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न्यायपालिका में कैसे बढ़ा ब्राह्मणों का वर्चस्व!

Published On :    11 Jun 2021   By : MN Staff
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भारतीय न्यायपालिका में बैठे न्यायाधीशों जिनमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल है, उन पर कई सारे आरोप लगते आ रहे है. ताजा मामला पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का है. जिन पर एक महिला द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था.



भारतीय न्यायपालिका में बैठे न्यायाधीशों जिनमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल है, उन पर कई सारे आरोप लगते आ रहे है. ताजा मामला पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का है. जिन पर एक महिला द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था. रिटायर्ड होने के पहले उन पर राम मंदिर, ईवीएम और राफेल जैसे मामलों में भाजपा के हितों में फैसले देने के भी आरोप लग चुके है, जिसकी बहुत ज्यादा चर्चा सभी चैनलों तथा अखबारों में हुई थी. हालांकि ये कोई पहला ऐसा मामला नहीं है. इसके पहले भी न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के आरोप लग चुके है, लेकीन इसमें जो सबसे गंभीर आरोप न्यायपालिका पर हुआ वह है जातिवाद का. जिसके बारे में अमूमन ज्यादा चर्चा नहीं होती.


वर्तमान चीफ जस्टिस रमन्ना ने देश के 25 उच्च न्यायालयों के सभी मुख्य न्यायाधीशों से इस बात पर चर्चा की कि उच्च न्यायालयों की कॉलेजियम ने सिफारिश करते समय अनु.जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक तथा महिलाओं की भागीदारी पर ध्यान देना है. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि इन वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संविधान में कोई फ्रेमवर्क नहीं है. 


उनकी यह बात इस लिहाज से गलत है की संविधान के मौलिक अधिकारों में जो आरक्षण या प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया है, वह देश की सभी व्यवस्थाओं में लागू होता है, जिससे न्यायपालिका भी अछुती नहीं है. लेकीन पिछले 70 सालों में अनु.जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं का प्रतिनिधीत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं रहा, या यूं कहे तो उनको उनके मौलिक अधिकार से षडयंत्रपूर्वक वंचित रखा गया. अगले कुछ मिनटों में हम इसकी बारीकियों को समझने का प्रयास करेंगे.


पिछले महीने यानी 23 मई को सुप्रीम कोर्ट के वकील एडवोकेट नमित सक्सेना का एक आर्टिकल बार एंड बेंच पर प्रकाशित हुआ. जिसमें नमित सक्सेना ने न्यायपालिका में ब्राह्मणों के वर्चस्व और बहुजनों के प्रतिनिधित्व हीनता के बारे में न्यायपालिका के शुरुआत से बातें लिखी है. हम उसी आर्टिकल को आधार बनाकर कुछ तथ्य आपके सामने रखना चाहते है. अंग्रेजों द्वारा भारत का प्रशासन चलाने के लिए इंडियन सिविल सर्विस यानी आईसीएस बनाया गया था, जो 1947 तक था. 


सुप्रीम कोर्ट के शुरुआती दौर में उन्हीं में से अधिकारियों को जज बनाया गया. जिनको कानुन की पढ़ाई करने या कानुन की महारत हासिल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी. ऐसे कम से कम 6 अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने. संविधान में सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनने के लिए भारत की नागरिकता, उम्र और न्याय विभाग में काम करने के अनुभव को मानदंड माना है. सुप्रीम कोर्ट के कम से कम 9 जज भारत में पैदा भी नहीं हुए. जैसे, जस्टिस जे.एल कपुर, एसएम सिकरी, और आई.डी. दुआ आज के पाकिस्तान में जन्मे. जस्टिस जसवंत सिंह, पाक व्याप्त कश्मीर में, जस्टिस ए.एन ग्रोवर, ए.पी. सेन और एम.पी. ठाकुर बर्मा में. जस्टिस ए.के. सरकार और के.सी. दास गुप्ता आज के बांग्लादेश में जन्मे थे.


अब हम बढ़ते है अपने मुख्य विषय की ओर जो है न्यायपालिका में ब्राम्हणों का वर्चस्व कैसे बढ़ा? सुप्रीम कोर्ट के शुरुआती पहले 6 न्यायाधीशों में 2 ब्राह्मण थे, इसका मतलब ब्राह्मणों का 33.33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व था और सुप्रीम कोर्ट में जज की पहली नियुक्ति भी छ.चंद्रशेखर अय्यर नाम के ब्राह्मण की हुई थी. इस तरह से 7 में से तीन जज ब्राह्मण यानी ब्राह्मणों का 42.85 फीसदी प्रतिनिधित्व हुआ था. यह एक प्रकार से ब्राह्मणों के लिए न्यायपालिका में अघोषित आरक्षण ही था या आज भी है. सुप्रीम कोर्ट के अब तक 47 मुख्य न्यायाधीश हुए है, जिनमें से 13 ब्राह्मण है. ऐसे में मुख्य न्यायाधीशों के पदों पर ब्राह्मणों का 27.6 फीसदी प्रतिनिधीत्व रहा है और जब 50वें मुख्य न्यायाधीश बनाए जायेंगे तब तक ये आंकड़ा 32 फीसदी का हो जायेगा.


ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मणोंं की नियुक्तियां साल दर साल बढ़ते चली गई. एक समय ऐसा भी आया जब ब्राह्मणों की नियुक्तियां होना ही कम हो गया और उनकी जगह गैर ब्राह्मणों कि नियुक्तियां होने लगी. इसके पीछे की मुख्य वजह ये थी कि केंद्रीय कानून मंत्री के तौर पर बी.शंकरानंद जो अनु.जाति से आते थे और पी. शिव शंकर जो ओबीसी से आते थे, उन्होंने जस्टिस डी.एन.ओझा के बाद कुछ गैर ब्राह्मण नियुक्तियां कर दी. इसके बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट में उस वक्त 25 में से 7 जज ब्राह्मण थे, इसका मतलब है कि 28 फीसदी ब्राह्मण ही थे. ये आंकड़े साफ करते है कि ब्राह्मणोंं का न्यायपालिका में वर्चस्व था और आज भी है. 


ब्राह्मणों के अलावा ऊंची जाति माने जाने वाले क्षत्रिय और वैश्य या बनिया लोगों का भी भारत की न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व रहा, लेकिन वह ब्राह्मणों से कम ही था. इस तरह से ब्राह्मणों का नियंत्रण सुप्रीम कोर्ट में रहा है. राजस्थान हाईकोर्ट में अब तक जितने मुख्य न्यायाधीश हुए है वह सारे के सारे बनिया जाति के है और उसी राजस्थान हाईकोर्ट के सामने मनु का पुतला लगाया गया है. जिसके लिखे कानूनों ने बहुजन समाज को मानवीय अधिकारों से वंचित रखा. महिलाओं और सबसे बड़ी आबादी वाले ओबीसी को गुलाम बनाया. उसका पुतला न्यायालय के प्रांगण में लगाकर ब्राह्मणवादी लोगों ने भारतीय संविधान का न केवल अवमान किया है बल्कि बहुजन समाज को चुनौती भी दी है कि हम भारतीय संविधान से नहीं बल्कि मनु के कानून से ही देश चलाएंगे आप हमें रोक कर दिखाओ.


अब बात करते है न्यायपालिका के कॉलेजियम सिस्टम की, जिसके बारे में भी बहुजन समाज के अंदर बहुत ज्यादा रोष है और वह उसे समाप्त करने की मांग कर रहे है. कॉलेजियम सिस्टम से पहले केंद्रीय कानून मंत्री ही हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट में भेजते थे. इससे दिक्कत ये थी कि सरकार के मनचाहे लोग सुप्रीम कोर्ट में जाते थे, जो बहुत बार सरकार के हितों कि रक्षा करने के लिए फैसले देते थे. केंद्र सरकार उन न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट में नहीं भेजती जो उनके लिए कोई संकट खड़ा करें. इस बात को समझाने के लिए जस्टिस एमएन चांदुरकर का उदाहरण दिया जा सकता है. 


जस्टिस चांदुरकर मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे, उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाने से केवल इसलिए रोका गया, क्योंकि वे आरएसएस के प्रमुख एमएस गोलवलकर के अंतिम संस्कार के कार्यक्रम गए थे और उनके पिता गोलवलकर के दोस्त थे. केवल इसी बात को लेकर उन्हें तत्कालिन केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने नहीं दिया. सुप्रीम कोर्ट के जजों कि नियुक्तियों में केवल सरकार का ही रोल नहीं होता था, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश भी नियुक्तियों में सक्रिय भूमिका निभाते थे. 


एक मजेदार उदाहरण है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस आरएस पाठक के पड़ोसी दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीएस चावला थे. एक बार चावला ने पाठक के कुत्ते को मारने की धमकी दी थी और इसी कारणवश जस्टिस पाठक ने जस्टिस चावला को सुप्रीम कोर्ट नहीं आने दिया था.


कॉलेजियम सिस्टम लाने का सबसे अहम कारण ये था कि 1988-89 में केंद्रीय कानून मंत्री बी. शंकरानंद और पी.शिव शंकर ने सुप्रीम कोर्ट में गैर ब्राह्मण जजों कि नियुक्तियां करना शुरू दिया था. इसे ब्राह्मणों ने खतरे की घंटी समझी और सोचा की इसी तरह से अगर पिछड़ी जातियों के लोग केंद्रीय सत्ता में पहुँचते रहे तो न्यायपालिका ही नहीं बल्कि देश के हर एक क्षेत्र से ब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त हो जायेगा. इसलिए सुप्रीम कोर्ट के ब्राह्मण जजों ने ही फैसला किया कि वे ही सर्वोच्च अदालत के लिए न्यायाधीशों का चुनाव करेंगे और इसे ही कॉलेजियम सिस्टम कहा जाता है. 


अगर 2004 से लेकर 2014 तक में हुई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों कि नियुक्ति की बात करें तो, जब देश में कांग्रेस की सरकार थी. इन दस सालों में सुप्रीम कोर्ट में 52 न्यायाधीशों कि नियुक्तियां हुई. जिनमें से 16 ब्राह्मण थे. इसका मतलब 30.76फीसदी नियुक्तियां ब्राह्मणों की हुई. वहीं 2014 से लेकर अब तक की बात करें तो जब केंद्र में भाजपा की सरकार है, तो 2014 से लेकर अब तक 35 जजों की नियुक्तियां हुई है. जिनमें से 9 जज ब्राह्मण है. ये 26 फीसदी है. ये ऐसा क्यों हुआ, क्योंकि अभी 5 जजों का जो कॉलेजियम है उसमें से 3 जज ब्राह्मण है और भविष्य में रिटायर्ड के बाद भी कॉलेजियम सिस्टम में ब्राह्मणों का वर्चस्व बना रहेगा.


ये तो हो गई सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मणों के वर्चस्व की बात. अब हम बात करेंगे अनु.जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं के प्रतिनिधीत्व के बारे में. साल 1980 तक अनु.जाति का एक भी जज सुप्रीम कोर्ट में नहीं था. 1980 में सुप्रीम कोर्ट में पहली बार अनु.जाति के न्यायाधीश के तौर पर जस्टिस ए. वरदराजन की नियुक्ति हुई. ये नियुक्ति संविधान लागू होने के 30 साल बाद हुई थी. वे दो महीने के बाद सेवानिवृत्त हुए. उनकी जगह जस्टिस बी.सी. रे की नियुक्ति हुई. जस्टिस के.जी. बालकृष्णन सुप्रीम कोर्ट के पहले मुख्य न्यायाधीश बने जो अनु.जाति से आते थे. अभी जस्टिस बी.आर. गवई सुप्रीम कोर्ट में जज है जो भविष्य में मुख्य न्यायाधीश बन सकते है.


इसी तरह अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के साथ भी हुआ है. 1980 में ही सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एस.आर. पांडियन की नियुक्ती हुई जो ओबीसी थे. दुसरी नियुक्ती जस्टिस के.एन. सैकिया इनकी हुई जो अहोम कम्युनिटी के थे. इसके अलावा जस्टिस के.एस. हेगड़े की 1967 में और ए.एन अलागिरी स्वामी की नियुक्ति 1972 में हुई थी, जिनकी जातियों को बाद में ओबीसी में शामिल किया गया था.


सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि अनु.जनजाति में से एक भी व्यक्ति अभी तक सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नहीं बन पाया या षड़यंत्रपूर्वक नहीं बनने दिया गया. यही वजह है कि देश में उनके साथ सबसे ज्यादा अन्याय होता है क्योंकि न्याय का संबंध प्रतिनिधित्व के साथ है. सुप्रीम कोर्ट में उनका प्रतिनिधित्व आजादी मिलने के 74 साल बाद और संविधान लागू होने के 71 साल बाद भी शून्य ही है. देश में महिलाओं की भी यही स्थिति है. सुप्रीम कोर्ट में देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने के लिए अब तक केवल मात्र 8 महिला न्यायाधीश बनने का मौका मिला. 


उसमें भी एक मुस्लिम और अन्य 7 उंची जाति की ही थी. इतना ही नहीं तो अब तक एक भी महिला सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश नहीं बनी. अल्पसंख्यकों की बात करें तो सुप्रीम कोर्ट के शुरुआत से ही एक-एक न्यायाधीश मुस्लिम और ख्रिश्चनों का होता था और यह काम अंग्रेजों द्वारा किया गया था. कांग्रेस के हाथ में सत्ता आने के बाद उन्होंने उसे जारी रखा, वह इसलिए क्योंकि पंडित नेहरू अपनी समाजवादी छबी बनाये रखना चाहते थे. सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर एक सीट अघोषित रूप से मुस्लिम के लिए ‘आरक्षित’ है. जब की ऐसी कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है, लेकिन पंडित नेहरू की समाजवादी छबी के लिए ऐसा करना जरूरी था. यही बात अनु.जाति के लिए लागू की गई है. जब कोई अनु.जाति का जज रिटायर्ड होता है तभी उसकी जगह दुसरे अनु.जाति के जज की नियुक्ति की जाती है.


जस्टिस हिदायतुल्ला ने एक जगह कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में जज के लिए उनका नाम जस्टिस के. सुब्बाराव और जस्टिस के.एन वंचु से पहले प्रस्तावित था, लेकिन पंडित नेहरू ने उनकी जगह जस्टिस वंचु को चुना क्योंकि वंचु भी नेहरू की तरह कश्मीरी पंडित थे. ये है पंडित नेहरू का असली समाजवादी चेहरा. सुप्रीम कोर्ट के पहले मुस्लिम जज जस्टिस ड. हिदायतुल्ला थे और अब तक उनके अलावा 17 और मुस्लिम लोग सुप्रीम कोर्ट के जज बने, जिसमें एक महिला ड. फातिमा बीवी शामिल है. 


1950 से लेकर 2019 तक मुसलमानों का सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के तौर पर प्रतिनिधित्व घटता चला गया. 1950 में जहां 6 में से 1 मुस्लिम न्यायाधीश था जो 16.67 फीसदी होता है, वहीं 2019 में 34 में 1 यानी 3 फीसदी रह गया है. अब तक के कुल 246 जजों में 18 मुस्लिम है यानी मुसलमानों का सुप्रीम कोर्ट में केवल मात्र 6.75 फीसदी प्रतिनिधित्व है, जब की देश में उनकी आबादी 15 फीसदी है.


यही हालात सिख धर्म के लोगों की है. उनके अब तक केवल 4 जज ही सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बन पाये है. वे भी चारों के चारों उंची जाति के है. वंचितों में से एक भी नहीं, जो उनका प्रतिनिधित्व करता हो. ख्रिश्चनों की भी यही कहानि है. पिछले 70 सालों में सुप्रीम कोर्ट में ख्रिश्चनों के अभी तक 9 जज बने है, जस्टिस चिन्नाप्पा रेड्डी को छोडकर. क्योंकि जस्टिस रेड्डी जो रेड्डी जाति से आते थे, उनको जुलाई 1978 में ख्रिश्चन समझकर जस्टिस के.के. मैथ्यु की जगह नियुक्त किया था जो 1976 में ही सेवानिवृत्त हुए थे. इसका मतलब ये ही की एक मुस्लिम रिटायर्ड होने के बाद उसी जगह दुसरा मुस्लिम, एक ख्रिश्चन जज रिटायर्ड होने पर उसकी जगह दूसरा ख्रिश्चन जज लाया जाता है. इससे हुआ ये कि न्यायपालिका पर एक ही जाति का नियंत्रण हो गया और उससे न्यायपालिका अनियंत्रित हो गई.


न्यायपालिका अनियंत्रित होने के कुछ सबूत, कुछ उदाहरण मै यहां पर देना चाहूँगा. जस्टिस देसाई जो खुद ब्राह्मण है, उन्होंने कर्नाटक में चल रहे आरक्षण के केस पर टिप्पणी करते हुए कहा की ये फैसला पांच जजों की बेंच करेगा, जिसमें से कोई भी पिछड़े जाति का नहीं है. उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा की अनु.जाति और पिछड़े वर्ग के बारे में फैसला ब्राह्मण जाति के लोग करेंगे. साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस अनिल दवे ने कहा गीता और महाभारत को पाठशालाओं में अनिवार्य कर देना चाहिए. साल 2019 में केरल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने ब्राह्मणों से कहा कि आप जाति आधारित आरक्षण का विरोध करें. साल 2017 में राजस्थान हाई कोर्ट के जज महेश शर्मा ने कहा की मोरनी मोर के आंसू पीकर गर्भवती होती है, इतना ही नहीं तो एट्रोसिटी कानून में बदलाव करने वाले भी सुप्रीम कोर्ट के ब्राह्मण जज ही थे.


जस्टिस पांडियन ने मंडल कमिशन कि केस में ये आशंका जताई थी कि सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मणों का वर्चस्व ऐसे ही बढ़ता रहा तो वह सामाजिक न्याय की नितियों को प्रभावित करेगा और यही बात हमें सुप्रीम कोर्ट के मराठा आरक्षण विरोधी फैसले में साफ तौर पर दिखाई दी. ये फैसला देने वाले भी पांचों जज ब्राह्मण और तत्सम उंची जाति के ही है. वहां पर एन.एम थॉमस केस के बारे में केरल हाई कोर्ट ने किया हुआ निरीक्षण याद दिलाना जरूरी है. उसमें कहा गया था कि प्रशासन के सभी अंगों में पर्याप्त मात्रा में प्रतिनिधित्व होना चाहिए. इसी से फंक्शनल डेमोक्रेसी अस्तित्व में आयेगी. न्यायपालिका पर ब्राह्मणों के वर्चस्व का ही नतीजा है कि हर बार न्यायपालिका बहुजन विरोधी, असंवैधानिक, ब्राह्मणी व्यवस्था को मजबूत करने वाले और लोगों को न्याय दिलाने की बजाय अन्याय करने वाले फैसले दे रही है.

कमलकांत काले,
मुख्य संपादक एमएन टीवी
मो.7058221975

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