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गांधी से सलाह लेने से पहले ही वीडी सावरकर दो बार अंग्रेजों को लिख चुके थे माफीनामा

Published On :    18 Oct 2021   By : MN Staff
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केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा की वीडी सावरकर ने गांधी के कहने पर अंग्रेजों को माफीनामा लिखा था.



नई दिल्ली : केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा की वीडी सावरकर ने गांधी के कहने पर अंग्रेजों को माफीनामा लिखा था. लेकिन सच यह है कि वीडी सावरकर के भाई ने गांधी से सलाह 1920 में मांगी थी. इससे पहले ही सावरकर दो बार अंग्रेजों से अपनी रिहाई के लिए दो बार माफीनामा लिख चुके थे. जब गांधी भारत में थे ही नहीं.


विक्रम संपत की किताब Echoes from a Forgotten Past 1883-1924 में दर्ज ब्योरा के अनुसार, महात्मा गांधी को पहली चिट्ठी 1920 में लिखी गई जबकि अंग्रेजों को पहली दया याचिका दी गई 1911 में. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 13 मार्च 1910 को नासिक के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट एएमटी जैक्सन की हत्या के मामले में अरेस्ट किया गया था. 4 जुलाई 1911 में उन्हें अंडमान निकोबार स्थित सेलुलर जेल भेज दिया था.


आरोप था कि जैक्सन को मारने के लिए जिस हथियार का इस्तेमाल किया गया था उसका इंतजाम सावरकर ने ही किया था. सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश सावरकर रिवॉल्यूशनरी ग्रुप मित्र मेला के संस्थापक थे. अभी इसे अभिनव भारत के नाम से जानते हैं. यह भूमिगत होकर काम करता था. जैक्सन की हत्या में इस ग्रुप का नाम सामने आया था.


सावरकर ने अपनी पहली दया याचिका 1911 में दाखिल की थी. ब्रिटिश सरकार के प्रोटोकॉल के तहत सभी राजनीतिक कैदियों को अपनी रिहाई के लिए दया याचिका दाखिल करनी होती थी. बताया जाता है कि अन्य कैदियों के साथ सावरकर ने भी जेल अधिकारियों के पास दया याचिका दाखिल की थी. 



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उनकी याचिका 30 अगस्त 1911 को जेल प्रशासन ने रिसीव की थी. हालांकि, इसकी कोई प्रति फिलहाल उपलब्ध नहीं है. ‘जेल हिस्ट्री टिकट’में ही इसका केवल संदर्भ उपलब्ध है. जब यह याचिका दाखिल की गई तब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे. सावरकर ने दूसरी दया याचिका 14 नवंबर 1913 को दाखिल की थी. उस समय भी गांधी जी विदेश में थे. उनका भारत आगमन 1914 में हुआ था. साल 1920 में वीडी सावरकर के छोटे भाई नारायण सावरकर को गांधी ने सलाह दी थी कि वह एक दया याचिका दाखिल करके अंग्रेजों से गुहार लगाए.


दरअसल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू अपने एक लेख में लिखते हैं, सावरकर केवल 1910 तक राष्ट्रवादी रहे. ये वो समय था जब वे गिरफ्तार किए गए थे और उन्हें उम्र कैद की सज़ा हुई. जेल में करीब दस साल गुजरने के बाद, ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके सामने सहयोगी बन जाने का प्रस्ताव रखा जिसे सावरकर ने स्वीकार कर लिया. जेल से बाहर आने के बाद सावरकर हिंदू सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का काम करने लगे और एक ब्रिटिश एजेंट बन गए. क्या सावरकर सम्मान के लायक हैं और उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहा जाना चाहिए? सावरकर के बारे में वीर जैसी बात क्यों? वह तो 1910 के बाद ब्रिटिश एजेंट हो गए थे.


गांधी हत्या में सावरकर का भी नाम आया था. हालांकि, उनके खिलाफ़ यह आरोप साबित नहीं हो सका और वे बरी हो गए. 1910-11 तक वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे. पकडे जाने पर 1911 में उन्हें अंडमान की जेल में डाल दिया गया. उन्हें 50 वर्षों की सज़ा हुई थी, लेकिन सज़ा शुरू होने के कुछ महीनों में ही उन्होंने अंग्रेज़ सरकार के समक्ष माफी के लिए याचिका डाली कि उन्हें रिहा कर दिया जाए.


इसके बाद उन्होंने कई याचिकाएं लगाईं. अपनी याचिका में उन्होंने अंग्रेज़ों से यह वादा किया कि ‘यदि मुझे छोड़ दिया जाए तो मैं भारत के स्वतंत्रता संग्राम से ख़ुद को अलग कर लूंगा और ब्रिट्रिश सरकार के प्रति अपनी वफ़ादारी निभाउंगा. अंडमान जेल से छूटने के बाद उन्होंने यह वादा निभाया भी और कभी किसी क्रांतिकारी गतिविधि में न शामिल हुए, न पकड़े गए.


सावरकर ने 1913 में एक याचिका दाख़लि की जिसमें उन्होंने लिखा, हुजूर, मैं आपको फिर से याद दिलाना चाहता हूं कि आप दयालुता दिखाते हुए सज़ा माफ़ी की मेरी 1911 में भेजी गई याचिका पर पुनर्विचार करें. अपनी याचिका में सावरकर लिखते हैं, अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा.

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