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बीजेपी और आरएसएस के गुप्त सर्वे में बीजेपी को हारता देख बदला सीएम, हार्दिक पटेल का निशाना

Published On :    13 Sep 2021   By : MN Staff
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बीजेपी ने अगले साल गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने पाटीदार कार्ड खेलते हुए इस समुदाय को रिझाने की कवायद में बड़ा कदम उठाया है. भाजपा ने संघ के करिबी रहे भूपेंद्र पटेल को गुजरात की कमान सौंपने का फैसला किया है.



नई दिल्ली : बीजेपी ने अगले साल गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने पाटीदार कार्ड खेलते हुए इस समुदाय को रिझाने की कवायद में बड़ा कदम उठाया है. भाजपा ने संघ के करिबी रहे भूपेंद्र पटेल को गुजरात की कमान सौंपने का फैसला किया है.


मोदी-शाह ने बड़ी सोची-समझी रणनीति के तहत यह कदम उठाया है. इसके जरिये पार्टी पिछले कुछ समय से बिदके पाटीदार समुदाय को खुश करना चाहती है. भाजपा के इस फैसले पर पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने तंज कसा है. सीएम के बदलाव पर कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल ने कहा कि मुख्यमंत्री बदलने के पीछे बीजेपी और आरएसएस का गुप्त सर्वे है. इस सर्वे में बीजेपी को हारता हुआ दिखाया गया है. अगले साल चुनावों में कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है.


पटेल ने कहा कि पिछले कई सालों से बीजेपी सरकार की नीतियों के कारण गुजरात के लोग दुखी और परेशान हैं. लाखों नौजवान बेरोजगार हो गए हैं, लाखों परिवार बेघर हो गए हैं. महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सब कोई चिंतित हैं. गांव और किसान बर्बाद हो गए हैं. ऐसे समय में मुख्यमंत्री का बदलना ही बड़ी बात नहीं है, जनता सरकार बदलना चाहती है. आज तक पर डिबेट में उन्होंने यह बात कहीं.


हार्दिक ने कहा कि गुजरात का सीएम दिल्ली से कंट्रोल होता है. पहले के सीएम भी ऐसे थे और अब जो नए बने हैं, वह भी दिल्ली के इशारे पर काम करेंगे. बीजेपी के सीएम को फ्री हैंड नहीं है. हार्दिक ने कहा कि आरएसएस और बीजेपी के सर्वे में कांग्रेस जीत रही, इसलिए विजय रुपाणी का इस्तीफा लिया गया. मुख्यमंत्री का इस्तीफा गुजरात की जनता को गुमराह करने के लिए लिया गया फैसला है, लेकिन असली परिवर्तन अगले वर्ष चुनावों के बाद आएगा, जब जनता बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेकेंगी.


बताते चले कि गुजरात में पाटीदार समुदाय धन-बल दोनों से बेहद ताकतवर है. भाजपा के दो दशकों से जारी विजय अभियान में इस समुदाय की बड़ी भूमिका है. 2016 में आनंदीबेन पटेल ने इस्तीफा दिया था, वह इसी समुदाय से आती हैं. बताया जाता है कि पाटीदार समुदाय का समर्थन ही है जिसने पिछले दो दशकों से भाजपा को गुजरात में जमाकर रखा हुआ है. 


राज्य में पाटीदारों की ताकत का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ये 182 विधानसभा क्षेत्रों में से 70 से अधिक में चुनावी नतीजों का रुख बदल सकते हैं. ये 71 निर्वाचन क्षेत्रों में तकरीबन 15 फीसदी या उससे ज्यादा मतदाता हैं. पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी के वोट शेयर का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि इसका लगभग एक-चौथाई हिस्सा पाटीदारों का है.


पाटीदार या पटेल समुदाय पूरे गुजरात में फैला है. उत्तर गुजरात और सौराष्ट्र में इनकी आबादी काफी ज्यादा है. 1970 के दशक के अंत तक उनका राज्यभर में राजनीतिक दबदबा रहा है. तब यह समुदाय कांग्रेस का प्रबल समर्थक होता था. पिछले कुछ समय में पाटीदार समुदाय भाजपा से नाराज रहा है. इसकी वजह है आरक्षण की मांग. समुदाय 2015 से अपने लिए ओबीसी की मांग करता रहा है. इस आंदोलन से हार्दिक पटेल जैसे नेता उभरकर सामने आए. हार्दिक पटेल के नेतृत्व में यह मांग काफी तीखी हो गई. कई जगह हिंसा की घटनाएं हुईं. हार्दिक पटेल को गिरफ्तार तक कर लिया गया.


बीजेपी ने 2017 का चुनाव साधारण मेजोरिटी से जीता था. 2017 में उसे 99 सीटें मिलीं जबकि 2012 चुनावों में उसे 115 सीटें मिली थीं. 2014 के लोकसभा चुनाव से पाटीदारों का वोट शेयर भी कम हुआ है. जहां 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को पाटीदारों का 60 फीसदी वोट मिला था वहीं, 2017 में यह घटकर 49.1 फीसदी रह गया. अगले साल गुजरात में चुनाव होने हैं. इसे देखते हुए भाजपा ने पाटीदार समुदाय को रिझाना शुरू कर दिया है. 2019 और 2020 में कोविड के दौरान रुपाणी सरकार के कामकाज की खासी आलोचना हुई और 2022 के चुनावों से पहले भाजपा ने श्री रुपाणी को हटाने का फ़ैसला किया.


बता दें कि अगले विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने मुख्यमंत्री का बदलने का फ़ैसला पहली बार नहीं किया, बल्कि पिछले छह महीनों में पार्टी ने चार राज्यों में पांच चेहरे बदले हैं. गुजरात में रूपाणी, कर्नाटक में  येदियुरप्पा और उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत और तीरथ सिंह को बदला गया तो असम में सर्वानंद सोनोवाल के बजाय चुनावों के बाद हिमंत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला लिया गया. गुजरात में तो नरेन्द्र मोदी के अलावा हर बार चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदला गया. मोदी के अलावा किसी मुख्यमंत्री ने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया.

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