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बामसेफ संगठन में तोड़फोड़ करने वाले गद्दारों के भ्रष्ट चरीत्र से समाज को जागृत करने के राष्ट्रीय अभियान

Published On :    4 Aug 2022   By : MN Staff
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बामसेफ संगठन में तोड़फोड़ करने वाले गद्दारों के भ्रष्ट चरीत्र के बारे में समाज को जागृत कर सतर्क करने के राष्ट्रीय अभियान के अंतर्गत हमने इससे पहले गद्दार लालन (वी.एल.मातंग), गद्दार कमलाकांत काले और गद्दार दिलीप राम उर्फ दिलीप अम्बेडकर के बारे में जानकारी दी है. आज के इस लेख में गद्दार मावजी भाई राठौड़ के काले कारनामों के बारे में हम बताने जा रहे है.



बामसेफ संगठन में तोड़फोड़ करने वाले गद्दारों के भ्रष्ट चरीत्र के बारे में समाज को जागृत कर सतर्क करने के राष्ट्रीय अभियान के अंतर्गत हमने इससे पहले गद्दार लालन (वी.एल.मातंग), गद्दार कमलाकांत काले और गद्दार दिलीप राम उर्फ दिलीप अम्बेडकर के बारे में जानकारी दी है. आज के इस लेख में गद्दार मावजी भाई राठौड़ के काले कारनामों के बारे में हम बताने जा रहे है.


गद्दार मावजी राठोड बामसेफ से पहले दलित पैंथर में काम करते थे. बामसेफ में आने के बाद भी उसके दिमाग से दलित पैंथर के अवशेष बचे थे और वह उसी तरीके से काम करता था. मावजी पर भ्रष्टाचार के आरोप आज के नहीं बल्कि आज से दस साल पहले 2012 में ही मुम्बई के कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने उन पर पैसे के हेराफेरी के आरोप लगाये थे. 


उसमें कार्यक्रमों के खर्चे का हिसाब न देना, मनमानी तरीके से पैसों का व्यवहार करना, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को और यहां तक की राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को भी उसकी जानकारी न देना जैसे गंभीर आरोप थे. उन आरोपों की जांच करने के लिए संगठन ने पूरे विश्वास के साथ वी.एल.मातंग की जिम्मेदारी लगाई थी. लालन से निष्पक्ष जांच की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन लालन प्रांतवादी बना और मावजी के खिलाफ झूठी जांच रिपोर्ट तैयार कर वह बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम को सौंप दी. इससे मावजी निर्दोष निकल गया और कुछ कार्यकर्ता उसके शिकार हुए.  


बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मावजी पर पुनः विश्वास दिखाते हुए राष्ट्रीय मूलनिवासी बहुजन कर्मचारी संघ (आरएमबीकेएस) का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया और फिर एक बार मावजी को राष्ट्रीय स्तर पर संगठन का कोष सम्भालने कि जिम्मेदारी दी गई. परंतु इतना विश्वास करने के बाद भी मावजी ने समाज, संगठन और राष्ट्रीय अध्यक्ष की पीठ में छुरा घौंपने का ही काम किया. 


मावजी भाई ने आरएमबीकेएस का चार साल यानी 2016 से 2019 तक पैसों का ऑडिट ही नहीं किया. चार साल तक ऑडिट न करने का काम इसलिए नहीं किया गया, क्योंकि अगर ऑडिट होता तो मावजी का सारा आर्थिक भ्रष्टाचार पकड़ में आता. संगठन का आर्थिक ऑडिट सीए के द्वारा किया जाता है और फिर उसे लेबर डिपार्टमेंट को सुपुर्द किया जाता है. इससे बचने के लिए और अपने काले कारनामों को छुपाने के लिए  मावजी ने आरएमबीकेएस का ऑडिट ही नहीं किया. जब की जिम्मेदारी उसी की थी.


जब ये बातें बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के संज्ञान आने पर उन्होंने मावजी राठोड़ को उस जिम्मेदारी से मुक्त कर के.डि.गोहील कि जिम्मेदारी लगाई. लेकिन मावजी की बदमाशी इतनी की उसने के.डि.गोहिल को आरएमबीकेएस  के कोष की सारी डिटेल हैंड-ओवर ही नहीं की. इससे भी पता चलता है कि मावजी का आचरण भ्रष्ट रहा है. साल 2020 के लॉकडाउन में के.डि.गोहिल ने उन्हें मदद करने की बात कही. इस पर मावजी राठोड़ ने कहा की मै अकेले ही इसे करता हूं. वैसे के.डी.गोहील मावजी राठोड़ के सबसे पुराने दोस्तों में से एक थे. उनकी दोस्ती 42 साल की थी. अपने इतने पुराने दोस्त को भी मावजी ने अपने भ्रष्ट आचरण की जानकारी न हो, इसके लिए मावजी ने गोहिल को पदभार संभालने नहीं दिया.


मावजी के भ्रष्टाचार की कहानी यही समाप्त नहीं होती. संगठन ने साल 2013 में एक फोर वीलर गाड़ी खरीदी थी. वह गाड़ी मावजी ने अपने नाम पर खरीदी थी और उस गाड़ी पर आज भी मावजी कब्जा जमाए बैठा है. जिसका सारा पैसा कार्यकर्ताओं द्वारा निधि के रुप में जमा किया गया था और उसका इंस्टॉलमेंट भी संगठन के खाते से ही भरा जाता था. संगठन की उस गाड़ी को मावजी ने अपने कब्जे में रखा है. 


आज भी वह लाल रंग की ईको गाड़ी मावजी के घर के सामने खड़ी है. बामसेफ विरोधी लोग ये प्रचार करते है कि वामन मेश्राम के नाम पर भी तो कई सारी गाड़ियां है. बामसेफ संगठन की ज्यादा तर गाड़ियां दिल्ली से खरीदी गई है. दिल्ली में संगठन के नाम से गाड़ी लेने पर एक से सव्वा लाख रुपया ज्यादा देना पडता है और वही व्यक्तिगत किसी नाम से लेने पर वही एक से सव्वा लाख रुपया बच जाता है.


अगर किसी व्यक्ति के नाम से गाड़ी लेने पर हर गाड़ी के पीछे संगठन का एक से सव्वा लाख रुपया बचता है तो संगठन का नुकसान क्यों करना? इस सोच से संगठन की ज्यादा तर गाड़ियां वामन मेश्राम के नाम से ही ली गई है. इसमें एक बात गौर करने वाली है कि जो चल-अचल सम्पत्ति वामन मेश्राम के नाम से है वह सारी संपत्ति आज संगठन के पास है. जैसे गाड़ियां. गाड़ियों के सारे कागजाद आज संगठन के पास है और जिन गद्दारों ने समाज और संगठन से गद्दारी की उन लोगों ने समाज व संगठन की सम्पत्ति को अपने कब्जे में रखा है, वह संगठन के पास नहीं है. इसके लिए मावजी राठोड़ के विरोध में क्रिमिनल केस बनता है और उसकी सजा में मावजी जेल भी जा सकता है.


इतना ही नहीं सुरेश पाटील की पत्नी सुमिता पाटील को गोवा में ‘ट्रीप’ के लिए पैसा भी इसी मावजी राठोड़ ने दिया था. इसकी भी जानकारी हमारे पास उपलब्ध हुई है. संगठन ने सुरेश पाटील और सुमिता पाटिल को गोवा की जिम्मेदारी दी थी. उनका काम था की वहां जाकर मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों को जोड़ना और संगठन का विस्तार करना, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और वे वहां केवल पिकनिक करने जाते थे, जिसके लिए मावजी राठोड़ उन्हें पैसा दिया करता था.


इसके अलावा ये भी जानकारी हमें मिली है कि एन.बी.कुरणे, सुरेश पाटील और मावजी राठोड़ ने आरएमबीकेएस के नाम का गलत इस्तेमाल करके कई कम्पनियों के साथ ‘डिलिंग’ किया है. जिसमें से एक कम्पनी से 16 लाख रुपये लिये है और उसे संगठन के पास जमा तक नहीं किया है. इससे पता चलता है कि इन लोगों ने अलग-अलग कम्पनियों के साथ ‘सेटलमेंट’ करके अब तक लाखों-करोड़ों रुपया खाया है. ऐसे ही मुम्बई के एक डाक्टर कार्यकर्ता के भाई से मावजी राठोड़ ने बामसेफ के 2020 में होने जा रहे राष्ट्रीय अधिवेशन के नाम से 50 हजार रुपयों का निधी लिया, मगर उन्हें उसकी रसीद तक नहीं दी. बिना रसीद के पैसे लेने का मतलब है कि उन पैसों को संगठन के पास जमा न करना और उसे डकार जाना.


मावजी राठोड़ के बारे में एक बात नोटिस करने वाली ये थी कि उनके पास हमेशा 5-6 हजार रुपया कैश होता था. यह रकम उनको मिलने वाले पेंशन से कई ज्यादा थी. मावजी राठोड़ मुम्बई महानगरपालिका में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के रुप में रिटायर्ड हुआ था. इसलिए उसकी पेंशन 15-20 हजार रुपये तक हो सकती है. जब इनकम सोर्स ही इतना नहीं था तो हर रोज 5-6 हजार रुपयों का कैश कहां से आता था? और ऐसा भी नहीं था कि हर रोज संगठन का इतने पैसों का कुछ काम वह करता था. मुम्बई के ही कार्यकर्ताओं द्वारा ये जानकारी मिली है कि मावजी कुछ कार्यकर्ताओं को नॉन-वेज खाना खिलाने अच्छे-अच्छे होटलों में लेकर जाता था और वहां संगठन का पैसा उड़ा देता था.


इसमें उन कार्यकर्ताओं को लगता था की मावजी अपने खुद के पैसे से ये सब कर रहा है, मगर अभी उन कार्यकर्ताओं को भी समझ में आ रहा है कि वह तो सारा संगठन के पैसों का गलत इस्तेमाल करता था. मावजी के पास पैसों का कोई लिखित हिसाब नहीं होता था. जब कि संगठन ने उसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी थी कि उसे हर एक पैसे का हिसाब रखना चाहिए था, मगर वह ऐसा नहीं करता था. जहां खर्च करना उचित नहीं है वहां पर भी मावजी राठोड़ पैसा खर्च कर देता था और कार्यकर्ताओं के पूछने पर खर्चे का हिसाब नहीं देता था.


बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष उससे हर रोज बैंक में जमा रकम और कैश इन हैंड के बारे में पूछते थे. बैंक में जमा रकम के बारे में तो वह उसी वक्त उसके साथ रहने वाले वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के सामने नहीं बताता था, जब की उसी के मोबाइल में बैंक का मैसेज होता था. उन्हें वह कहता था की घर जाकर बताता हूं. दुसरी बात कैश इन हैंड के बारे में हर रोज एक ही आंकड़ा बोल देता था कि अभी 5 हजार रुपये है. हर रोज एक ही आंकड़ा कैसे हो सकता है. कभी 4 हजार भी हो सकते है, कभी 6 हजार भी तो हो सकते है, मगर वह बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष को गलत जानकारी देने का काम करता था.


इसके अलावा और किसी को कैश दिया है तो उसके एडवांस वाउचर तक नहीं बनाता था, बल्कि बिल के आधार पर वाउचर बनाता था और वह बिल सही है या गलत यह भी वेरीफाई नहीं करता था. इससे भी प्रमाणित होता है कि मावजी के पास किसी प्रकार का कोई लिखित हिसाब नहीं होता था. वह तो समाज और संगठन का पैसा अपने मन से ही खर्च कर देता था और संगठन को गलत जानकारी देने का काम करता था. इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हो सकता है कि बामसेफ संगठन मावजी राठोड़ के खिलाफ कानुनी कारवाई करेगा और इसके लिए मावजी को जेल में भी जाना पड़ सकता है.


राष्ट्रीय मूलनिवासी बहुजन कर्मचारी संघ की की कई शाखाएं आज देश भर की कई कम्पनियों में कार्यरत है. वहां पर संगठन की जाल बना हुआ है, मगर केवल इससे काम नहीं होता. जहां पर RMBKS के सदस्यों कि संख्या बहुसंख्य होती है, वहां पर पिछले वर्ष के ऑडिट की कॉपी देनी होती है, तब जाकर वहां का युनिट मान्यता प्राप्त होता है और वह और मजबुती से कामगारों की समस्याओं का समाधान करने के लिए लड़ाई लड़ सकता है. लेकीन मावजी राठोड़ ने 2016 से 2019 तक ऑडिट न करने की वजह से किसी भी कम्पनी में बहुसंख्य होने के बावजुद भी RMBKS की एक भी शाखा मान्यता प्राप्त संगठन नहीं बन पाया. जिसकी वजह से कुछ जगहों पर कामगारों के अधिकार की लड़ाई लड़ने में RMBKS को समस्याओम का सामना करना पड़ा और वहां के कामगारों का नुकसान हुआ. इलके लिए केवल मात्र एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है और नह मावजी राठोड. उसके आर्थिक भ्रष्टाचार का एक और उदाहरण सामने आया है मुम्बई के ही एक कार्यकर्ता ने समाज से इकठ्ठा किए लगभग 12 हजार रुपये की नगद राशि मावजी राठोड के पास जमा कर दी. बदले में मावजी राठोड ने उस कार्यकर्ता को उसकी रसीद देनी चाहिए थी, मगर मावजी उसकी बात को टालता रहा और आज तक उस कार्यकर्ता को रसीद नहीं मिली. रसीद ना देने का मतलब है की मावजी राठोड ने वह पैसा संगठन के पास जमा नहीं किया और उसे खा गया. 


मावजी राठोड़ का केवल आर्थिक भ्रष्टाचार का मामला नहीं था, बल्कि वह तो संगठन के राष्ट्रीय नेतृत्व के विरोध में कार्यकर्ताओं को भ्रमित करने का काम कर रहा था. वह काम उसने 2020 के लॉकडाउन के समय से ही शुरु कर दिया था. जब वामन मेश्राम केंद्र सरकार के विरोध में, उनकी नीतियों के विरोध में आंदोलन कर रहे थे. कार्यकर्ताओं के साथ ब्राह्मणों के हर सवाल के जवाब देने का काम कर रहे थे. तब मावजी राठोड़ और उसके साथी सुरेश पाटील, एन.बी.कुरणे व अन्य गद्दार लोग संगठन विरोधी कारवाई  कर रहे थे. 


सरकार ने लगाई हुई पाबंदी के बावजूद भी वामन मेश्राम ने ही साकेत बचाओ आंदोलन हो या तीन कृषी कानूनों का विरोध करने का काम किया. उनके अलावा मुलनिवासी बहुजन समाज का कोई नेता ब्राह्मणवादियों से लड़ाई लड़ने के लिए सामने नहीं आया था. और उन्हीं के विरोध में छुपे तरीके से इसी गद्दार मावजी राठोड़ ने काम किया था. इसके भ्रष्ट आचरण और संगठन विरोधी गतिविधियों की जानकारी सभी लोगों को होनी चाहिए और सभी इन जैसे गद्दारों से सतर्क होने चाहिए इसके लिए यह लेख लिखा गया है. गद्दारों से सावधान रहे, सतर्क रहे. 

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