×
भारत /

शिक्षा पर आपातकालीन तालाबंदी

Published On :    12 Sep 2021   By : MN Staff
शेयर करें:


बच्चों की पढ़ाई पर गंभीर प्रतिकूल असर, शिक्षा से दूर होते ग्रामीण भारत के बच्चे ग्रामीण इलाकों में सिर्फ 8 फीसदी बच्चे कर रहे ऑनलाइन पढ़ाई : सर्वे



नई दिल्ली : कोरोना महामारी और लॉकडाउन ने देश को फिर से उस सदी में पहुंचा दिया है जिसमें केवल विशेष वर्ग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को ही अधिकार थे. जबकि, देश के मूलनिवासी बहुजनों को न तो शिक्षा का अधिकार था, न धन संपत्ति रखने का अधिकार था, न तो हथियार रखने का अधिकार था. यहां तक की उनको खाने-पीने, चलने-बोलने पर भी सख्त पाबंदी थी. यानी मूलनिवासी बहुजनों को मानवीय अधिकार भी नहीं दिए गए थे. वे जानवर से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर थे. 



कोविड-19 महामारी ने बच्चों की पढ़ाई पर गंभीर प्रतिकूल असर डाला है. ज्यादातर राज्यों के स्कूल 500 से ज्यादा दिन बंद रहे. एक स्कूल सर्वे में बताया गया है कि कैसे 17 महीने की स्कूल बंदी का बच्चों पर क्या असर पड़ा है, कैसे ग्रामीण भारत के बच्चे इस दौरान शिक्षा से दूर हो हो गए.



आज देश फिर से उसी काल के गाल में समा चुका है. वर्तमान समय में कोरोना महामारी के नाम पर लॉकडाउन घोषित करके सोशल डिस्टेंसिंग (सामाजिक दूरी) अर्थात एक तरह से मनुस्मृति के समय जो भेदभाव-छुआछूत अपने चरम थी आज फिर से सीमा चरम पार कर रही है. इसी तरह से मनुस्मृति ने शिक्षा के अधिकार से वंचित किया था आज भी कोरोना महामारी और लॉकडाउन के नाम पर स्कूल-कॉलेज बंद करके शिक्षा से वंचित कर रहे हैं. 


चूंकि, शासक जातियों के बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं जबकि, मूलनिवासी बहुजनों के बच्चों के ऑनलाइन के लिए कोई व्यवस्था नहीं है. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ग्रामीण इलाकों में सिर्फ 8 फीसदी बच्चे ही ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं.


गौरतलब है कि गरीब परिवारों के करीब 1,400 बच्चों के बीच हाल में किए गए एक सर्वेक्षण में पिछले डेढ़ साल से स्कूल बंद होने के गंभीर नतीजे सामने आए हैं. सर्वेक्षण में शामिल ग्रामीण स्कूलों के सिर्फ 8 फीसदी बच्चे और शहरों के 24 फीसदी बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे थे जबकि गांवों के महज 8 फीसदी और शहरों में 19 फीसदी बच्चे बिल्कुल पढ़ाई नहीं कर रहे थे. हैरानी की बात है कि शहरों में 42 फीसदी बच्चे ऐसे थे जो कुछ शब्दों से ज्यादा नहीं पढ़ सकते तो वहीं ग्रामीण भारत में हालात बदतर हैं यहां ऐसे बच्चों की आंकड़ा 48 फीसदी है.


अगर शहरों की बात करें तो शहरों में 23 फीसदी अभिभावक मानते हैं कि उनके बच्चों को ऑनलाइन पर्याप्त शिक्षा मिल रही है वहीं ग्रामीण भारत में ऐसा मानने वालों की संख्या महज 8 फीसदी है. गांवों के 75 फीसदी मानते हैं कि लॉकडाउन के दौरान उनके बच्चों की पढ़ने की क्षमता घट गई है वहीं ग्रामीण भारत के 97 फीसदी अभिभावक मानते हैं कि स्कूल दोबारा खुलने चाहिए. इस सर्व का पहला राउंड अगस्त 2021 में 1362 घरों के कक्षा एक से 8 तक के 1362 बच्चों में किया गया.


देश में प्राइमरी स्कूल पिछले 500 से ज्यादा दिन यानी करीब 17 महीने से बंद हैं. इस दौरान बहुत कम सुविधा संपन्न बच्चे घर के सुखद और सुरक्षित माहौल में ऑनलाइन पढ़ाई कर पाए. लेकिन, स्कूल में तालाबंदी के चलते बाकी बच्चों के पास कोई खास चारा नहीं था. कुछ ने ऑनलाइन और ऑफलाइन पढ़ाई के लिए संघर्ष किया तो कुछ ने पढ़ाई से हार मान लिया और कुछ काम धंधा न होने की वजह से गांव मोहल्ले में घूमते रहे. वो न केवल पढ़ने के अधिकार बल्कि स्कूल जाने से मिलने वाले दूसरे फायदों, सुरक्षित माहौल, बढ़िया पोषण, स्वस्थ सामाजिक जीवन से वंचित हो गए.


बता दें कि इस आपात रिपोर्ट में स्कूल चिल्ड्रेन ऑनलाइन एंड ऑफलाइन लर्निंग (स्कूल) सर्वे के नतीजों को पेश किया गया है. यह सर्वे अगस्त 2021 में 15 राज्यों किया गया, जिसमें असम, बिहार चंडीगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल (जिन्हें अब स्कूल प्रदेश कहा जाएगा). इस सर्वे में अपेक्षाकृत गरीब और वंचित बस्तियों पर ध्यान दिया गया. जहां अमूमन बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. सर्वे में शामिल 1362 परिवारों में से प्रत्येक प्राइमरी और अपर प्राइमरी में पढ़ने वाले एक-एक बच्चे से बात की.


सर्वे के नतीजे खासकर ग्रामीण इलाकों के लिए सबसे ज्यादा निराशाजनक हैं. ग्रामीण इलाकों में केवल 28 फीसदी बच्चे नियमित पढ़ाई कर रहे हैं. 37 फीसदी बिल्कुल नहीं पढ़ रहे हैं. इस सर्वे को वालंटियर ने अंजाम दिया है जो यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट हैं. 1400 परिवारों में से 60 फीसदी ग्रामीण भारत में रहते हैं और 60 फीसदी अनुसूचित जाति, अनु.जनजाति से हैं. इस रिपोर्ट में ग्रामीण और शहरी स्कूलों के आंकड़ों के साथ रखा गया है.


ऑनलाइन शिक्षा का अफसाना

स्कूल सर्वे ये बताया है कि ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच बहुत सीमित है. ग्रामीण इलाकों में महज 8 फीसदी ऑनलाइन पढाई कर रहे थे इसकी वजह ये है कि ग्रामीण भारत में आधे परिवारों (सैंपल में शामिल) के पास स्मार्टफोन नहीं है. जिन परिवारों में स्मार्टफोन हैं भी उनमें नियमित रूप से पढ़ाई करने वालों का शहर में अनुपात 31 तो गांव में 15 फीसदी है.


स्मार्टफोन अक्सर कामकाजी बड़े लोगों के पास होते हैं वो अक्सर छोटे बच्चों को नहीं मिल पाते हैं. सर्वे में पता चलता है कि महज 9 फीसदी के अपना मोबाइल था. खासकर ग्रामीण इलाकों में ये भी देखा गया है कि जो बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं उन्हें जो स्कूल से ऑनलाइन सामग्री भेजी जा रही है उसकी समझ नहीं है और बच्चों को भी ऑनलाइन पढ़ाई की समझ नहीं रही है या वो ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे.


ऑफलाइन अध्ययन बहुत कम

ऑफलाइन चिल्ड्रेन (जो बच्चे सर्वे के वक्त ऑफलाइन पढ़ाई कर रहे थे) इसके बहुत कम सबूत है कि वो नियमित अध्ययन कर रहे थे. उनमें से ज्यादातर या तो बिल्कुल नहीं पढ़ रहे या फिर कभी कभार घर पर खुद पढ़ लेते हैं. असर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में तालेबंदी के दौरान ऑफलाइन पढ़ाई के लिए कुछ नहीं किया गया. 


कर्नाटक, महाराष्ट्र पंजाब और महाराष्ट्र में कुछ प्रयास जरूर किए गए. मिसाल के तौर पर ऑफलाइन चिल्ड्रन को वर्कशीट दिए गए और या फिर शिक्षकों को समय-समय पर जाकर उनसे मशविरा करने के निर्देश दिए गए. ऑफलाइन पढ़ाई के मुख्य माध्यम (मुख्यतः शहरी इलाकों में) प्राइवेट ट्यूशन थे और ज्यादातर मामलों में परिवार के किसी सदस्य या सदस्य के बगैर पढ़ाई चल रही थी. लेकिन, घर पर पढ़ाई नियमित नहीं थी.


प्राइवेट स्कूलों से पलायन

मार्च 2020 में जब लॉकडाउन शुरू हुआ था 20 फीसदी स्कूल चिल्ड्रन ने किसी प्राइवेट स्कूल में एडमिशन ले रखा था. इस दौरान कई स्कूलों ने ऑनलाइन शिक्षा अपनाकर उबरने का प्रयास किया और फीस लेना जारी रखा. गरीब परिवार आमदनी कम होने या फिर ऑनलाइन शिक्षा के कारगर न होने की वजह से अक्सर फीस और दूसरे खर्च (स्मार्ट मोबाइल और रिचार्ज) के लिए आनाकानी करते रहे. शायद मुख्यतः इसी वजह से कई बच्चों ने सरकारी स्कूलों में दाखिला ले लिया. सर्वे में शामिल 26 फीसदी बच्चे पहले प्राइवेट में शामिल थे फिर सरकारी स्कूलों में पढ़ने लगे.



PAY BACK TO THE SOCIETY NATIONWIDE AGITATION FUNDDonate Here



संपर्क करें

आपके पास अगर कोई महत्वपुर्ण जानकारी, लेख, ओडीयो, विडीयो या कोई सुझाव हैै तो हमें नीचे दिये ई-मेल पर मेल करें.:

email : news@mulniwasinayak.com


MN News On Facebook

लोक​प्रिय
मोदी के संबोधन के दौरान संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के बाहर
योगी सरकार ने 25 रूपये बढ़ाया गन्ने का एमएसपी, राकेश टिकैत न
जातीनिहाय जनगणना तेजस्वी ने विपक्षी नेताओं को लिखा पत्र,
राज्य समानता और गैर-भेदभाव के सिद्धांतों को लागू करने के
बिहार में मोदी के जन्मदिन पर अधिक टीकाकरण दिखाने के लिए आ
सुप्रीम कोर्ट ई-मेल्स पर दिखी पीएम की तस्वीर और सरकार का न
क्यूएस रैंकिंग : दुनिया के टॉप 100 संस्थानों में भारत का एक
ब्रिटिश सांसदों ने ‘कश्मीर में मानवाधिकार’ पर चर्चा के ल
52 फीसदी ओबीसी के साथ धोकेबाजी, इस बार भी नहीं होगी पिछड़े वर
पेगासस जासूसी मामले में केंद्र को झटका, जांच के लिए सुप्र
गैर भाजपा शासित राज्यों के राज्यपाल पैरों तलें कुचल रहे
यूपी में प्रति व्यक्ति आय घट कर हुई एक तिहाई, अखिलेश और मा
नीतीश कुमार डरपोक मुख्यमंत्री, बीजेपी नेता पर कार्रवाई क
भोपाल जेल में बंद कथित सिमी के चार कार्यकर्ताओं को सुप्र
स्कॉलरशिप से अध्ययन के लिए विदेश भेजने वाला पहला राज्य ब
बीजेपी अब एक सियासी दल नहीं झूठे प्रचार की ट्रेनिंग का अन
अडानी द्वारा संचालित मुंद्रा पोर्ट पर पकड़ी गई 21 हजार करोड़
दिल्ली दंगेः आगजनी और लुटपाट के मामले में 10 बरी, कोर्ट ने फ
केंद्र ने हाईकोर्ट में कहा, आरटीआई के तहत नहीं आता पीएम के
असम की भाजपा सरकार ने अतिक्रमण का आरोप लगाकर गिराए मकान, 800
COPYRIGHT

All content © Mulniwasi, unless otherwise noted or attributed.


ABOUT US

It is clear from that the lack of representation given to our collective voices over so many issues and not least the failure to uphold the Constitution - that we're facing a crisis not only of leadership, but within the entire system. We have started our “Mulnivasi Nayak“ on web page to expose the exploitation and injustice wherever occurring by the brahminical forces & awaken the downtrodden voiceless & helpless community.

Our Mission

Media is playing important role in democracy. To form an opinion is the primary work in any democracy. Brahmins and Banias have controlled the fourth pillar of the democracy, by which democracy is in danger. We have the mission to save the democracy & to make it well advanced in common masses.

© 2018 Real Voice Media. All Rights Resereved
 e - Newspaper