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बाबरी के फैसले पर चुप रहे, ज्ञानवापी को लेकर खामोश नहीं बैठेंगे, मौलाना सहाबुद्दीन की चेतावनी

Published On :    14 May 2022   By : MN Staff
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मौलाना सहाबुद्दीन ने ज्ञानवापी मस्जिद मामले में कोर्ट के आदेश को लेकर कहा कि जानबूझकर इस तरह फिरकापरस्त ताकतें आगे बढ़ा रही हैं. उन्होंने कहा, ‘‘हमने बाबरी मस्जिद को खो दिया, उस वक्त मुसलमानों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खामोशी से मान लिया, लेकिन अब मुसलमान खामोश नहीं रहेगा. अगर ज्ञानवापी मस्जिद पर हमला हुआ और बाबरी मस्जिद की तरह उसको बनाने की कोशिश की गई तो भारत का मुसलमान खामोश नहीं रहेगा और वो फिर जो भी आंदोलन हो सकता है वो चलाने पर मजबूर होगा.



लखनऊ : पूजा स्थल कानून 1991 के अनुसार, 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता. इसके बावजूद बीजेपी नेताओं और ब्राह्मणवादी संगठनाएं वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद, मथूरा की मस्जिद, चारमिनार और अब आगरा के ताजमहल पर अपना दावा जताकर मुस्लिमों के खिलाफ हिंदूओं को खड़ा करने की कोशिश कर रहे है. इस कड़ी में अब ज्ञानवापी मस्जिद मामले को लेकर आला हजरत के प्रचारक मौलाना शाहबुद्दीन रिजवी ने चेतावनी दी है. उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद के फैसले पर मुसलमान चुप रहे, लेकिन ज्ञानवापी को लेकर अब मुसलमान चुप नहीं बैठेगा. उन्होंने चेताते हुए कहा कि अगर दूसरी मस्जिद पर हमला हुआ तो मुसलमान चुप नहीं बैठेगा. इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ताजमहल का मुद्दा उठाना ठीक नहीं है.


मौलाना सहाबुद्दीन ने ज्ञानवापी मस्जिद मामले में कोर्ट के आदेश को लेकर कहा कि जानबूझकर इस तरह फिरकापरस्त ताकतें आगे बढ़ा रही हैं. उन्होंने कहा, ‘‘हमने बाबरी मस्जिद को खो दिया, उस वक्त मुसलमानों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खामोशी से मान लिया, लेकिन अब मुसलमान खामोश नहीं रहेगा. अगर ज्ञानवापी मस्जिद पर हमला हुआ और बाबरी मस्जिद की तरह उसको बनाने की कोशिश की गई तो भारत का 
मुसलमान खामोश नहीं रहेगा और वो फिर जो भी आंदोलन हो सकता है वो चलाने पर मजबूर होगा.


ताजमहल को लेकर उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया जानती है उसे शाहजहां ने बनवाया है. उन्होंने कहा कि अपनी बेगम मुमताज महल के नाम से उनकी मोहब्बत में यादगार के तौर पर बनवाया था. ये जमीन भी उनकी थी और इसकी देख-रेख एक अर्से से सुन्नी सेंट्रल बोर्ड, लखनऊ करता रहा है. ऐसी स्थिति में ताजमहल का मुद्दा उठाना ठीक नहीं है, लेकिन उस पर हाईकोर्ट के जजों ने बेहतरीन फैसला देते हुए उन्हें खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि ये नकारात्मक सोच रखने वाले लोग हर रोज कोई न कोई मसला उठाते हैं, जिनसे हिंदू-मुस्लिम नफरतों को बढ़ावा मिलता है, ऐसे लोगों पर लगाम लगाई जानी चाहिए.


बता दें कि 1991 में बनाया पूजा स्थल कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता. अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है. अयोध्या का मामला उस वक्त कोर्ट में था इसलिए उसे इस कानून से अलग रखा गया था. अयोध्या का फैसला आने के बाद काशी और मथुरा सहित देशभर के करीब 100 पूजा स्थलों पर मंदिर की जमीन होने को लेकर दावे किए जा रहे है. 1991 के कानून के चलते दावा करने वाले कोर्ट नहीं जा सकते. फिर भी कोर्ट जा रहे है.


यही नहीं तो राम मंदिर बाबरी मस्जिद फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी देश के तमाम विवादित धर्मस्थलों पर भी अपना रुख स्पष्ट करते हुए फैसला दिया कि 1991 को लागू हुए प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप एक्ट, 1991 काशी और मथुरा में जो मौजूदा स्थिति है वही बनी रहेगी उसमें किसी भी तरह के बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है.


चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले पाच जजों कि पीठ ने अपने फैसले में देश के सेक्युलर चरित्र की बात की थी. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 1991 का यह कानून देश में संविधान के मूल्यों को मजबूत करता है. इसके अलावा पीठ ने देश की आजादी के दौरान मौजूद धार्मिक स्थलों के जस के तस संरक्षण पर भी जोर दिया था. बेंच ने कहा, ‘‘देश ने इस एक्ट को लागू करके संवैधानिक प्रतिबद्धता को मजबूत करने और सभी धर्मों को समान मानने और सेक्युलरिज्म को बनाए रखने की पहल की है. इसके बावजूद ब्राह्मणवादी संगठनाए मुस्लिम धर्म स्थलों को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही हैं जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अवमान है.

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