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मानसिक बीमारी की चपेट में भारत

Published On :    28 Apr 2021   By : MN Staff
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कोरोना महामारी और लॉकडाउन के असर से बिगड़ रही मानसिक स्वास्थ की स्थिति



नई दिल्ली: भारत ‘‘एक संभावित मानसिक स्वास्थ्य महामारी का सामना कर रहा है.’’ भारत में कोरोना महामारी और लॉकडाउन का असर जनता की मानसिकता पर किस कदर हावी है इसका अंदाजा एक अध्ययन से लगाया जा सकता है. एक अध्ययन से यह पता चलता है कि 2017 में ही भारत की 14 फीसदी आबादी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों से पीड़ित थी, जिसमें 45.7 मिलियन लोग अवसाद संबंधी विकारों से और 49 मिलियन लोग चिंता संबंधी विकारों से पीड़ित थे. इसी बीच कोविड-19 महामारी ने इस मानसिक स्वास्थ्य संकट को और बढ़ा दिया है. दुनिया-भर की रिपोर्टों से पता चलता है कि यह वायरस और इससे जुड़े हुए लॉकडाउन जनसंख्या पर एक बड़ा प्रभाव डाल रहे हैं, जिनमें युवा वर्ग खास तौर से प्रभावित हैं.


गौरतलब है कि भारत राज्य-स्तरीय रोग बोझ पहल’ द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि मानसिक विकारों के चलते साल 1990 से से 2017 के बीच मानसिक रोगों का बोझ 2.05 फीसदी से बढ़कर 4.7 हो गया. रिपोर्ट के ही मुताबिक, मानसिक विकारों के कारण भारत में रोग का बोझ डीएएसवाईएस (विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष) के रूप में 1990 में 2.5 फीसदी था जो 2017 में बढ़कर 4.7 फीसदी हो गया है और वाईएलडी (विकलांगता के साथ बिताए गए वर्ष) में इसका योगदान अग्रणी अर्थात देश में सभी वाईएलडी का 14.5 फीसदी था.


बता दें कि भारतीय मनोरोग चिकित्सा सोसायटी के एक सर्वेक्षण ने संकेत दिया कि कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से 20 फीसदी अधिक लोग खराब मानसिक स्वास्थ्य से पीड़ित थे. साक्ष्यों से यह भी उभर कर सामने आ रहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान शहरी गरीब लोगों के बीच महिलाओं के मनोवैज्ञानिक तनाव का स्तर अपेक्षाकृत अधिक है और ग्रामीण क्षेत्रों में लॉकडाउन प्रतिबंधों से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले परिवारों में बिना प्रवासी श्रमिकों वाले परिवारों की तुलना में प्रवासी श्रमिकों वाले परिवारों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों की अधिक घटनाएं देखी गईं. लॉकडाउन ने छात्रों को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया था क्योंकि इस दौरान शिक्षण के नए माध्यम और परिवेश से तालमेल स्थाभपित करने के साथ-साथ भविष्य की संभावनाओं के बारे में उनकी चिंता बढ़ गई थी.


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अन्य देशों के मुकाबले भारत में मानसिक स्वास्थ्य आवंटन बेहद कम
विकसित देश अपने वार्षिक स्वास्थ्य बजट का 5-18 फीसदी भाग मानसिक स्वास्थ्य पर आवंटित करते हैं, जबकि भारत लगभग 0.05 फीसदी आवंटित करता है. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन 2014 के अनुसार, 2018 और 2019 में वार्षिक बजट में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास संस्थान पर खर्च को भी शामिल किया गया था. इस संस्थान को मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में मानव संसाधनों और अनुसंधान के संदर्भ में क्षमता-निर्माण के उद्देश्य से वर्ष 2018 में मंजूरी दी गई थी. इसके अतिरिक्त, सरकार स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई क्षेत्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान तथा निमहांस को प्रतिवर्ष धन आवंटित करती है.

महामारी और लॉकडाउन का महिलाओं पर ज्यादा असर
अवसाद और चिंता संबंधी विकार तथा भोजन करने संबंधी विकार महिलाओं में काफी अधिक पाए गए. इतना ही नहीं अवसाद और आत्महत्या करने सबसे ज्यादा केस भी महिलाओं में पाए गए हैं. भारत में मानसिक स्वास्थ्य विकार होने को कथित तौर पर शंका की नजर से देखा जाता है और जो लोग मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों से पीड़ित हैं, एक तरह से उसे कलंक से जुड़ हुआ तक मान लिया जाता है. यह भी माना जाता है कि आत्म अनुशासन और इच्छाशक्ति की कमी के परिणामस्वरूप मानसिक विकार पैदा हुए हैं. मानसिक स्वास्थ्य के उपचार में इससे जुड़े कलंक के साथ-साथ पहुंच, आर्थिक सामर्थ्य और जागरूकता की कमी बड़ी बाधा उत्पन्न करते हैं.


राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएमएस), 2015-16 में यह पाया गया कि मानसिक विकारों से पीड़ित लगभग 80 फीसदी लोगों का लंबे समय (सालों साल) इलाज नहीं कराया जाता है, या मिल पाता है. इस सर्वेक्षण ने यह भी बताया कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े उपचार अंतराल हैं, जिनकी सीमा अलग-अलग मानसिक विकारों में 28 फीसदी से 83 फीसदी तक थी.

मानसिक विकारों का आर्थिक बोझ
मानसिक विकारों से पीड़ित लोगों और उनके परिजनों पर काफी आर्थिक बोझ पड़ता है, एनएमएचएस (2015-16) ने खुलासा किया था कि परिवारों द्वारा उपचार और देखभाल तक पहुंचने के लिए की जाने वाली यात्रा पर 1,000-1,500 रुपए प्रति माह खर्च किया गया. सर्वे के उत्तरदाताओं के साथ चर्चा से यह भी पता चला है कि मानसिक विकारों के इलाज पर होने वाले खर्च अक्सर परिवारों को आर्थिक तंगी की ओर धकेल देते हैं. यह बोझ मध्यम आयु वर्ग के व्यक्तियों, जो मानसिक विकारों से सबसे अधिक प्रभावित भी थे, के मामले में अधिक स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, क्योंकि यह उनकी उत्पादकता को प्रभावित करता है जिससे न केवल व्यक्ति, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी बोझ बढ़ जाता है.


विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने यह अनुमान लगाया है कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों के कारण भारत को 1.03 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान होगा. एनएचएमएस ने यह भी पाया कि मानसिक स्वास्थ्य विकार कम आय, कम शिक्षा, और कम रोजगार वाले परिवारों को ज्यादा प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं. इन कमजोर समूहों को उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के कारण वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ता है और उपचार के लिए संसाधनों की सीमित उपलब्धता इस स्थिति को और बदतर बना देती है. इनके इलाज में आने वाला अधिकांश व्यंय प्रत्य क्ष व्यंय होता है और इस संबंध में राज्य सेवाओं और बीमा कवरेज में कमी पाई जाती है, जिसके परिणामस्वररूप गरीबों और कमजोरों पर आर्थिक दबाव की स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है.

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