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25 से 29 दिसंबर के बीच बामसेफ एवं राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ का संयुक्त राष्ट्रीय अधिवेशन, अपील जारी

Published On :    17 Oct 2021   By : MN Staff
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बहुजन समाज के कर्मचारियों का सबसे बड़ा संगठन बामसेफ एवं राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ का 38 वा राष्ट्रीय अधिवेशन पिछले साल की तरह इस साल भी वर्चूअल तरीके से होने जा रहा है.



नई दिल्ली : बहुजन समाज के कर्मचारियों का सबसे बड़ा संगठन बामसेफ एवं राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ का 38 वा राष्ट्रीय अधिवेशन पिछले साल की तरह इस साल भी वर्चूअल तरीके से होने जा रहा है. पिछले साल के राष्ट्रीय अधिवेशन की तरह इस साल के अधिवेशन के लिए भी समस्याएं आ रही है. कोरोना महामारी के चलते लगाए गए लॉकडाउन की वजह ये समस्या आ रही है. जिससे कार्यकर्ताओं को इस साल भी अधिवेशन में उपस्थित रहना मुश्किल हो गया है. पुलिस परमिशन की समस्या की वजह से इस साल का राष्ट्रीय अधिवेशन भी वर्चुअल तरीके से ही होने वाला है.


बामसेफ और ऑफशूट विंग के कार्यकर्ताओं को जारी की गई अपील में कहा गया है कि लॉकडाउन में केंद्र सरकार ने किसान विरोधी और कामगार विरोधी कानून बनाये. साथ ही मूलनिवासी बहुजन समाज के विरोधी नई शिक्षा नीति लागू की. इसके अलावा मूलनिवासी बहुजन समाज के विरोध में कई निर्णय लिए गये है. जब केंद्र सरकार संसद में ये कानून बना रही थी तब कांग्रेस ने संसद में बायकॉट कर बीजेपी का गुप्त रुपसे समर्थन किया. बीजेपी ने भी पहले ऐसा ही किया था. इतना ही नहीं एनजीओ विरोधी कानून बनाया गया था. शासक जातीयों के विरोध में चल रहे आंदोलन को निष्प्रभावी करने के लिए ऐसा किया गया.


अपिल में कहा गया, इन जनविरोधी कानून के विरोध में जन विद्रोह ना हो और विरोध करने हेतू लोग रास्ते पर ना आए इसलिए लॉकडाउन लगाया है. हालांकि लॉकडाउन कोरोना महामारी का इलाज नहीं है. संविधान की धारा 19 के अनुसार उपरोक्त जन विरोधी कानून के विरोध में लोग रास्ते पर ना आये इसलिए उन्होंने लॉकडाउन का सहारा लिया है. जब की जनविरोधी नीती एवं कानून का विरोध करना लोगों का मूलभूत अधिकार है. लेकिन लॉकडाउन के चलते लोगों को मजबूरन घरो में रहना पड रहा है. इसे दुश्मन अवसर मानता है.


भारत का लोकतंत्र चार पिलर्स पर खडा है. ब्राह्मणों ने लोकतंत्र के चारों पिलर यानी विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया पर कब्जा किया है. इतना ही नहीं भारत के हर संवैधानिक संस्था पर उनका ही कब्जा है. यह जानकारी लोगों को मालुम ना हो इसलिए इसको हिंदुत्व का नाम दिया जा रहा है, जबकि यह ब्राह्मण राज है. ब्राह्मण लोग एससी, एसटी, ओबीसी, एनटी, डीएनटी, वीजेएनटी और मंडल के बाहर के अप्पर कास्ट शूद्रों को हिंदू कहते है. तो क्या ऐसा माना जाए कि देश पर इन लोगों का राज है? ऐसा बिल्कुल ही नहीं है. यह साबित करता है कि हिंदुत्व के नाम पर स्थापित ब्राह्मण राज से लोगों का ध्यान हटाने के लिए देश पर हिंदुत्व का राज है ऐसा प्रचार किया जा रहा है.


केंद्र की भाजपा सरकार ने एनपीआर, एनआरसी और सीएए कानून लाए. कांग्रेस, कम्युनिस्ट और ब्राह्मणों के तमाम संगठन प्रचार कर रहे है कि यह कानून मुस्लिम विरोधी है और मुसलमान भी यही मान रहे है, जबकि यह सच नहीं है. असम में 19 लाख 38 हजार लोगों को नागरिकता के अधिकार से वंचित किया है. उसमें 15 लाख लोग एससी, एसटी और ओबीसी के है. जब की चार से पांच लाख मुसलमान है. इससे सिद्ध होता है कि यह कानून मुस्लीम विरोधी नहीं बल्कि एससी, एसटी और ओबीसी के विरोध में है. 


इस कानून को मुस्लिम विरोधी बताने वाली सभी पार्टियां एससी, एसटी और ओबीसी के विरोधी है. उनका मुख्य उद्देश्य  इस मामले को हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा बनाना था. लेकिन 29 जनवरी, 2020 को हमने इस मुद्दे पर भारत बंद किया. उसके बाद केंद्र की बीजेपी सरकार और उनके नेताओं ने सीएए के मुद्दे पर चुप्पी साध ली. क्योंकि  इस मामले को हिन्दू-मुसलमान बनाने की उनकी रणनीति फेल हो गई. भारत बंद ने एससी, एसटी, ओबीसी और मुसलमानों में सामाजिक ध्रुवीकरण शुरु होने से सभी मजलूमों का इत्तेहाद होने की स्थिती निर्माण हो गयी.


कोरोना महामारी को रोकने के लिए सरकार दवाइयां इंजेक्शन और प्रतिबंधक टीका दे रही है. इसके बावजूद  जिन लोगों ने दवाइयां इंजेक्शन और प्रतिबंधक टिका लिया है उसमें से कुछ लोगों की मौत हो गई है. इसलिए लोगों का उपरोक्त बातों पर यकीन नहीं है. इसलिए लोग पूछ रहे है कि इन दवाईयों, इंजेक्शन और टीकाकरण में कौन से औषधी घटक है? और सरकार बता नहीं रही है. सुप्रीम कोर्ट कहता है कि इसका टीका लगाना मँडेटरी नहीं है. फिर भी कार्यालयों में कर्मचारियों पर जोर-जबरदस्ती की जा रही है, जो संविधान के राईट टू लिव इस मौलिक अधिकार का हनन है.


कोरोना महामारी में राज्यों की सहमति लिए बिना और इस पर कोई राष्ट्रीय चर्चा किए बिना नई शिक्षा नीति लायी गई. इतना अहम राष्ट्रीय कार्य राष्ट्रीय स्तर की बहस किये बगैर किया जा रहा है. यह बहुत ही गंभीर मामला है. देश में एससी, एसटी, ओबीसी और एनटी, डीएनटी एवं वीजेएनटी के लोगों की शिक्षा से संबंधित किसी भी मौलिक समस्याओं का न समाधान किया गया न उनकी राय ली गयी. आने वाले समय में इसके बहुत गंभीर परिणाम निकलने वाले है. यह मानवी विकास एवं साधन संसाधनों का मामला है. जिसे लोगों को अंधेरे में रखकर लागू किया जा रहा है. यह संविधान विरोधी काम है.


लोकतंत्र के चौथे पिलर कहे जाने वाले मीडिया को समाप्त कर उसका गलत मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. देशभर में हो रहे अन्याय-अत्याचार को दबाने के लिए पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल किया जा रहा है और प्रचार किया जाता है कि यह विदेशी लोगों की साजिश है. यह इसलिए हो रहा है क्योंकि शासक वर्ग को ऐसा लगता है कि हम ईवीएम के जरिए चुनाव जीत सकते है. इसलिए किसी भी समस्या की तरफ गंभीरता से देखने की जरूरत नहीं है. प्रशासन की गुणवत्ता में इतना नकारार्थी परिणाम ईवीएम की वजह से आ रहा है. मीडिया वाले इस बात को छुपाने का काम कर रहे है. इसलिए इसे समझने और इसके विरोध में समुचित कार्यवाही करने की जरुरत है.


अपील मे कहा गया है कि शासक जातियों ने ३० साल में एलपीजी, सेझ लाया और रिटेल मार्केटिंग को मॉल में तब्दील कर दिया. हायर एण्ड प्रोफेशनल एजूकेशन का निजीकरण कर प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा का सत्यानाश किया. इसके बाद किसानों के विरोध में और कामगारों के विरोध में कानून बनाए और नई शिक्षा नीति लायी. ये सारे परिणाम है. तो उसके मूल कारण क्या है?


इसका पहला मूल कारण कांग्रेस जाती है तो बीजेपी आती है और बीजेपी जाती है तो कांग्रेस आती है. यह उनका आपसी समझदारी का कार्यक्रम है. दुसरा कारण भारत में विरोधी पार्टी नहीं होना है. 3.5 फीसदी ब्राह्मण की ५ राष्ट्रीय पार्टियां है और सत्ताधारी और विरोधी पार्टियों पर ब्राह्मणों का ही कब्जा है. तिसरा कारण ईवीएम है. क्योंकि ईवीएम से भारत में मुक्त, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव नहीं हो रहे है. ईमानदारी से अगर चुनाव होता है तो देश में एक भी ब्राह्मण ग्राम पंचायत के सदस्य के तौर पर चुनकर नहीं जा सकता. इसलिए वे ईवीएम इस्तेमाल कर बारी-बारी से सत्ता में आते है.


उपरोक्त सभी समस्याओं के विरोध में राष्ट्रव्यापी आंदोलन करने की जरूरत है. इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करना होगा. जब-तक ऐसा नहीं किया जायेगा तब-तक जन आंदोलन नहीं हो सकता और जब-तक आंदोलन नहीं हो सकता तब-तक हमारे किसी भी मौलिक समस्या का समाधान नहीं हो सकता. इसलिए अब लोगों को जनआंदोलन की दिशा में आगे बढ़ना होगा.


देश, देश के जनता, देश के संविधान, और संवैधानिक और मौलिक अधिकारों को बचाने के लिए सभी  बहुजन समाज के सभी बुद्धिजीवी और संगठन चलाने वाले लोगों ने अपना इगो छोड़कर आगे आना चाहिए एवं पहल करना चाहिए. क्योंकि हमारे इगो से जादा हमारे समाज की समस्याएं महत्वपूर्ण है. इसलिए सभी मूलनिवासी बहुजन समाज के सभी बुद्धिजीवी और संगठन चलाने वालों को अपना-अपना अजेंडा, झंडा और बैनर लेकर आगे आना चाहिए और मूलनिवासी महापुरुषों के राष्ट्रव्यापी, आंदोलन को पुनर्जीवित करने की सभी को अपील की गई है.
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