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अदालती फैसलों से राजनैतिक मकसद

Published On :    28 Apr 2018   By : MN Staff
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इसमें कोई दोराय नहीं है कि किसी भी अपराधी को उसके द्वारा किए गए अपराध की सजा अवश्य मिलनी ही चाहिए क्योंकि अगर किसी अपराधी को अपराध का दण्ड नहीं मिलता है उसके अन्दर से कानून का भय खत्म हो जाता है, लेकिन अपराधियों को दण्ड देने की एक समय सीमा होनी चाहिए लेकिन निर्णय देने में यदि निर्णय का इन्तजार करने वाला ही निराशा से घिर जाय अर्थात मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भारत जैसे देश में अदालतों द्वारा निर्णय करने में इतना वक्त लग जाता है कि लोगों के अन्दर न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा हो रहा है और खास बात यह है कि भारत में अदालतों द्वारा इस प्रकार से निर्णय दिया जाता है निर्णय वह समय काल और परिस्थिति के अनुसार तय होता है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि देश की न्यायपालिका में शासक वर्ग का वर्चस्व है जिसके कारण अदालती निर्णय भी शासक वर्ग की व्यवस्था के हित में प्रेरित निर्णय दिया जाता है जिसका ताजा प्रमाण सामने है। बलात्कारी आसाराम को जोधपुर की एक अदालत ने गुरूकुल की नाबालिक का यौन अर्थात बलात्कार करने की सजा उम्र कैद के रूप में सुनाई है। 



इस निर्णय में आरोपी के खिलाफ अपराध सिद्ध होने में 5 वर्ष से अधिक का समय लगा जबकि इस बलात्कारी को अपराध का दण्ड मिलने में इतना समय नहीं लगना चाहिए था। तो यहां पर अहम सवाल खड़ा होता है कि इसमें इतना अधिक समय क्यों लगा इसका मतलब साफ है इसमें दांव पेच करके इस ब्राह्मणवादी बलात्कारी को बचाने का पूरा प्रयास किया गया। इसको बचाने के लिए कई लोगों ने शासक वर्ग ने अपनी पुरानी व्यवस्था साम, दाम दण्ड भेद की नीति का इस्तेमाल करके यातो खरीदा लिया या फिर उसको हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया गया। 


जब इसमें किसी भी प्रकार की कामयाबी हासिल होती हुई नहीं दिखी है तो ऐसे मौके का इन्तजार किया गया है वह वर्तमान समय में मिल गया क्योंकि वर्तमान समय में शासक वर्ग की सत्ता एवं व्यवस्था खतरे है जिसको भांप करके अपनी सत्ता की नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए बलात्कारी आसाराम के उम्र कैद की सजा सुनाई गयी है और यह फैसला ऐसे समय पर दिया गया है कि आज महिलाओं एवं बच्चियों पर अमानवीय में बेतहासा वृद्धि को लेकर इस समय पूरा देश गुस्से में उबल रहा है। क्योंकि वर्तमान समय में कठुआ, उन्नाव तथा सूरत जैसी गैगरेप की खबरें सामने आने के बाद ऐसी घिनौनी घटनाओं को लेकर पूरे देश के जनमानस में गुस्सा देखा जा सकता है। 


जिससे देश के अधिकांश राज्यों में शासक वर्ग की मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर भी उतर कर अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं उसी गुस्से को शान्त करने के लिए शासक वर्ग ने बलात्कारी आसाराम को उम्रकैद की सजा दी है जिससे उसने अपना राजनैतिक मकसद को आधार बनाकर दिया गया है जिससे लोगों के गुस्से को शान्त किया जा सके इतना आसाराम को सजा देकर यह दिखाने का प्रयास किया है कि हम आसाराम जैसे बलात्कारी को कड़ी सजा दे सकते हैं तो किसी को भी छोड़ ही सकते हैं। 



यह दिखाने के लिए किया गया है इतना ही पाक्सो एक्ट में आनन-फानन में परिवर्तन करके 12 वर्ष तक की बच्चियों के साथ होने वाले अत्याचारों पर फांसी की व्यवस्था करने का काम किया और मीडिया में प्रचारित किया गया कि हमने पाक्सों एक्ट में परिवर्तन करके बलात्कारियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा यानि फांसी की सजा का प्रावधान किया है। जबकि महिलाओं एवं बच्चियों के साथ अमानवीयता दरिन्दगी का मूलकारण ब्राह्मणवादी व्यवस्था और ब्राह्मण है इन ब्राह्मणों द्वारा लिखित धर्मग्रन्थ है जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर पाबन्दी होना चाहिए जो महिलाओं के खिलाफ होने वाली अमानवीयता का मूलकारण है। 


लेकिन यह शासक वर्ग की सत्ता में सम्भव नहीं है क्योंकि किसी भी देश में व्यवस्था उसी के अनुसार तय होती है जिसका समर्थन या संरक्षण शासक जाति के अनुसार तय होती है जिसका समर्थन या संरक्षण शासक जाति के लोग करते हैं देश का शासक वर्ग यूरेशियन है इसीलिए इस में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व आज भी बना हुआ है। 


जिसका खात्मा डा. बाबासाहब अम्बेडकर के समतावादी संविधान ने किया था जिसने पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं को समानता का अधिकार दिया जिसकी बदौलत आज महिलाओं को कुछ अधिकार हासिल हो रहे हैं जिसकी बदौलत आज वे शिक्षा नौकरी और अधिकार के लिए संघर्ष कर रही है और अपने खिलाफ हो रहे अधिकारों का प्रतिकार कर पा रही है उसी समतामूलक संविधान की राह में विदेशी ब्राह्मण सबसे बड़ा रोड़ा बन रहा है जो हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है जिसकी गैरबराबरी की व्यवस्था को हमें संगठित होकर जड़ से खत्म करना होगा।
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