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हसदेव बचाओ पदयात्रा: जमीन, जंगल को बचाने सैकड़ों आदिवासी पहुंचे राजधानी

Published On :    14 Oct 2021   By : MN Staff
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आदिवासियों के लिए जल, जंगल, जमीन से बढ़कर कुछ नहीं होता. पहाड़ आदिवासी जीवनशैली में अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. उनकी मान्यताएं, रहन-सहन इन्हीं पर केंद्रित होकर चलती हैं.



रायपुर : आदिवासियों के लिए जल, जंगल, जमीन से बढ़कर कुछ नहीं होता. पहाड़ आदिवासी जीवनशैली में अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. उनकी मान्यताएं, रहन-सहन इन्हीं पर केंद्रित होकर चलती हैं. इसके उलट हमारी सरकारें आदिवासियों के जमीन का अधिग्रहन करने और पहाड़ को उखाड़ने में उफ तक नहीं करती हैं. उन्हें पहाड़ और आदिवासियों कि खनिज संपदाएं चाहिए. 


इसी कडी में हसदेव नदी, जंगल व पर्यावरण को बचाने, अपनी आजीविका, संस्कृति और अस्तित्व को बचाने के लिए सैकड़ों आदिवासी परिवार 300 किमी पदयात्रा करके बुधवार को राजधानी पहुंचे. इस दौरान आदिवासियों ने अपनी मांगों को लेकर राजधानी के सड़कों पर जमकर नारेबाजी की. इधर, गुरुवार से बूढ़ा पारा धरना स्थल में आदिवासी धरना देंगे और अपनी मांगों को लेकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपेंगे.


हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के प्रमुख ने बताया कि हसदेव बचाओ पदयात्रा की चार अक्टूबर से शुरुआत की गई. कुल 10 दिन के बाद राजधानी पहुंचे. वहीं, आदिवासियों ने फतेहपुर (सरगुजा) से पदयात्रा की शुरुआत की थी. पदयात्रा धरसींवा से बुधवार को राजधानी में दाखिल हुए. इसके बाद बिरगांव के पास बैठक हुई. बैठक के बाद आदिवासियों ने दोपहर को राजधानी के आंबेडकर चौक के लिए निकले. जहां दोपहर लगभग तीन बजे आंबेडकर चौक पहुंचे. इस दौरान सड़क में कतार बद्ध से चले आदिवासियों ने अपनी मांग को लेकर जमकर नारेबाजी की. वहीं आंबेडकर चौक के पास लगभग एक घंटे रुककर प्रदर्शन किया है. इसके बाद पदयात्रा टिकरापारा स्थित साहू भवन के लिए रवाना हुए. जहां रात बिताई.



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गुरुवार को बूढ़ा पारा धरना स्थल में हसदेव अरण्य से आए हुए ग्रामवासी प्रदर्शन और सम्मेलन आयोजित करेंगे. आलोक ने बताया कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मिलने के लिए समय मांगा है. वहीं राज्यपाल अनुसुईया उईके ने पदयात्रियों के एक दल से संवाद का समय दिया है. जबकि मुख्यमंत्री कार्यालय से अब तक संवाद के आवेदन पर कोई सूचना नहीं मिल पाई है. बता दें कि आदिवासियों का प्रमुख मांग हसेदव अरण्य क्षेत्र की सभी कोयला खनन परियोजना निरस्त करो. बिना ग्रामसभा सहमति के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोल बेयरिंग एक्ट 1957 के तहत किए गए सभी भूमि अधिग्रहण को तत्काल निरस्त करो। पेसा कानून 1996 का पालन करो आदि मांग शामिल है.



बता दें कि जिस क्षेत्र में आदिवासी निवास करते है, वहा की जमीन में बड़ी मात्रा में खनीज संपदा है. इन खनीज संपदा पर कब्जा करने के लिए सरकारे आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहण करके उनकी जमीन उद्योगपतियों को सौंपी जा रही है. जब की कानून के अनुसार आदिवासियों की जमीन केवल आदिवासी ही खरीद सकता है. अन्य समूह का कोई भी व्यक्ति आदिवासियों की जमीन खरीद नहीं सकता. इसके बावजूद छतिसगढ़ में कई आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहन कर गैर आदिवासियों कों सौंपी गई. जो इसका विरोध करेगा उसे नक्षलवादी घोषित कर दिया जा रहा है.
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