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अंधी आस्था का खतरनाक परिणाम

Published On :    7 May 2018   By : MN Staff
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आज तक किसी से नहीं सुना होगा कि रूपयों की भी बारिस होती है! यह बात किसी कल्पना से कम नहीं लगती है, लेकिन यह एक सच्चाई है। यदि यकीन ना हो तो यूपी में वाराणसी के काशी विश्वनाथ, मिर्जापुर में विंध्याचल, अयोध्या में रामलला, तिरूपुर में बालाजी, नागुर में सिर्डी, उड़िसा में जनन्नाथ और जम्मू (कटरा) में वैष्णों मंदिर में देख सकते हैं कि कितनी तेज रूपयों की बारिस होती है। 


जहां न केवल सालाना अरबो-खरबों की कमाई होती है, बल्कि अरबो-खरबों के सोने, चांदी, हीरे, जवाहरात के साथ-साथ बर्तनों के खान बन चुके हैं। भारत में अरबों की कमाई करने वाले तिरूपति बालाजी, सिर्डी के सांई के बाद अब काशी विश्वनाथ भी अरबपतियों की सूची में शामिल हो गया है। वाराणसी स्थित इस मंदिर के खजाने में 100 करोड़ पूरे हो गए हैं। 


मंदिर के पास करीब 80 करोड़ कैश और 20 करोड़ की लैंड प्रॉपर्टी और सोने-चांदी के गहने-बर्तन हैं, जो कि भक्तों ने दान में दिए हैं। इनमें गुप्त दान देने वालों की संख्या भी अधिक है। इस बात का खुलासा तब हुआ जब एक लेखाधिकारी ने मंदिर की संपत्ति का ब्योरा दिया। हालांकि इस व्योरे में भी बहुत घपला होने का संकेत है। साल 2016 में मुंबई बेस्ड बिजनेसमैन गणेश गुप्ता ने काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को दशाश्वमेध घाट स्थित अपनी पैतृक कोठी दान की थी। 



38 कमरों वाली 3 हजार स्क्वायर फीट जमीन पर फैली इस कोठी की कीमत 5 करोड़ रुपए से ज्यादा की है। मंदिर के अधिकारियों के मुताबिक इस कोठी को दान करने के लिए गणेश गुप्ता को 33 लाख रुपए की स्टाम्प ड्यूटी भी जमा करनी पड़ी थी।केवल काशी विश्वनाथ की कमाई में ही साल दर साल की बेतहासा बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है, बल्कि भारत में जितने भी मंदिर हैं उनकी भी कमाई इतनी ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ रही है कि दिन दुनी रात चौगुनी वाली बात को कोसों दूर छोड़ दिया है। 


यदि काशी विश्वनाथ के बैंक बैलेंस पर नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि वर्ष 2010-11 से लेकर वर्ष 2017-18 तक 1000 करोड़ के लक्ष्य को पार कर दिया है। जहां 2010-11 में 5.93 करोड़ की कमाई थी वहीं 2011-12 में 9.63 करोड़ हो गयी। इसी के साथ 2012-13 में 11.9 करोड़, 2013-14 में 11.6 करोड़, 2014-15 में 12.25 करोड़, 2015-16 में 17.7 करोड़, 2016-17 में 17.8 करोड़ और 2017-18 के फरवरी तक 17.22 करोड़ हो गये हैं। 


यानी कुल मिलाकर काशी विश्वनाथ मंदिर का बैंक बैलेंस 79.1 करोड़ से ज्यादा हो गया है। यही नहीं इसके अलावा 20 करोड़ से ज्यादा के सोने-चांदी के बर्तन और ज्वैलरी हैं। इसी के साथ मंदिर के नाम पर काशी विश्वनाथ की लैंड प्रॉपर्टी भी है। जारी एक आंकड़े के अनुसार यूपी के जिला चंदौली के सकलडीहा में 36 एकड़ कृषि भूमि, मिर्जापुर ककराही में 20 एकड़ के ऊपर कृषि भूमि, ज्ञानवापी भार्गव कटरा को 4 करोड़ में खरीदा गया। 


यूपिका हैंडलूम को एक करोड़ 80 लाख में लिया गया। टेढ़ी नीम स्थित जम्मू कोठी को दो करोड़ पचीस लाख में खरीदा गया है।सूत्रों के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर हर रोज के खर्च के लिए एक करंट एकाउंट है, जिसमें 4 करोड़ रुपए तक रहते हैं। 50 लाख की राशि एफडी में है। सात-आठ लाख रुपए कर्मचारियों के वेतन में जाते हैं। मंदिर में पूजा और आरती का महीने का खर्च 3-4 लाख तक आता है। जबकि यह खर्च की रकम ज्यादा बतायी गयी है। 


यही नहीं वर्तमान में गंगा पाथवे बनाने के लिए विश्वनाथ मंदिर से ललिता घाट तक 167 भवन चिंहित हैं। इसके लिए 70 से ज्यादे भवनों की रजिस्ट्री मंदिर प्रशासन की ओर से करवाई जा चुकी है। 700 से 900 मीटर तक का पूरा क्षेत्र पाथ-वे और सौंदर्यीकरण योजना के तहत सुरक्षित रखा गया है। लेकिन वहीं वाराणसी के पास ही कई गांवों में बिजली, पानी से लोग तड़प रहे हैं, गावां में नालियों का पानी आमजन के घरों में जा रहा है। 


आने-जाने का कोई रास्ता नहीं है, इसके बाद भी शासन से लेकर प्रशासन तक कोई कदम नहीं उठा रही है। आज देश में अंधी आस्था मूलनिवासी बहुजनों समाज की गरीबी का सबसे बड़ा कारण है। इस अंधी आस्था का सबसे अधिक फायदा यूरेशियन ब्राह्मणों को हा रहा है जो कभी भी गरीब नहीं हो सकते हैं। 


क्योंकि देश के सारे मंदिरो की कमाई का फायदा यही लोग उठाते हैं इसलिए इस अंधी आस्था से मूलनिवासी बहुजन समाज को बचने की जरूरत है। ऐसी ही काम हमारे मूलनिवासी समाज में जन्में सन्तों ने भी किया है, जिन्होंने अपनी वाणी में आडंबर, पाखंड और पूजा-पाठ से बचने की सलाह दी है। आज उन्हीं के विचारों को आत्मसात करने की जरूरत है।
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