शूद्र, ब्राह्मणों के खिलाफ कोई विद्रोह न खड़ा करे। डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर द्वारा लिखित, ‘रिडल्स इन हिन्दुज्म’ के अनुसार ‘कल्कि’ अवतार बहुत पहले हो चुका है और समाप्त भी हो चुका है। मगर ब्राह्मणों ने उसको मनवन्तर और संध्या यह दो बातें जोड़कर आगे बढ़ा दिया और इसको अन्तहीन बना दिया। 


डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर की दृष्टि में शूद्र राजा लोग ब्राह्मणों के खिलाफ किसी प्रकार की बगावत न करें, इसके लिए ब्राह्मणों ने कल्कि अवतार की संकल्पना लायी। डा. वेद प्रकाश उपाध्याय ने लिखा है कि पैगम्बर मोहम्मद साहब एक पुरोहित के घर में पैदा होंगे। जबकि कुरआन कहता है कि जो यहूदी है, वो हमारे सरपरस्त (अनुयायी) नहीं हो सकते। वेद प्रकाश उपाध्याय आगे लिखते हैं कि ‘दस्युओं का नाश करने के लिए ही कल्कि का अवतार होगा।


’ जब पैगम्बर मोहम्मद साहब ने दासों (गुलामों) को मुक्त (आजाद) कराने में ही अपनी जिन्दगी लगा दी। एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्राह्मण भली-भाँति जानता है कि इस्लाम मसावात (समानता) के आधार पर खड़ा है, मगर इसके बावजूद भी लिखा कि ‘हिन्दूत्व की स्थापना करना वैदिक धर्म का उद्देश्य है, उसी प्रकार हिन्दुत्व की स्थापना करना इस्लाम का भी उद्देश्य है। इस तरह से इस्लाम और ईसाई लोगों को समन्वय की भावना पैदा करनी होगी।


’ इसीलिए धार्मिक रूप से ब्राह्मण लोग इस्लाम और ईसाईयों में घुसपैठ कर रहे हैं। इसलिए निश्चित तौर पर ब्राह्मणों के घुसपैठ के कारण आने वाले समय में बहुत बड़ी समस्या पैदा होने वाली है। एक और बहुत महत्वपूर्ण बात है कि कांग्रेस और भाजपा (आरएसएस) दोनों मिलकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था को मजबूत करते हैं, मगर मुसलमान ब्राह्मणों की व्यवस्था नहीं समझने की वजह से कांग्रेस को सेक्युलर मानकर कांग्रेस का समर्थन करते हैं और अपरोक्ष तौर पर ब्राह्मणवादी व्यवस्था को मजबूत करने का कार्य करते हैं। यह जानना जरूरी है कि आरएसएस का निर्माण कांग्रेस के डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार ने किया था।


डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार विदर्भ प्रान्त के कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी थे। उन्होंने गाँधी और नेहरू के कहने पर आरएसएस का गठन किया और जब देश आजाद हुआ तो आरएसएस के लोग कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते थे। जनसंघ की स्थापना होने के बावजूद भी कांग्रेस आरएसएस के लोगों को टिकट देती थी। सन् 1958 में आरएसएस के सरसंघ चालक माधव गोलवलकर ने कटक के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हरीबाबू को खत लिखा कि सन् 1925 में आरएसएस की स्थापना कांग्रेस ने ही की। 


आजाद भारत का दूसरे लोकसभा का जो चुनाव हुआ, उसमें आरएसएस के लोग कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए। इसकी प्रतिक्रिया उड़ीसा में आरएसएस के कार्यकर्ताओं में हो सकती है, इसलिए एक खत हरीबाबू ने माधव गोलवलकर को लिखा। उसके बाद गोलवलकर ने हरीबाबू को जवाबी खत लिखा कि, ‘अगर आरएसएस के लोग कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं, तो संगठन में कोई बाधा उत्पन्न होगी। कोई आरएसएस का सदस्य है और साथ ही वह कांग्रेस का भी सदस्य होता है, तो वह अपने हिन्दुत्व का त्याग नहीं करता है। 


यदि कोई राजनैतिक दल ऐसी कपोल-कल्पित अपेक्षा करती है, तो किसी भी सज्जन और स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए वो सर्वथा त्याज्य ही रहना चाहिए।  मेरी ऐसी धारणा है कि कांग्रेस जनहित में अविचारी या व्यभिचारी नहीं है कि वह अपने हिन्दुत्व, अपने हिन्दू समाज एवं संस्कृति के सेवा कार्य को छोड़ने की अपेक्षा करेगी।’ 


उसका मतलब यह है कि आरएसएस का सरसंघ चालक माधव गोलवलकर अपने उस कार्यकर्ता को यह समझा रहा कि यदि आरएसएस का कोई कार्यकर्ता कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह (कार्यकर्ता) हिन्दुत्व के उद्देश्य को छोड़ दिया है अथवा कांग्रेस हिन्दुत्व की भावना की विरोधी है। बल्कि कांग्रेस से हिन्दुत्व को कोई नुकसान नहीं है। क्योंकि कांग्रेस ने ही आरएसएस का निर्माण किया है। उसका परिणाम भी हमलोग देख रहे हैं कि अभी राहुल गाँधी घूम-घूमकर मन्दिरों में पूजा-पाठ और यज्ञ-हवन आदि कर रहा है। 


इसलिए हमलोगों को ब्राह्मणों के वास्तविक चरित्र को समझना जरूरी है कि ब्राह्मण कभी भी अपना उद्देश्य नहीं बदलते हैं बल्कि उद्देश्य प्राप्त करने के लिए अपने दाँव-पेंच में परिवर्तन करते हैं। मुस्लिम हों, चाहे गैर-मुस्लिम एससी, एसटी और ओबीसी के लोग हों, ब्राह्मणों के चरित्र को नहीं समझ पाने की वजह से वे ब्राह्मणों के बदले हुए दाँव-पेंच का शिकार हो जाते हैं। 


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