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साल 2020 में यूएपीए के तहत 1,321 लोगों को गिरफ़्तार किया गयाः केंद्र की संसद में जानकारी

Published On :    4 Dec 2021   By : MN Staff
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विरोधी आवाज के दबाने के लिए यूएपीए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है, ऐसा आरोप विपक्ष के नेता केंद्र सरकार पर लगा चुके है.



नई दिल्ली : विरोधी आवाज के दबाने के लिए यूएपीए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है, ऐसा आरोप विपक्ष के नेता केंद्र सरकार पर लगा चुके है. इस बीच गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक सवाल के लिखित जवाब में संसद को बताया कि साल 2020 में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत 1,321 लोगों को और 2019 में इस कानून के तहत 1,948 लोगों को गिरफ्तार किया गया था.


नित्यानंद राय ने बताया कि 2020 में यूएपीए के तहत सबसे ज्यादा 361 गिरफ्तारियां उत्तर प्रदेश में हुई हैं. इसके बाद जम्मू कश्मीर में 346 और मणिपुर में 225 लोग इस कानून के तहत गिरफ्तार हुए हुए. अब तक सिर्फ 3 फीसदी ही दोषी पाए गए. एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 2019 की तुलना में साल 2020 में इस अधिनियम के तहत हुई गिरफ्तारियों में कमी आई है. साल 2019 में यूएपीए के तहत जहां देश भर में 1948 गिरफ्तारियां हुई थीं वहीं साल 2020 में यह संख्या 1321 रही.


एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि साल 2016 से लेकर अब तक यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए कुल 7243 लोगों में से 212 लोग ही दोषी ठहराए गए हैं. 286 लोगों को कोई आरोप न मिलने के कारण छोड़ दिया गया जबकि 42 मामलों में कोर्ट ने कोई आरोप न मिलने के कारण बरी कर दिया.   आंकड़ों के मुताबिक, यूएपीए के तहत बरी होने वालों की संख्या में 26 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई है. साल 2019 में 92 और 2020 में 116 लोगों को बरी कर दिया गया था.


मालूम हो कि यूएपीए के तहत जमानत पाना बहुत ही मुश्किल होता है और जांच एजेंसी के पास चार्जशीट दाखिल करने के लिए 180 दिन का समय होता है. यूएपीए की धारा 43-डी (5) में यह कहा गया है कि एक अभियुक्त को जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा, यदि न्यायालय केस डायरी के अवलोकन या सीआरपीसी की धारा 173 के तहत बनाई गई रिपोर्ट पर विचार व्यक्त करता है कि यह मानने के लिए उचित आधार है कि इस तरह के व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाना प्रथम दृष्टया सही है.


1967 में लाए गये यूएपीए कानून में 2019 में इसमें संशोधन करके इसे और ज्यादा कठोर कर दिया गया. संशोधन के बाद इस कानून को इतनी ताकत मिल गई कि किसी भी व्यक्ति को जांच के आधार पर आतंकवादी घोषित किया जा सकता है. इस कानून के तहत हुई कई गिरफ्तारियों पर सवाल भी उठे हैं. देश भर में कई मशहूर सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी इस कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है जिनमें कई लोग अभी भी जेल की सलाखों के भीतर हैं.


यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं कि यह बेहद संवेदनशील कानून है. इसका इस्तेमाल सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए. वो कहते हैं, इस कानून का किसी भी तरह का दुरुपयोग बेहद गंभीर परिणाम दे सकता है. इसके तहत किसी को भी गिरफ्तार करने के लिए एक अनिवार्य कारण होना चाहिए और इसका इस्तेमाल बहुत ही जरूरी परिस्थिति में ही किया जाना चाहिए. यूपी में इस कानून के तहत दर्ज मुकदमों और गिरफ्तारियों पर कई अन्य पुलिस अधिकारी भी चिंता जता चुके हैं. विपक्षी दल और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों का आरोप है कि सरकार असहमति के स्वरों को दबाने के लिए इस कानून का बेजा इस्तेमाल कर रही है.


यूपी में एक और रिटायर्ड आईपीएस वीएन राय कहते हैं कि ऐसे कड़े कानूनों का नियमित आधार पर इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. उनके मुताबिक, जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ये कानून बनाए गए हैं, वैसे ही मामलों में इनका प्रयोग भी होना चाहिए. हर अपराध देशद्रोह और आतंकवाद से नहीं जुड़ा रहता. इससे जांच एजेंसियों पर भी अनावश्यक बोझ आता है और अदालतों पर भी. दूसरी बात, इससे कानून के दुरुपयोग की भी आशंका बनी रहती है. जहां तक यूपी का सवाल है तो यूएपीए के तहत पिछले साढ़े चार साल में इतने मामले दर्ज हुए लेकिन कानून व्यवस्था में तो कोई खास सुधार हुआ नहीं.

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