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कर्नाटक में राज्यपाल की मंजूरी के बाद ‘धर्मांतरण विरोधी’ कानून लागू, गृहमंत्री बोले- सख्ती से लागू होगा कानून

Published On :    18 May 2022   By : MN Staff
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धर्मांतरण विरोधी कानून में जबरन धर्म परिवर्तन को दंडात्मक बनाया गया है. इसके तहत धर्म परिवर्तन से दो महीने पूर्व जिलाधिकारी के समक्ष एक आवेदन दायर करना होगा. कानून के अनुसार जो व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है उसके मूल धर्म और आरक्षण से जुड़ी तमाम सुविधाओं और लाभों को वापस ले लिया जाएगा. लेकिन, व्यक्ति का जिस धर्म में धर्मांतरण होगा उस धर्म का लाभ मिलेगा. यह अध्यादेश जबरन, धोखाधड़ी या शादी का लालच देकर धर्मांतरण पर रोक लगाता है.



बंगलुरू : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत हर किसी को अपने धर्म का प्रचार, प्रसार और धर्मांतरण करने का अधिकार दिया गया है. लेकिन भाजपा शासित राज्य जबरन या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण का हवाला देकर धर्म के प्रचार, प्रसार और धर्मांतरण पर रोक लगाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे है. अब कर्नाटक में राज्यपाल की मंजूरी के बाद धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू हो गया है. 


साथ ही अध्यादेश लागू होने की अधिसूचना भी जारी कर दी गई. अध्यादेश को विधेयक के तौर पर छह महीने में विधानमंडल से पारित होना आवश्यक है. राज्य सरकार के सामने अब इस अध्यादेश को विधान परिषद से पारित कराने की चुनौती है. सरकार विधानमंडल के अगले सत्र में इसे विधान परिषद में पेश करेगी जहां वह बहुमत से सिर्फ एक मत पीछे है.


गौरतलब है कि विधानमंडल से धर्मांतरण विरोधी विधेयक को पारित करवाने में मुश्किल आई तो कर्नाटक की भाजपा सरकार ने इस कानून को लागू करने के लिए अध्यादेश का रास्ता चुना. योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने इस कानून को सबसे पहले लागू करने की पहल की थी. कर्नाटक इसे लागू करने वाला नौवां राज्य हैं. 


प्रस्तावित ‘धर्मांतरण-रोधी कानून’ को सख्ती से लागू करने के कर्नाटक सरकार के वादे को दोहराते हुए राज्य के गृह मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र ने मंगलवार को कहा कि यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, लेकिन जबरन या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण की कानून में कोई जगह नहीं है. ईसाई समुदाय की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश करते हुए मंत्री ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित कानून में ऐसा कुछ नहीं है जो धार्मिक अधिकार प्रदान करने वाले संवैधानिक प्रावधानों में कटौती करता हो.


धर्मांतरण रोधी कानून का विरोध करते हुए एक ज्ञापन के साथ ईसाई समुदाय के नेताओं के सोमवार को राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मिले. बेंगलुरु के आर्चबिशप पीटर मैचडो ने ज्ञापन में राज्यपाल से धार्मिक स्वतंत्रता संरक्षण अध्यादेश को मंजूरी नहीं देने की अपील की है. वहीं ज्ञानेंद्र ने कहा, ‘‘अध्यादेश को मंजूरी मिल जाने पर इसे प्रभावी तरीके से लागू किया जाएगा.’’


धर्मांतरण विरोधी कानून में जबरन धर्म परिवर्तन को दंडात्मक बनाया गया है. इसके तहत धर्म परिवर्तन से दो महीने पूर्व जिलाधिकारी के समक्ष एक आवेदन दायर करना होगा. कानून के अनुसार जो व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है उसके मूल धर्म और आरक्षण से जुड़ी तमाम सुविधाओं और लाभों को वापस ले लिया जाएगा. लेकिन, व्यक्ति का जिस धर्म में धर्मांतरण होगा उस धर्म का लाभ मिलेगा. यह अध्यादेश जबरन, धोखाधड़ी या शादी का लालच देकर धर्मांतरण पर रोक लगाता है.


कानून के तहत जबरन धर्म परिवर्तन के लिए 10 साल तक के कैद का प्रावधान है. नाबालिग, महिलाओं के संबंध में प्रावधानों के उल्लंघन पर तीन से पांच साल के कैद के साथ 25 हजार रुपए जुर्माना और एससी/एसटी के संबंध में प्रावधानों के उल्लंघन पर तीन से दस साल तक कैद के साथ 50 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है. धर्म परिवर्तन कराने पर अभियुक्तों को मुआवजे के तौर पर पांच लाख रुपए तक के भुगतान का प्रस्ताव है. सामूहिक धर्मांतरण के संबंध में विधेयक में 3-10 साल की जेल और एक लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है.

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