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सीएम हेमंत सोरेन बोले- महाजनों से लिया गया कर्ज वापस नहीं करेंगे आदिवासी, वसूली की तो होगी कार्रवाई

Published On :    10 Aug 2022   By : MN Staff
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महाजनों से लिया गया कर्ज अब आदिवासियों को वापस नहीं करना होगा. अगर महाजनों ने उसकी वसूली की तो उन पर कार्रवाई की जाएगी. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यह बात रांची में विश्व आदिवासी दिवस के कार्यक्रम जनजातीय महोत्सव में कही.



रांची : महाजनों से लिया गया कर्ज अब आदिवासियों को वापस नहीं करना होगा. अगर महाजनों ने उसकी वसूली की तो उन पर कार्रवाई की जाएगी. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यह बात रांची में विश्व आदिवासी दिवस के कार्यक्रम जनजातीय महोत्सव में कही. इस मौके पर उन्होंने केंद्र सरकार से विश्व आदिवासी दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग की. राजधानी के मोरहाबादी मैदान में आयोजित दो दिवसीय समारोह का उद्घाटन राज्यसभा सांसद शिबू सोरेन और सीएम हेमंत सोरेन ने मंगलवार को किया. मौके पर सीएम हेमंत सोरेन ने आदिवासी समाज के लिए कई घोषणाएं की.


मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी परिवार में किसी की भी शादी के अवसर पर एवं मृत्यु होने पर उन्हें 100 किलोग्राम चावल तथा 10 किलो दाल दिया जाएगा. इससे सामूहिक भोज के लिए अब उन्हें कर्ज नहीं लेना पड़ेगा. मेरी अपील होगी कि सामूहिक भोज करने के लिए कर्ज लेने से बचें. कर्ज लेना भी हो तो बैंक से लें. महाजनों से महंगे ब्याज पर लिया गया कर्ज अब आपको वापस नहीं करना है. इसकी शिकायत मिलने पर महाजन पर कार्रवाई होगी.


इस अवसर पर सीएम ने कहा कि जिस जंगल-जमीन की उसने रक्षा की आज उसे छीनने का बहुत तेज प्रयास हो रहा है. जानवर बचाओ, जंगल बचाओ सब बोलते हैं पर आदिवासी बचाओ कोई नहीं बोलता. अरे आदिवासी बचाओ जंगल जीव -जंतु सब बच जाएगा. भाजपा पर कटाक्ष करते हुए हेमंत सोरेन ने कहा कि कुछ लोगों को तो आदिवासी शब्द से भी चिढ़ है. वे हमें वनवासी कह कर पुकारना चाहते हैं. आज देश का आदिवासी समाज बिखरा हुआ है. हमें जाति-धर्म क्षेत्र के आधार पर बांट कर बताया जाता है. हमें अपने आप को पहचानने की जरूरत है.


सीएम ने कहा कि वन अधिकार के जो पट्टे खारिज किये गये थे, उसका फिर से रिव्यू होगा और तीन महीने में इसे पूरा किया जायेगा. समारोह को संबोधित करते हुए राज्यसभा सांसद शिबू सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है कि हमारी हर चीज आम जन तक चलती रहे. आदिवासी समाज के लोग अपनी भाषा और सामाजिक नीति-नियम के साथ आगे बढ़ रहे हैं. इसके लिए जरूरी है कि सामाजिक चेतना बनी रहे और लोगों तक आदिवासी विकास की मूल भाषा और भावना पहुंचती रहे. आदिवासी समाज के उत्थान के लिए इस कार्यक्रम की शुरुआत की गयी है और लोगों तक यह बात पहुंचे, इसके लिए आप सभी लोगों को एकजुट होकर काम करना है.


मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि हम आदिवासियों की लम्बे संघर्ष एवं कुर्बानियों की कहानी है. मेरे लिए मेरी आदिवासी पहचान सबसे महत्वपूर्ण है, यही मेरी सच्चाई है. आज हम एक ढंग से अपने समाज के पंचायत में खड़े होकर बोल रहे हैं. यह सच है कि संविधान के माध्यम से अनेकों प्रावधान किये गए हैं जिससे कि आदिवासी समाज के जीवन स्तर में बदलाव आ सके. परन्तु, बाद के नीति निर्माताओं की बेरुखी का नतीजा है कि आज भी देश का सबसे गरीब, अशिक्षित, प्रताड़ित, विस्थापित एवं शोषित वर्ग आदिवासी वर्ग है. आज आदिवासी समाज के समक्ष अपनी पहचान को लेकर संकट खड़ा हो गया है.


सीएम ने कहा क्या यह दुर्भाग्य नहीं है कि जिस अलग भाषा संस्कृति-धर्म के कारण हमें आदिवासी माना गया उसी विविधता को आज के नीति निर्माता मानने के लिए तैयार नहीं है? संवैधानिक प्रावधान सिर्फ चर्चा का विषय बन के रह गये हैं. विभिन्न जनजातीय भाषा बोलने वालों के पास न तो संख्या बल और न ही धन बल. उदाहरण के लिए हिन्दू संस्कृति के लिए असुर हम आदिवासी ही हैं. जिसके बारे में बहुसंख्यक संस्कृति में घृणा का भाव लिखा गया है, मूर्तियों के माध्यम से द्वेष दर्शाया गया है, आखिर उसका बचाव कैसे होगा इस पर हमें सोचना होगा.

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