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सरकार हमें अपनी जमीनों से बेदखल कर किसके लिए विकास करेगी? लक्षद्वीप के लोगों का सवाल

Published On :    10 Jun 2021   By : MN Staff
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हाल के महीनों में लक्षद्वीप प्रशासन द्वारा नियमों में बदलाव किये गए. केंद्र सरकार यहां ग्लोबल टूरिज्म और विकास को बढ़ावा देना चाहती है. इससे यहां बाहरी लोगों की पहुंच बढ़ जाएगी. स्थानीय लोग इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानते हुए हर जगह प्रदर्शन हो रहे है.



नई दिल्ली : हाल के महीनों में लक्षद्वीप प्रशासन द्वारा नियमों में बदलाव किये गए. केंद्र सरकार यहां ग्लोबल टूरिज्म और विकास को बढ़ावा देना चाहती है. इससे यहां बाहरी लोगों की पहुंच बढ़ जाएगी. स्थानीय लोग इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानते हुए हर जगह प्रदर्शन हो रहे है. लक्षद्वीप में करीब 95 फीसदी मुसलमान है. प्रशासन के नए फैसलों के विरोध में पुरुषों के साथ महिलाएं भी प्रदर्शन में शामिल हैं.


शबाना नूर अपने बेटे के साथ हाथ में पोस्टर लिए खड़ी दिखीं, जिस पर लिखा था, हम अपनी मिट्टी के मालिक हैं, हमारी सेवा करो, हम पर हुकूमत मत करो. हम विकास के ऊपर शांति को तरजीह देते हैं. नूर के बेटे के भी हाथ में एक पोस्टर था, जिस पर लिखा था, एलडीएआर को वापस लो, लक्षद्वीप को बचाओ.


एमबीए के छात्र अफसाल हुसैन कहते हैं, नए प्रशासन के दमन के खिलाफ यहां की पूरी आबादी ने भूख हड़ताल की. ये आजादी के बाद यहां इस तरह का पहला प्रदर्शन था. वे कहते हैं, बीफ पर बैन और हर तरह के सनकी नियम असल में कॉर्पोरेट और राजनीतिक हितों को ढंकने का ढकोसला हैं. सबसे बड़ा मजाक तो गुंडा एक्ट है. ये ऐसी जगह लाया जा रहा है जहां भारत में सबसे कम अपराध होते हैं.


प्रफुल्ल पटेल ने लक्षद्वीप का अतिरिक्त प्रभार संभालते ही कोविड प्रोटोकॉल के तहत अनिवार्य क्वारैंटाइन नियम को हटा दिया. इससे यहां भी संक्रमण फैल गया. इस पर अधिवक्ता फसीला इब्राहीम कहती हैं, जहां जीरो कोविड केस थे वहां नए कानून बनाते ही कोरोना केस आने लगे. लक्षद्वीप के लोगों ने इसका शुरू से ही विरोध किया था. जहां स्वास्थ्य ढ़ांचा बहुत मजबूत नहीं हैं, वहा इस तरह का कदम उठाना सही नहीं था.



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जनवरी में लक्षद्वीप प्रशासन ने विरोध को रोकने के लिए प्रिवेंशन ऑफ एंटी सोशल एक्टीविटीज एक्ट प्रस्तावित किया. जिसके तहत सरकार का विरोध करने पर किसी को भी एक साल तक बिना जमानत के जेल में रखा जा सकता है. फरवरी में लक्षद्वीप प्रशासन ने पंचायत कानून में बदलाव लाने की बात की. लक्षद्वीप में कोई विधानसभा नहीं है. 


यहां एक संसद सदस्य है और पंचायत के सदस्य निर्वाचित होते हैं. पंचायत की शक्तियां लक्षद्वीप के लोगों के लिए बहुत अहम हैं. फरवरी में प्रस्तावित कानून के तहत उन लोगों को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया, जिनके दो से अधिक बच्चे हैं.


फसीला इब्राहिम कहती हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य, एनिमल हसबैंड्री जैसे विभागों में पंचायत की शक्तियों को कम किया गया है और इन्हें सीधे प्रशासन के हाथों में देने की बात है. पंचायत के लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया है. इन दिनों लक्षद्वीप में हर जगह प्रशासन के नए आदेशों का विरोध हो रहा है.


इसके बाद प्रशासन ने एक और नया लक्षद्वीप डेवलपमेंट अथॉरिटी रेजोल्यूशन कानून बनाया. प्रशासन का तर्क है कि ये लक्षद्वीप के विकास के लिए हैं, लेकिन लक्षद्वीप के लोग इसे अपनी जमीन के लिए खतरा मान रहे हैं. फसीला इब्राहिम कहती हैं, इस एक्ट के तहत प्रशासन को ये शक्ति दी गई है कि वो लक्षद्वीप के किसी भी इलाके को डेवलपमेंट एरिया घोषित कर सकता है. डेवलपमेंट कैसे होगा, ये प्रशासन तय करेगा. जमीन के मालिकों के क्या अधिकार होंगे, ये नहीं बताया गया है. लोगों में डर है कि उन्हें उनकी जमीन से हटा दिया जाएगा. लक्षद्वीप में सबसे ज्यादा विरोध इसी एक्ट का हो रहा है.



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एलडीएआर के तहत खनन, रेलवे और नेशनल हाईवे डेवलप करने की बात की जा रही है. फसीला कहती हैं, प्रशासन का तर्क है कि वो लक्षद्वीप को डेवलप करना चाहता है, लेकिन हमारी जमीन से हटाकर वो किसके लिए डेवलपमेंट करना चाहते हैं? वे कहती हैं, अभी जो सड़के हैं वो हमारे लिए काफी हैं, हमें हाईवे की जरूरत नहीं है. लक्षद्वीप पर पहले से ही क्लाइमेट चेंज का गहरा असर हो रहा है। ऐसे में यहां जबरदस्ती विकास थोपना न तो इस द्वीप के हित में हैं और ना ही यहां के लोगों के हित में.


लक्षद्वीप प्रशासन बहुत तेजी से निर्णय ले रहा है और नए-नए नियम कानून बना रहा है. शुक्रवार को लिए गए एक निर्णय के तहत मछुआरों की हर नाव में सरकारी अधिकारी तैनात करने का प्रावधान किया गया है. लक्षद्वीप के लोग इसे अपनी निजता और कारोबारी अधिकारों का हनन मान रहे हैं.

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