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कांग्रेस-भाजपा ने मिलकर लोकतंत्र को खत्म किया

Published On :    30 Apr 2018   By : MN Staff
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इसमें कोई शक नहीं है कि जिस दिन से इस देश में सत्ता हस्तांतरित होकर यूरेशियन ब्राह्मणों हाथों में आयी और जब से संविधान लागू किया जिसका मकसद भारत में लोकतंत्र की स्थापना करना था, लेकिन 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू किया गया और जब 1952 में जब प्रथम लोकसभा का चुनाव हुआ है और उस समय में जवाहर लाल कांग्रेस के अध्यक्ष थे उन्होंने 60 प्रतिशत अल्पसंख्यक ब्राह्मणों को टिकट देकर 47 प्रतिशत जितवाकर लाये और भारत की संसद पर यूरेशियन ब्राह्मणों का कब्जा कराया और इस प्रकार के कानूनों का निर्माण किया कि विधायिका पर (जहां पर कानून का निर्माण होता है) पर विदेशी शासक जाति का कब्जा करवाया, इसके बाद कार्यपालिका (जो संसद द्वारा बनाये गये कानून का क्रियान्वयन करती है) उसमें भी आज 80 प्रतिशत कब्जा यूरेशियन लोग हो गया है। 



इसी प्रकार से न्यायपालिका (जो न्याय देने का काम करती है) वहां पर आज की तारीख में 97 प्रतिशत केवल अल्पसंख्यक यूरेशियन ब्राह्मणों का ही कब्जा हो चुका है इसी तरह से मीडिया (जिसको प्रचार माध्यम कहा जाता है) पर भी 100 प्रतिशत तत्सम उच्च वर्ग का कब्जा हो गया है इसी प्रकार से देखा जाय तो भारत में कथित रूप से लोकतंत्र के सभी चारों महत्वपूर्ण स्तम्भों पर केवल एक जाति विशेष का कब्जा है यह कब्जा कराने का काम ब्राह्मणों के चाचा नेहरू ने कराया। 


जिसकी शुरूआत पंण्डित नेहरू ने उसी समय शुरू कर दिया था जिस समय वह 2 सितम्बर 1946 को बिना चुनाव के देश का प्रधानमंत्री बन गया था उस समय समाज के सच्चे हितैषी और विश्व के प्रकाण्ड विद्वान डा. बाबासाहब अम्बेडकर मौजूद थे जिन्हें जवाहर लाल नेहरू थर-थर कापता था इसलिए वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका लेकिन प्रथम लोकसभा चुनाव के बाद विधायिका पर कब्जा उसी समय हो गया था लेकिन डा. बाबासाहब अम्बेडकर की 6 दिसम्बर 1956 ब्राह्मणों द्वारा हत्या कराने के बाद इन्होंने ऐसे ऐसे कानून बनाये कि जिससे भारत की सम्पूर्ण लोकतांत्रिक संस्थानों पर केवल एक ही जाति का कब्जा हो गया उसी दिन इस देश में लोकतंत्र खत्म हो गया था। 



यानि जिनको गांव सभा का मेम्बर नहीं बनना चाहिए था उसी अल्पसंख्य जाति का सभी संस्थानों पर कब्जा हो गया और सदियों से अधिकार वंचित मूलनिवासी बहुजन समाज को धीरे-धीरे संवैधानिक संस्थाओं से बेदखल करने का काम किया क्योंकि आज बाबासाहब अम्बेडकर के बनाये संविधान को इन विदेशी जातियों ने बगैर हाथ लगाये ही खत्म कर दिया है तो सवाल खड़ा होता है कि इन्होंने इतनी धोखेबाजी मूलनिवासी बहुजनों साथ क्यों किया? 


क्योंकि इनका विदेशियों एकमात्र उद्देश्य यहां के मूलनिवासियों को अपनी गैर बराबरी जातिपात, भेदभाव, ऊँचनीच, क्रमिक असमानता, स्त्री दासता, आदिवासियों का अलगीकरण, धर्म परिवर्तित अल्पसंख्यकों के खिलाफ वेयनष्य पैदा करने वाली व्यवस्था का गुलाम बनाना रहा है ऐसा उन्होंने वर्तमान समय में किया है आज लोकतंत्र की व्यवस्था में भागेदारी (प्रतिनिधित्व) का अधिकार बिल्कुल खत्म हो चुका है जिसकी व्यवस्था संविधान के आर्टिकल 15(4) और 16(4) में की गयी है और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि बाबासाहब द्वारा दिया गया शिक्षा का अधिकार अगर सही सलामत रहे तभी आरक्षण का होना सार्थक है शिक्षा का अधिकार संविधान के आर्टिकल 21क में दिया गया है जिसके अनुसार सभी वंचित वर्गों यानि मूलनिवासियों को शिक्षा का अधिकार दिया गया है शिक्षा का अधिकार ही नहीं दिया है बल्कि शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया गया है। 


मौलिक अधिकार मतलब है ऐसा अधिकार जिसको कोई भी सत्ता या निर्वाचित सरकार वर्तमान में या भविष्य में खत्म नहीं कर सकती है ऐसी व्यवस्था समतामूलक संविधान में की गयी है। इतना ही नहीं संविधान के आर्टिकल 16 में यह व्यवस्था है कि चाहे महिला हो या पुरूष हो सभी को देश की लोकतांत्रिक मशीनरी में हिस्सेदारी का समान अवसर अधिकार दिया गया है। 



अर्थात 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज को मिला है जिसका अतिक्रमण कोई भी नहीं कर सकता है। इसके बाद भी शासक जाति के लोगों ने संविधान को हाथ लगाय बगैर ही हमारे संवैधानिक अधिकारों को खत्म कर दिया है अर्थात आज के समय में आरक्षण (प्रतिनिधि) शून्य हो चुका है, तो सवाल है कि शासक जातियों ने ऐसा क्यों किया? सीधी सी बात है विदेशी यूरेशियन नाम की शासक जाति की खासियत है कि वह जिन लोगों पर राज करता है या जिनको गुलाम बनाकर रखना चाहता है जो उसका स्वभाविक गुण होता है। 




वह कभी भी गुलामों को कोई अधिकार नहीं दे सकता है उनको समता का अधिकार तो किसी भी कीमत में नहीं दे सकता है। यही खासियत भारत के शासक वर्ग यूरेशियन ब्राह्मण में मौजूद है। 26 जनवरी 1950 को लागू किए गये संविधान की बदौलत वंचित वर्ग यानि मूलनिवासी बहुजन समाज को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक अधिकार मिले और मूलनिवासी समाज जब शिक्षित होकर प्रतिनिधित्व के अधिकार की बदौलत शासन प्रशासन में आने लगा और शासक जातियों की बराबर टक्कर देने लगा तो यह बात शासक वर्ग को हजम नहीं हुई उसी समय से इन्होंने बहुजन समाज को संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने नई आर्थिक नीतियों के नाम पर कांग्रेस और भाजपा ने मिली भगत से लागू किया जिसको एलपीजी नाम दिया गया जिसका मतलब निजीकरण, उदारीकरण और भूमण्डलीकरण होता है। 



इसकी बदौलत कांग्रेस ने मूलनिवासी बहुजनों के 80 प्रतिशत अधिकार खत्म किए जिसके अंतर्गत उसने सरकारी संस्थानों का निजीकरण करके खत्म किया क्योंकि निजी क्षेत्र में संविधान लागू नहीं होता है। संविधान केवल सरकारी क्षेत्रों में लागू होता है। इसीलिए उसने अधिकांश सरकारों संस्थानों का निजीकरण कर दिया है कांग्रेस ने बहुजनों का 80 प्रतिशत प्रतिनिधित्व खत्म किया है और शेष 20 प्रतिशत को भाजपा निजीकरण करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ रही है। 



जिसका परिणाम सभी के सामने है कि आज सरकारी नौकरियां निजी क्षेत्र में जा चुकी है यानि सरकारी नौकरियां शासक जाति ने खत्म कर दी है जिसका नतीजा सामने है कि मूलनिवासी बहुजन समाज में सबसे अधिक बेरोजगारी की फौज देखी जा सकती है जिनकी संख्या 40 करोड़ से ऊपर जा चुकी है। इसीलिए इस अनैतिक ब्राह्मण राज का खात्मा जरूरी है जिसको हम संगठित होकर ही खत्म कर सकते हैं। इस व्यवस्था के विरोध में हमें भारत मुक्ति मोर्चा के जनआन्दोलन में साथ सहयोग करना होगा तभी हम 85 प्रतिशत लोग पूर्णरूप से आजाद होगें।
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