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ब्रिटिश सांसदों ने ‘कश्मीर में मानवाधिकार’ पर चर्चा के लिए रखा प्रस्ताव किया पेश, भारत ने जताई आपत्ति

Published On :    25 Sep 2021   By : MN Staff
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भारत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि देश के विभिन्न हिस्से से संबंधित विषय पर किसी भी मंच पर किए गए दावे को पुष्ट तथ्यों के साथ प्रमाणित करने की आवश्यकता है



नई दिल्ली : ब्रिटेन में सांसदों ने हाउस ऑफ कॉमन्स के वेस्टमिंस्टर हॉल में चर्चा के लिए ‘कश्मीर में मानवाधिकारों’ पर एक प्रस्ताव रखा. ‘ऑल पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप’ (एपीपीजी) के सांसदों ने यह प्रस्ताव रखा है. है जिस पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि देश के विभिन्न हिस्से से संबंधित विषय पर किसी भी मंच पर किए गए दावे को पुष्ट तथ्यों के साथ प्रमाणित करने की आवश्यकता है.



लेबर पार्टी की सारा ओवेन द्वारा आयोजित चर्चा में ब्रिटेन के विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों ने भाग लिया. उन्होंने कथित मानवाधिकार उल्लंघन पर चिंता जताई और ब्रिटेन की सरकार से क्षेत्र तक सुगम पहुंच के लिए अनुरोध किया ताकि भविष्य में जम्मू कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से सीधी रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में पेश की जा सके.



विदेश, राष्ट्रमंडल और विकास कार्यालय (एफसीडीओ) में एशिया की मंत्री अमांडा मिलिंग ने बृहस्पतिवार को चर्चा में द्विपक्षीय मुद्दे के तौर पर कश्मीर पर ब्रिटेन सरकार के रुख में कोई परिवर्तन न आने की बात दोहरायी. मिलिंग ने कहा, सरकार कश्मीर में स्थिति को बहुत गंभीरता से लेती है, लेकिन भारत और पाकिस्तान को ही कश्मीरी लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए स्थायी राजनीतिक समाधान तलाशना होगा. ब्रिटेन का जिम्मा इसका कोई समाधान देना या मध्यस्थ के तौर पर काम करने का नहीं है. हालांकि उन्होंने कहा कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) के दोनों ओर मानवाधिकार संबंधी चिंताएं हैं.



एशिया के लिए मंत्री की जिम्मेदारी होने के नाते से एडम्स ने कहा कि ब्रिटिश सरकार की कश्मीर पर नीति स्थिर है और इसमें कोई बदलाव नहीं है। हम लगातार यह मानते आये हैं कि हालात का दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान भारत और पाकिस्तान को तलाशना है जिसमें कश्मीरी जनता की आकांक्षाओं का ध्यान रखा जाए, जैसा कि शिमला समझौते में उल्लेखित है.



भारत सरकार ने इस चर्चा में भाग ले रहे सांसदों खासतौर से पाकिस्तानी मूल की सांसद नाज शाह द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा पर निराशा जतायी है. लंदन में भारतीय उच्चायोग के एक अधिकारी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधे जाने की निंदा की. उन्होंने 2002 गुजरात दंगों पर शाह की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए कहा, भारतीय उच्चायोग इस पर दुख जताता है.



इस चर्चा में पक्ष और विपक्ष के 20 से अधिक सांसदों ने भाग लिया. चर्चा में कश्मीर को समस्या वाला बताया गया. लंदन में भारतीय उच्चायोग ने इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई. उच्चायोग ने एक बयान में कहा कि शीर्षक में ‘कश्मीर’ शब्द के इस्तेमाल के संदर्भ मेंः केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर, जो भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बीच अंतर समझने की जरूरत है.



भारत ने कहा कि इस बात पर भी संज्ञान लिया गया कि जमीनी रूप से दिखने वाले तथ्यों और अद्यतन जानकारी के आधार पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध पर्याप्त प्रामाणिक जानकारी होने के बावजूद, भारत के केंद्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के संदर्भ में, मौजूदा जमीनी हकीकत की अनदेखी की गयी और एक तीसरे देश द्वारा किये जाने वाले झूठे दावों को प्रदर्शित किया गया जिनमें ‘नरसंहार’ और ‘हिंसा’ तथा ‘प्रताड़ना’ जैसे अपुष्ट आरोप थे.



भारत ने बयान में कहा गया कि किसी विदेशी संसद के अंदर हुई आंतरिक चर्चा में अनावश्यक रुचि लेने की भारत की नीति नहीं है, लेकिन भारतीय उच्चायोग भारत के बारे में सभी को प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराके और गलत धारणाएं तथा गलत सूचनाएं दूर करके सभी संबंधित पक्षों के साथ संवाद रखता है जिनमें ब्रिटेन की सरकार और सांसद शामिल हैं.

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