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कोरोना काल में 30,000 से अधिक बच्चों ने अपने माता या पिता या दोनों को खोया : एनसीपीसीआर

Published On :    9 Jun 2021   By : MN Staff
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राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विभिन्न राज्यों से पांच जून तक प्राप्त जानकारी के अनुसार, कोरोना महामारी से करीब 30,071 बच्चों ने अपने माता-पिता में से किए एक या फिर दोनों को खोया है.



नई दिल्ली : राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विभिन्न राज्यों से पांच जून तक प्राप्त जानकारी के अनुसार, कोरोना महामारी से करीब 30,071 बच्चों ने अपने माता-पिता में से किए एक या फिर दोनों को खोया है. आयोग ने कहा कि महामारी के चलते इनमें से 26,176 बच्चों ने अपने माता-पिता में से किसी एक को खो दिया और 3,621 बच्चे अनाथ हो गए, जबकि 274 को उनके रिश्तेदारों ने भी त्याग दिया.


आयोग ने अदालत को बताया कि एक अप्रैल 2020 से पांच जून 2021 तक के ऐसे बच्चों के राज्यवार आंकड़े उसके बाल स्वराज पोर्टल पर दिए गए हैं, जिनके माता-पिता में से किसी की मौत हो चुकी है या वे माता-पिता दोनों को ही खो चुके हैं. महाराष्ट्र में सर्वाधिक प्रभावित बच्चों की संख्या 7,084 है.


सुप्रीम कोर्ट द्वारा संज्ञान लिए गए इस मामले में आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि अन्य राज्यों में भी बच्चे प्रभावित हुए, जिनमें उत्तर प्रदेश में 3,172, राजस्थान में 2,482, हरियाणा में 2,438, मध्य प्रदेश में 2,243, आंध्र प्रदेश में 2,089, केरल में 2,002, बिहार में 1,634 और ओडिशा में 1,073 बच्चे शामिल हैं. 


आयोग ने कहा कि प्रभावित होने वाले बच्चों में 15,620 लड़के, 14,447 लड़कियां और चार ट्रांसजेंडर शामिल हैं. इनमें से अधिकतर बच्चे आठ से 13 आयु वर्ग के हैं. एनसीपीसीआर ने कहा कि इस आयु वर्ग के 11,815 बच्चों को या तो छोड़ दिया गया या माता-पिता खो गए या अनाथ हो गए.


इसके अतिरिक्त 0-3 वर्ष की आयु के बीच के 2,902 बच्चे प्रभावित हुए, जबकि 4-7 वर्ष के समूह में 5,107 और 14-15 वर्ष आयु वर्ग में 4,908 बच्चे प्रभावित हुए. इसके अलावा 16-18 आयु से कम उम्र के प्रभावित बच्चों की संख्या 5,339 है. आयोग ने कहा कि इस हलफनामे में 31 मई को अदालत के सामने पेश किए गए आंकड़े भी शामिल हैं, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि 29 मई तक 9,346 बच्चे अनाथ हुए हैं.



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आयोग ने अदालत के समक्ष यह चिंता जाहिर की कि उसे ऐसी कई शिकायतें मिली हैं, जिसमें कई निजी संगठनों और लोगों द्वारा ऐसे बच्चों का आंकड़ा एकत्र किए जाने के आरोप लगाए गए हैं. ऐसे संगठन और लोग द्वारा प्रभावित बच्चों और परिवारों को मदद की पेशकश की गई है. आयोग ने कहा कि ऐसे लोग गोद लेने संबंधी कानून का पालन किए बिना बच्चा गोद लेने के इच्छुक परिवारों को इन्हें सौंप रहे हैं. आयोग ने कहा कि यहां किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत दी गई प्रक्रिया उल्लंघन कर ये सब किया जा रहा है.


सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि इन नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों के खिलाफ केंद्र एवं राज्य सरकारें कार्रवाई करें. इसके अलावा केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि कोरोना के कारण अनाथ हुए बच्चों के लिए हाल ही में शुरू की गई पीएम-केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना के बारे में अदालत को जानकारी देने की खातिर कुछ और समय चाहिए.


बता दें कि कोरोना काल में अनाथ हुए इन बच्चों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने दर्जनों योजनाओं का ऐलान किया है. लेकिन सवाल ये है कि क्या इन योजनाओं का फायदा इनके असली हकदारों तक पहुंच पाएगा? अनाथ बच्चों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की 9 बड़ी योजनाओं है. इस योजना का फायदा लेने के लिए पहले से ही मुसीबत में घिरे मासूमों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है?



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पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रेन योजना की घोषणा हो चुकी है. इसके लिए क्या जरूरी दस्तावेज चाहिए और जरूरतमंदों को चुनने की प्रक्रिया क्या होगी, इसकी जानकारी अभी सामने नहीं आई है. सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से अनाथ बच्चों की इस योजना का पूरा खाका पेश करने को कहा है. लेकिन मृत्यु प्रमाण पत्र में मौत की वजह न होने से मुश्किलें आ सकती है. 


मध्य प्रदेश सरकार की बाल सेवा योजना का लाभ लेने के लिए मृतक का नगर निगम से जारी मृत्यु प्रमाण पत्र चाहिए, जिसमें मौत का कारण कोविड-19 लिखा हो. कई मामलों में ऐसे प्रमाण पत्र मिलने में दिक्कत हो रही है। भोपाल के सांख्यिकी विभाग के रजिस्ट्रार अभिषेक सिंह ने अपने एक आदेश में कहा है कि मृत्यु प्रमाण पत्र पर मौत का कारण नहीं लिखा जाएगा. उनका तर्क है कि मौत का कारण डॉक्टर ही बता सकता है.



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