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इतिहास मिटाने की कोशिश

Published On :    4 May 2018   By : MN Staff
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पंजाब स्कूली किताबों में शामिल ऐतिहासिक विषयवस्तु को हटाने का काम भाजपा और अकाली दल ने किया। जिसमें कांग्रेस की भी मिली-भगत रही है। अब इसको लेकर दोनों नूरा कुश्ती का नाटक कर रहे हैं। भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के इस हमले पर सीएम अमरिंदर सिंह ने जवाब दिया है और कहा है कि सिलेबस में बदलाव का फैसला साल 2014 में अकाली दल की सरकार के कार्यकाल में लिया गया था। 


पंजाब में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल ने कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार स्कूली किताबों से सिखों के इतिहास को हटा रही है? विपक्षी पार्टियों ने सीएम अमरिंदर सिंह और शिक्षा मंत्री ओपी सोनी से अपने फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग करके अपनी गलती को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं। 


भाजपा के राष्ट्रीय सचिव तरुण चुग का कहना है कि कांग्रेस सरकार लोगों की भावनाओँ के साथ खेल रही है। चुग ने आरोप लगाया कि सरकार पंजाब में सिख गुरुओं के गौरवशाली इतिहास को हटाने का काम कर रही है। जबकि चाहे कांग्रेस हो या भाजपा हो ये हमेशा ही मूलनिवासी बहुजनों के इतिहास को गलत पेश किया है। सरकार के इस फैसले का मकसद पंजाब के छात्रों को अपने गुरुओं और इतिहास से दूर करने की गहरी साजिश है।


वहीं भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के इस हमले पर सीएम अमरिंदर सिंह ने जवाब देकर अपनी सरकार को बचाने का काम किया है। अमरिंदर सिंह ने कहा है कि सिलेबस में बदलाव का फैसला साल 2014 में अकाली दल की सरकार के कार्यकाल में लिया गया था। साथ ही इस बदलाव को लेकर सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) से भी चर्चा की जा चुकी है। 


कक्षा 9 से लेकर 12वीं तक के सिलेबस में बदलाव को लेकर 9 जनवरी, 2014 को एक कमेटी का गठन किया गया था। इसके बाद जब सिलेबस फाइनल किया गया तो इसे बोर्ड की वेबसाइट पर भी अपलोड किया गया जिसमें कक्षा 9 के सिलेबस पर एसजीपीसी ने गंभीर सवाल उठाए थे, जिसके बाद सिलेबस में बदलाव किए गए और साल 2016 में कक्षा 9 और 10 की किताबों का प्रकाशन किया गया। वहीं कक्षा 11 और 12 की किताबों का प्रकाशन साल 2018 में करने का फैसला किया गया था।


अमरिंदर सिंह का कहना है कि जब उनकी सरकार सत्ता में आयी तो उन्होंने एसजीपीसी से सिलेबस को लेकर चर्चा की। इस पर एसजीपीसी ने पटियाला के पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर परमवीर सिंह को सिलेबस पर चर्चा के लिए नियुक्त किया। प्रोफेसर मनुवादी परमवीर सिंह की देखरेख में ही सारा सिलेबस तैयार किया गया है। 


पंजाब के सीएम ने सफाई दी कि सिख गुरुओं का पूरा इतिहास नए सिलेबस में शामिल किया गया है और यह सारा विवाद विपक्षी पार्टियों और एसजीपीसी द्वारा जानबूझकर खड़ा किया जा रहा है। जबकि यही प्रक्रिया अपनाकर भाजपा, अकाली दल की सरकार ने भी यहीं काम किया था जो काम अमरिंदर सिंह सरकार कर रही है। इन दोनो ही मनुवादी दलों ने मिलकर जनता को धोखे में रखकर मूलनिवासी बहुजन समाज के रहनुमाओं के इतिहास को हमेशा ही खत्म करने का षड्यंत्रपूर्ण प्रयास किया है।

हिटलरशाही में पिसता मजदूर


केजरीवाल ने मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने में छह महीने लगा दिए और उपराज्यपाल को दोषी बताते हुए केजरीवाल ने तर्क दिया कि उन्होंने कई क्रांतियों के बारे में पढ़ा है, लेकिन इस तरह की हिटलरशाही (तानाशाही) के बारे में कभी नहीं पढ़ा।


नौकरशाही की कार्यशैली का उपहास उड़ाते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि यदि मजदूरों पर कैलोरी का नियम लागू होता है तो आईएएस अधिकारियों को भी कैलोरी के आधार पर ही क्यों न भुगतान किया जाए। आज दिल्ली में मजदूर की न्यूनतम मासिक मजदूरी आज 13,500 रुपये है, जो पहले 9,500 रुपये थी। 


देरी करके मजदूरी में वृद्धि का अध्ययन करने वाली समिति ने फैसला किया कि श्रमिकों को एक दिन में 2,700 कैलोरी की जरूरत होती है। इसलिए मजदूरों को कैलोरी के आधार पर भुगतान नहीं किया जा सकता। वे भी इंसान हैं, कोई जानवर नहीं हैं.. उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाना है, कपड़े खरीदने हैं.. आईएएस अधिकारियों को उनकी कैलोरी जरूरतों के आधार पर भुगतान कर सकते हैं, मजदूरों को नहीं।


आप विधायकों द्वारा मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ कथित तौर पर मारपीट के बाद से आप सरकार और नौकरशाही के बीच संबंध तनावपूर्ण हैं। कम मजदूरी के मामले का अध्ययन करने के लिए अधिकारियों, मजदूरों और ठेकेदारों के प्रतिनिधियों को मिलाकर एक समिति गठित की गई थी, लेकिन उसे उपराज्यपाल अनिल बैजल की मंजूरी नहीं मिली और मुख्यमंत्री इसमें अड़े रहे कि समिति के गठन से पहले उनसे अनुमति नहीं ली गई और उपराज्यपाल की अस्वीकृति के बाद, उसी समिति का गठन किया जिसमें उन्ही सदस्यों के साथ दोबारा शामिल किया गया। 


केजरीवाल ने इस प्रकार से मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने में छह महीने लगा दिए और अपनी गलती पर पर्दा डालने के लिए उपराज्यपाल पर हमला करते हुए कहा कि उन्होंने कई क्रांतियों के बारे में पढ़ा है, लेकिन इस तरह की ‘हिटलरशाही’ के बारे में कभी नहीं पढ़ा। केजरीवाल की गतली के चलते राज्यपाल ने मजदूरों की मजदूरी का अध्ययन करने के लिए समिति की स्थापना के प्रस्ताव को खारिज कर दिया जो मजदूरों के खिलाफ साजिश है।

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