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आधे किसान परिवारों पर कर्ज का बोझ : सर्वे

Published On :    15 Sep 2021   By : MN Staff
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केन्द्र में जब से संघ संचालित बीजेपी की मोदी सरकार बनी है तब से किसान न केवल कर्ज के दलदल में समाते जा रहे हैं, बल्कि कर्ज चुकता न कर पाने के कारण आत्महत्या भी कर रहे हैं.



नई दिल्ली : केन्द्र में जब से संघ संचालित बीजेपी की मोदी सरकार बनी है तब से किसान न केवल कर्ज के दलदल में समाते जा रहे हैं, बल्कि कर्ज चुकता न कर पाने के कारण आत्महत्या भी कर रहे हैं. यहां तक कि अनाज पैदा करने वाला खुद किसान ही दाने-दाने के लिए मोहताज है. इसके बाद भी सरकार हर साल किसानों के बजट में भारी कटौती करते आ रही है. सरकार की ही गलत नीतियों के कारण किसानों के फसल की कीमत तो दूर उनके बीज का भी पैसा निकल पाना मुश्किल हो रहा है.  


देश में खेती-किसानी, पशुपालन आदि से गुजारा करने वाला हर दूसरा किसान परिवार कर्ज में डूबा हुआ है. यानी ग्रामीण भारत में हर किसान परिवार पर औसतन 74,121 रुपए का कर्ज है. इतना ही नहीं एनएसओ सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में पिछले 5 वर्षों में किसान परिवार पर औसत कर्ज 58 फीसदी बढ़ गया है. ये आंकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में निकलकर सामने आए हैं. 


10 सितंबर को जारी ‘ग्रामीण भारत में परिवारों की स्थिति का आकलन और परिवारों की भूमि जोत, 2019’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में बताया गया है 2018 में 50.2 प्रतिशत कृषि परिवार कर्ज में थे और प्रत्येक कृषि परिवार पर बकाया ऋण की औसत राशि 74,121 रुपये थी। पांच साल पहले 2013 में औसत कर्ज 47,000 रुपये था जो 2018 में 74,121 रुपये हो गया. सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि कुल ऋण में से केवल 57.5 प्रतिशत खेती कार्यों के लिए लिया गया था. इसके अलावा, केवल 69.6 प्रतिशत बकाया ऋण संस्थागत स्रोतों जैसे बैंकों, सहकारी समितियों और सरकारी एजेंसियों से लिया गया था, जबकि 20.5 प्रतिशत ऋण साहूकारों से लिया गया था.


अच्छी खबर यह है कि कर्ज में डूबे इन कृषि परिवारों का प्रतिशत 2013 में 51.9 प्रतिशत से थोड़ा कम होकर हाल के सर्वेक्षण में 50.2 प्रतिशत हो गया है, लेकिन चिंताजनक आंकड़ा यह है कि ऐसे प्रति परिवारों पर बकाया ऋण की औसत राशि 57.7 प्रतिशत हो गई है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी रिपोर्ट 1 जनवरी, 2019 से 31 दिसंबर, 2019 के बीच किए गए एनएसओ के 77वें दौर के सर्वेक्षण पर आधारित हैं। इस अवधि के दौरान 45000 से अधिक कृषि परिवारों को इस सर्वेक्षण में शामिल किया गया. 


कार्यक्रम कार्यान्वयन और सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी-दिसंबर 2019 के दौरान देश के ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार की भूमि और पशुधन के अलावा कृषि परिवारों की स्थिति का आकलन किया। भारत में कृषि कैलेंडर (जुलाई से जून) तक होता है. सर्वेक्षण जनवरी-अगस्त 2019 और सितंबर-दिसंबर 2019 के दौरान किया गया था.


बताते चलें कि साल 2020 में 20 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के 179 जिलों में 25,300 उत्तरदाताओं के साथ आमने-सामने पहला राष्ट्रीय ग्रामीण सर्वे किया गया. सर्वेक्षण में पाया गया कि 20 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन से निपटने के लिए जमीन, गहने और कीमती सामान गिरवी रखना या बेचना पड़ा. वहीं अन्य 23 प्रतिशत को विभिन्न खर्चों को पूरा करने के लिए किसी से कर्ज तक लेना पड़ा था. 



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इस ग्रामीण सर्वेक्षण में पाया गया कि हरियाणा, पंजाब, असम, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश में लोगों ने अन्य राज्यों की तुलना में अधिक ऋण लिया था. त्रिपुरा में 13 फीसदी को जमीन बेचनी पड़ी या फिर गिरवी रखनी पड़ी और 20 फीसदी को अपना कीमती सामान बेचना पड़ा. पश्चिम बंगाल में 22 प्रतिशत लोगों के पास आभूषण थे और 17 प्रतिशत लोगों को अपना कीमती सामान बेचना या गिरवी रखना पड़ा था.

कृषि से ज्यादा मजदूरी से आय
भारत एक कृषि प्रधान देश है. परन्तु, हैरानी की बात यह है कि किसान परिवार ही दाने-दाने के लिए मोहताज है. क्योकि, खेती किसानी अब घाटे का सौदा बनता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण सरकार की गलत नीतियां हैं. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत में किसानों को खेती किसानी से ज्यादा आय (फायदा) मजदूरी से हो रही है.  


सर्वे के अनुसार कृषि वर्ष 2018-19 के दौरान प्रति कृषक परिवार की औसत मासिक आय 10,218 रुपये थी. सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि कृषि परिवारों की कुल आय 2019 में बढ़कर 10,218 रुपये हो गई, जो 2013 में 6,426 रुपये थी. कुल औसत आय में सबसे अधिक हिस्सा 4,063 रुपये की मजदूरी से आय का था. इसके बाद फसल उत्पादन से 3,798 रुपये, पशुपालन से 1,582 रुपये, गैर-कृषि व्यवसाय 641 रुपये तथा भूमि पट्टे से 134 रुपये की आय थी.


सर्वे में कहा गया है कि देश में किसान परिवारों की संख्या 9.3 करोड़ (93 मिलियन) है. जबकि गैर कृषि परिवारों की संख्या 7.93 करोड़ (79.3 मिलियन) अनुमानित है. इसमें यह भी बताया गया है कि 83.5 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास एक हेक्टेयर (2.5 एकड़) से भी कम जमीन है. महज 0.2 फीसदी के पास 10 हेक्टेयर (25 एकड़) से अधिक जमीन थी. 9.3 करोड़ कृषि परिवारों में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) 45.8 प्रतिशत, अनुसूचित जाति (एसी) 15.9 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (एसटी) 14.2 प्रतिशत और अन्य 24.1 प्रतिशत हैं. सर्वे के अनुसार जुलाई-दिसंबर 2018 सबसे कर्ज आंध्र प्रदेश में 2.45 लाख रुपए और नागालैंड में 1750 रुपए था.  


सूत्रों के मुताबिक, एनएसओ के 77वें सर्वेक्षण के लिए एक कृषक परिवार को कृषि गतिविधियों से फसल उत्पादन से रूप में 4000 रुपये से अधिक प्राप्त करने वाले परिवार के रूप में परिभाषित किया गया था, जिसमें खेत की फसलों की खेती, बागवानी फसलों, चारा फसलों, वृक्षारोपण, पशुपालन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, सूअर पालन, मधुमक्खी पालन, वर्मीकल्चर, सेरीकल्चर, और पिछले 365 दिनों के दौरान कृषि में कम से कम एक सदस्य स्व-नियोजित या तो प्रमुख स्थिति में या सहायक स्थिति में रहा हो. 
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