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52 फीसदी ओबीसी के साथ धोकेबाजी, इस बार भी नहीं होगी पिछड़े वर्ग की जातिनिहाय जनगणना

Published On :    24 Sep 2021   By : MN Staff
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केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट हलफनामा दायर किया गया और इसके पीछे तर्क दिया गया कि पिछड़ी जातियों की जाति आधारित गणना प्रशासनिक रूप से कठिन काम है. साथ ही यह भी तर्क दिया गया है कि सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 में की गई थी और उसमें कई गलती थी.



नई दिल्ली : ब्राह्मणवादी शासक जातियों का एक बार फिर से पिछड़ा वर्ग विराधी चेहरा सामने आया है. केंद्र की मोदी सरकार ने 52 फीसदी ओबीसी की जाती निहाय जनगणना करने से इनकार कर दिया. केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट हलफनामा दायर किया गया और इसके पीछे तर्क दिया गया कि पिछड़ी जातियों की जाति आधारित गणना प्रशासनिक रूप से कठिन काम है. साथ ही यह भी तर्क दिया गया है कि सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 में की गई थी और उसमें कई गलती थी.


केंद्र ने खामियों को सामने रखते हुए कहा है कि 1931 जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि कुल जातियां 4,147 थीं लेकिन 2011 एसईसीसी में 46 लाख से ज्यादा पता चलते हैं. सरकार ने कहा है कि यह आंकड़ा वास्तव में हो ही नहीं सकता, संभव है कि इनमें कुछ जातियां उपजातियां रही हों.सरकार ने बताया है कि जनगणना करने वाले कर्मचारियों की गलती और गणना करने के तरीके में गड़बड़ी के कारण आकंड़े विश्वसनीय नहीं रह जाते हैं.

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दरअसल महाराष्ट्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि केंद्र और संबंधित अथॉरिटी को निर्देश दिया जाए कि वह राज्य को सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना 2011 में दर्ज ओबीसी के जातीय आंकड़ों की जानकारी मुहैया कराएं. याचिका में राज्य सरकार ने कहा कि उन्होंने बार- बार इसके लिए गुहार लगाई लेकिन उन्हें जानकारी नहीं दी गई.


इस पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि पिछड़े वर्ग की जाति जनगणना एडमिनिस्ट्रेटिव तौर पर कठिन और बोझिल कार्य है. सोच समझकर एक नीतिगत फैसले के तहत इस तरह की जानकारी को जनगणना के दायरे से अलग रखा गया है. सरकार ने यह भी कहा है कि जनगणना कराने का काम एडवांस्ड स्टेज में है और अब मानदंडों में बदलाव नहीं किया जा सकता है. वैसे भी कोरोना महामारी के चलते प्रक्रिया में थोड़ी देर हो गई है. सरकार ने आगे कहा, सुप्रीम कोर्ट की तरफ से ओबीसी की जातिगत जनगणना कराने को लेकर कोई भी निर्देश बड़े पैमाने पर भ्रम पैदा करेगा और सरकार के नीतिगत फैसले में भी दखल होगा, जबकि सरकार ने सेंसस 2021 में ओबीसी जाति जनगणना न कराने का फैसला किया है.


गौरतलब है कि पिछले कई सालों से खासकर बामसेफ जैसे संगठन के अलावा ओबीसी की कई संगठनाएं ओबीसी की जाती निहाय जनगणना कराने की मांग करती आई है. यही नहीं तो कई राजनीतिक दलों ने भी इसकी वकालत की है. एनडीए के सहयोगी घटक दलों के अलावा भाजपा नेता भी इसकी मांग कर चुके है. बिहार के सीएम नीतीश कुमार की अगुवाई वाली प्रतिनिधिमंडल ने तो जाति गणना की मांग पीएम से की थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने जो बात कहीं उससे 52 फीसदी ओबीसी के साथ ही इन सबको बड़ा झटका लगा है. अब देखना होगा की सीएम नीतीश कुमार क्या रूख अपनाते है. जातिगत जनगणना के मसले पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उसने 2021 की जनगणना में ओबीसी की गणना नहीं करने का फैसला किया है.


ओबीसी की जातिगत जनगणना इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर इन समूह की जनगणना की जाती है तो सबसे पहले इनकी आबादी का पता चलेगा. साथ ही इनके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक पिछड़ेपण के आंकडे सामने आएंगे. यह भी सामने आएगा की इन समूह में कितने लोग शिक्षित है, कितने लोगों को नौकरी है, कितने लोगों के पास घर नहीं है आदि अन्य जानकारी भी सामने आएगी. जब यह जानकारी सामने आएगी तो सरकार को संख्या के अनुपात में ओबीसी को शासन और प्रशासन में हिस्सेदारी देनी होगी. इससे प्रशासन के अलावा राजनीति में भी ओबीसी का वर्चस्व बढ़ेगा. जब राजनीति में ओबीसी का वर्चस्व बढ़ेगा तो ब्राह्मणवादी दलों की जड़े हिलने लगेगी. दूसरी तरफ ओबीसी के आने से प्रशासन में उच्च जाति का प्रतिनिधित्व घट जाएगा. यह ना हो इसलिए सरकार ओबीसी की जाती निहाय जनगणना कराने से इनकार कर रही है.
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