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नौकरी के लिए तरसते नौजवानः कितना ग़हरा है भारत का बेरोज़गारी संकट, अर्थशास्त्रियों की राय

Published On :    10 Jan 2022   By : MN Staff
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पिछले सप्ताह मध्य प्रदेश में कम योग्यता वाले 15 सरकारी पदों पर नौकरी के लिए दस हज़ार से अधिक उम्मीदवार साक्षात्कार देने पहुंच गए.



नई दिल्ली : पिछले सप्ताह मध्य प्रदेश में कम योग्यता वाले 15 सरकारी पदों पर नौकरी के लिए दस हज़ार से अधिक उम्मीदवार साक्षात्कार देने पहुंच गए. इनमें से अधिकतर ऐसे थे जो नौकरी की ज़रूरत से ज़्यादा योग्य थे. एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इनमें इंजीनियर, एमबीए डिग्रीधारक और जितेंद्र मौर्य जैसे युवा थे जो जज बनने की तैयारी कर रहे हैं. महामारी ने भारत कि अर्थव्यवस्था पर चोट की लेकिन अब अर्थव्यवस्था रफ़्तार पकड़ रही है. फिर भी नौकरियां कम होती जा रही हैं. सीएमआईई के मुताबिक दिसंबर में भारत की बेरोज़गारी दर आठ प्रतिशत तक पहुंच गई थी. 2020 और 2021 के अंतिम महीनों तक ये 7 प्रतिशत से अधिक थी.


विश्व बैंक के पूर्व प्रमुख आर्थिक सलाहकार कौसिक बसु बताते हैं, अब तक भारत में जो आंकड़े देखे गए हैं ये उससे कहीं ज़्यादा है. साल 1991 में जब भारत गंभीर आर्थिक संकट में था तब भी हालात ऐसे नहीं थे. दुनिया के अधिकतर देशों में साल 2020 में बेरोज़गारी बढ़ी है. लेकिन भारत की बेरोज़गारी दर अधिकतर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं से अधिक है. 


सीएमआईई के मुताबिक महामारी के दौरान कंपनियों द्वारा खर्च कम करने के लिए कर्मचारियों की संख्या में कटौती से वेतन वाली नौकरियां भी सिमट रही हैं. अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के एक शोध के मुताबिक 15-23 साल आयु वर्ग के युवा कर्मचारियों सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं. यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री अमित बासोले कहते हैं, हमने पाया कि लगभग आधे ज्यादा लोगों के पास लॉकडाउन से पहले वेतन वाली नौकरी थी उन्हें फिर वो काम नहीं मिल सका.


अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रोज़गार में आई तेज़ गिरावट की वजह महामारी भी है. प्रोफ़ेसर बसु कहते हैं, जैसा कि 2020 के लॉकडाउन में भारत में जो हुआ है वो दर्शाता है कि जो नीतियां बनाई जा रही हैं उनमें छोटे उद्योगों और कर्मचारियों के कल्याण की तरफ़ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है. श्रमिक अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ राधिका कपूर कहती हैं, पढ़े लिखे और अच्छी आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोग ही अपने आप को बेरोज़गार कह सकते हैं ना कि ग़रीब, अकुशल या अर्धकुशल लोग. जितना अधिक पढ़ा लिखा होगा उतनी ही उसके बेरोज़गार होने और कम वेतन वाला काम करने की इच्छा ना होने की संभावना होगी. दूसरी तरफ़ ग़रीब लोग वो किसी भी तरह का काम करने के लिए मजबूर हो जाते हैं. ऐसे में बेरोज़गार लोगों की संख्या से अर्थव्यवस्था में श्रमिकों की सही संख्या का पता नहीं चल पाता.


कपूर कहती हैं, भारत में काम करने वाले अधिकतर लोग कमज़ोर स्थिति में होने से अनिश्चित जीवन बिताते हैं. लोगों का वेतन भी बहुत ज़्यादा नहीं है. सर्वे के मुताबिक भारत में वेतन पाने वाले 45 फ़ीसदी लोगों का महीने का वेतन 9750 रुपए से भी कम है. ये 375 रुपए प्रतिदिन से भी कम है. प्रो. बसु कहते हैं कि भारत की बेरोज़गारी चिंताजनक है क्योंकि जैसे-जैसे देश का विकास शुरू हो रहा है, सबसे निचले तबके में रहने वाले लोगों की हालत दुनिया के अधिकतर देशों के मुक़ाबले और भी ख़राब हो रही है. वो मानते हैं कि सरकार को महंगाई पर नियंत्रण करना होगा, रोज़गार बढ़ाने होंगे और कामकरों की मदद करनी होगी. वो कहते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन में ध्रुवीकरण और नफ़रत की राजनीति बढ़ी है जिसने विश्वास पर चोट पहुंचाई है, जो आर्थिक विकास के लिए सबसे ज़रूरी होता है.


2014 में सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोज़गार देने का वादा किया था. वो कुछ उद्योगों को वित्तीय सहायता दे रहे हैं और भारत में उत्पादन को बढ़ाने मेक इन इंडिया को बढ़ावा दे रहे हैं. हालांकि इनमें से किसी भी प्रयास से अभी तक न उत्पादन बढ़ा है और ना ही रोज़गार के मौके. डॉ. बासोले जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि संघर्ष कर रहे निचले तबके के बीस प्रतिशत परिवारों को राहत देने के लिए कैश ट्रांस्फर या रोज़गार गारंटी जैसी योजनाओं का फ़ायदा दिया जाना चाहिए. इससे ये परिवार अपना ख़र्च चला पाएंगे और क़र्ज़ चुका पाएंगे. ये अल्पकालिक उपाय हो सकता है. जहां तक दीर्घकालिक समाधान का सवाल है सभी श्रमिकों को न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए. डॉ. राधिका कपूर कहती हैं, जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक रोज़गार के मामले में कोई ठोस सुधार नहीं होगा.
 

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