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सुप्रीम कोर्ट का शासक वर्ग समर्थक फैसला

Published On :    24 Apr 2018   By : MN Staff
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इसमें कोई शक या संदेह नहीं है कि इस समय न्यायपालिका पूरी तरह से शासक वर्ग के समर्थन में काम कर रही है। वह काम ही नहीं कर रही है, बल्कि पूरी तरह से ब्राह्मणवादी व्यवस्था के समर्थन में काम कर रही है। 


जिसका सबूत सामने है कि जिसमें उसने एक कर्तव्यनिष्ठ जज की हत्या के जांच के समर्थन में आयी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष सीबीआई जज ब्रजगोपाल हरकिशन लोया की मौत की स्वतंत्र जांच कराने की मांग करने वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। 



मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि बीएच लोया की मृत्यु प्राकृतिक कारणों से हुई थी। इस मामले पर वकील प्रशांत भूषण ने एक बयान में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया के मामले में जो फैसला सुनाया है। 



उन्होंने उन सारी याचिकाओं को जिसमें जज लोया के मौत की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी, खारिज कर दिया है और ये कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के पास उन चार लोअर कोर्ट के जजों की बात पर विश्वास नहीं करने की कोई वजह नहीं है। यानी लोअर कोर्ट का सुप्रीम कोर्ट ने सम्मान किया है।


जो स्टेटमेंट उन जजों ने महाराष्ट्र के एक पुलिस ऑफिसर को दिए और उन्होंने कहा कि उन जजों ने यह कहा था कि हम जज लोया के साथ रात में गेस्ट हाउस में रुके थे। उसके बाद उनको चेस्ट में पेन हुआ था तो अस्पताल ले गए थे, फिर उनको दूसरे अस्पताल ले गए थे। 


जहां उनकी मौत हो गई थी। इसलिए उन चार जजों के स्टेटमेंट के हिसाब से कोई वजह नहीं  बनती है इस पर संदेह करने की। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र जांच की मांग को ठुकरा दिया है। जो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि चार जज जिनका कोई एफिडेविट पर स्टेटमेंट सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं आया है और उस पुलिस अफसर का भी कोई एफिडेविट पर ऐसा स्टेटमेंट नहीं आया है जिसकी वजह से कोई ये पक्का कह भी नहीं सकता कि इन जजों ने ऐसा स्टेटमेंट दिया। 


अगर उन जजों का स्टेटमेंट मान भी लिया जाय तो जस्टिस कौल ने जज लोया की ईसीजी और हिस्ट्रो पैथोलॉजी रिपोर्ट के आधार पर बड़ा ही चौंकाने वाली बात कही थी कि उसमें जरा भी कोई सबूत नहीं है कि उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई। हार्ट अटैक का कोई साक्ष्य उस ईसीजी में नहीं मिला है जिस ईसीजी के बारे में थोड़ा संदेह था लेकिन बाद में सरकार ने कहा था कि भई उस अस्पताल में उनका यही ईजीसी लिया गया था।



उन्होंने कहा कि इस ईसीजी में हार्ट अटैक का कोई भी सबूत नहीं है। हिस्ट्रो पैथोलॉजी की रिपोर्ट में इस बात के कोई साक्ष्य नहीं है। फिर भी इन जजों के स्टेटमेंट के आधार पर जो एफिडेविट पर भी नहीं आए थे, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र जांच की मांग को नहीं ठुकराना चाहिए था। 


क्योंकि जज लोया की हत्या का पूरी तरह से रहस्य सामने आता। जिससे हर किसी का शक दूर किया जा सकता था और उस परिवार को भी इस प्रकार का विश्वास होना चाहिए था जिनको जज बी.एच.लोया की मौत पर शक था। 


ऐसा न करके सुप्रीम कोर्ट ने शासक वर्ग की व्यवस्था के हित में फैसला दिया। यानी सत्ता  में बैठे दोषियों को बचाने का काम किया है।


जबकि इतने सारे संदेह उत्पन्न संदेह पैदा होना बहुत ही गंभीर सवाल खड़ा करता है जिसकी जांच की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारीज कर दिया। उनकी फैमिली ने बोला था कि जज लोया को वहां के चीफ जस्टिस ने घूस की पेशकश की थी, उस पर भी कोई जांच नहीं कराई गई। 


उनके परिवार ने कहा था कि उनके कपड़ों पर खून के निशान थे, लेकिन उसकी भी कोई जांच नहीं कराई गई। ये सवाल भी उठा था कि तीन जज, दो बिस्तर के एक कमरे में रात में कैसे सोए और क्यों सोए? जबकि उस गेस्ट हाउस में कई और कमरे थे जो कि खाली थे। 


जो गंभीर प्रश्न खड़ा करने के लिए काफी है तो ये कहानी बनाई गई कि तीनों जज एक ही कमरे में सो रहे थे। इस कहानी की भी जांच होनी चाहिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर ये भी बोल दिया कि जो एक सवाल मैंने पूछा था कि क्या ये ठीक होगा कि आप जो जज इसकी सुनवाई कर रहे हैं वो जज क्योंकि उन महाराष्ट्र के जजों के जानते हैं, 


क्योंकि दो जज महाराष्ट्र से थे और आप अपने नॉलेज के आधार पर इस केस को डिसाइड कर दें कि आप उन जजों को जानते हैं जबकि उनका स्टेटमेंट एफिडेविट पर भी नहीं आया था, लेकिन फिर भी इस आधार पर उन्होंने बोल दिया कि नहीं-नहीं ये तो बिल्कुल गलत बात है ये कहना कि हमको इसकी सुनवाई नहीं करनी चाहिए। 



मेरी राय में ये एक बहुत ही गलत फैसला हुआ है और सुप्रीम कोर्ट के लिए मेरी राय में एक काला दिन है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने बजाय इसके कि भाई एक स्वतंत्र जांच हो जाए जब इतने सारे संदेह हो गए थे। जज लोया के मौत के ऊपर पर्दा डालने का काम किया है।

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