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श्मशान घाट से सटे झुग्गियों में रहने वाले धुएं और गंध में रहने को मजबूर

Published On :    27 Apr 2021   By : MN Staff
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मालूम हो कि झुग्गी कॉलोनी में करीब 900 झुग्गियां हैं, जिनमें 1500 लोग रहते हैं, जो पश्चिम पुरी श्मशान घाट से चंद मीटर की दूरी पर स्थित है. 38 वर्षीय कूड़ा उठाने वाली सरोज ने से कहा, यह बहुत डरावनी स्थिति है.



नई दिल्ली: पश्चिम दिल्ली के शहीद भगत सिंह कैंप में रहने वाले लोग अपने घर-बार छोड़कर गांव वापस जाने की तैयारी कर रहे हैं. इसकी वजह नजदीक के श्मशान घाट पर बड़े स्तर पर शवों का अंतिम संस्कार का होना बताया जा रहा है. इस पूरे इलाके में धुआं छा जाता है और बदबू का माहौल होता है. 


झुग्गी के निवासियों को इससे कोविड-19 महामारी के फैलने का भी खतरा सता रहा है. लोगों का कहना है कि श्मशान घाट के इतने नजदीक रहना कभी भी आसान नहीं था, जहां पहले एक दिन में तीन-चार शवों का दाह संस्कार किया जाता था, वहीं अब करीब 200-250 शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है. इलाके में रहने वाले लोगों का कहना है कि उनकी आंख शवों के जलने की गंध से खुलती है और वे रात में इसी स्थिति में सोती हैं.


मालूम हो कि झुग्गी कॉलोनी में करीब 900 झुग्गियां हैं, जिनमें 1500 लोग रहते हैं, जो पश्चिम पुरी श्मशान घाट से चंद मीटर की दूरी पर स्थित है. 38 वर्षीय कूड़ा उठाने वाली सरोज ने से कहा, यह बहुत डरावनी स्थिति है. हम एंबुलेंस को आते-जाते देखते रहते हैं और रात हो या दिन हो, गंध और धुआं लगातार बना रहता है. वह कहती हैं कि कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा भी रहता है और 24 घंटे तथा सातों दिन श्मशान घाट पर चिताओं के जलने से न दिमागी सुकून मिलता है और न नींद आती है. 
वहीं 14 अप्रैल की रात को स्लम कॉलोनी में आग लग गई थी, जिसमें कोई हताहत तो नहीं हुआ था, लेकिन 30 झुग्गियां जल गई थीं.


बता दें कि उत्तर प्रदेश और बिहार के कई अन्य लोग भी अपने गांव वापस जाने का मन बना रहे हैं. कई लोग तो पहले ही जा चुके हैं. कई निवासियों ने कहा कि पहले इतनी बुरी हालत नहीं थी, क्योंकि पहले अंतिम संस्कार श्मशान घाट के अंतिम छोर पर होता था, लेकिन दिल्ली में कोरोना वायरस के कारण मृतकों की संख्या बढ़ने के पूरे परिसर का इस्तेमाल किया जा रहा है. 


उन्होंने कहा कि जब लोगों ने इसका विरोध किया तो अधिकारियों ने बताया कि ऐसा करने का सरकार का आदेश है. सरोज तीन बच्चों समेत सात सदस्यीय परिवार के साथ रहती हैं. संक्रमण के मामले बढ़ने के कारण उनका कूड़ा उठाने का काम छूट गया है. उन्होंने कहा, कुछ दिन तो हम सिर्फ पानी पीते हैं तो कुछ दिन एनजीओ के जरिये खाना मिल जाता है. स्थिति बहुत डरावनी है.


समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक उन्होंने कहा, उन्हें डर है कि हम कोरोना वायरस ला सकते हैं. इसलिए हम गांव लौटना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए हमें पैसे खर्च करने पड़ेंगे. हमें गांव जाने के लिए 2,000-2,500 रुपये की आवश्यकता होगी. हम इसे कैसे वहन कर सकते हैं?’ एक अन्य 12 वर्षीय लड़की ने कहा कि कुछ के पास अपने गांव लौटने का विकल्प है, लेकिन उसके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. उनका परिवार यहां पर दशकों से रह रहा है. एक युवक ने कहा, हम कहां जाएंगे? अगर हम यह छोड़ देते हैं, तो हम क्या कमाएंगे? पहले से ही हमारी कमाई इस कोरोना महामारी में बहुत कम हो गई है.



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