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ब्राह्मण साथ आएगा, बसपा सरकार बनाएगी, बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्र का दावा

Published On :    13 Sep 2021   By : MN Staff
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उत्तर प्रदेश में चुनावी चौसर बिछ चुकी है. सभी पार्टियों ने अपने-अपने दांव चलने शुरू कर दिए हैं. उप्र में चार बार सत्ता के शिखर तक पहुंच चुकी बसपा ने भी अपनी तैयारियों को धार देनी शुरू कर दी है.



नई दिल्ली : उत्तर प्रदेश में चुनावी चौसर बिछ चुकी है. सभी पार्टियों ने अपने-अपने दांव चलने शुरू कर दिए हैं. उप्र में चार बार सत्ता के शिखर तक पहुंच चुकी बसपा ने भी अपनी तैयारियों को धार देनी शुरू कर दी है. इस चुनाव में बसपा की रणनीति पर बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र ने दावा किया है कि अगले विधानसभा चुनाव में भी बसपा सरकार बनाएगी. उन्होंने यह दावा अमर उजाला के साथ बातचीत में किया.


उन्होंने कहा हमारा फार्मूला पूरी तरह से 2007 की तरह ही है, जिसे सोशल इंजीनियरिंग कहा गया. सर्वसमाज को जोड़कर ही हम सत्ता के शिखर तक पहुंचेंगे. ब्राह्मणों के बसपा के साथ जुडने के उन्होंने दो कारण बताए. इसके दो बड़े कारण हैं. पहला यूपी में ब्राह्मणों का उत्पीड़न होना है। एक व्यक्ति के नाम पर कई ब्राह्मणों को एनकाउंटर में मारा गया. दर्जनों को प्रताड़ित किया. काडर वोट नाराज होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि काडर वोटर तो खुश है क्योंकि उसे पता है कि यह समीकरण तगड़ा है। बसपा का काडर वोट सबसे ज्यादा प्रबुद्घ वर्ग सम्मेलन में ब्राह्मणों को लेकर आया.


दरअसल कई ऐसे कारण हैं, जिनसे लगता है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण कार्ड मायावती के लिए उतना कारगर साबित नहीं होने वाला, जितना कि वह पंद्रह साल पहले हुआ था. उस वक्त ब्राह्मणों के बसपा के साथ आने की वजहें थीं. उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों ने यादवों के वर्चस्व वाली समाजवादी पार्टी को रोकने के लिए, मायावती के साथ होने का फैसला किया था, जिनके पास दलितों का भारी समर्थन था. उस फैसले की एक वजह यह भी थी कि ब्राह्मण समुदाय तब यादवों के नेता मुलायम सिंह यादव को अपने लिए एक बड़ा खतरा मानता था. 


लेकिन तब से अब तक उत्तर प्रदेश में बहुत कुछ बदल चुका है. एक तो यही कि मायावती और उनकी पार्टी अब अपने सुनहरे अतीत की छाया भी नहीं रह गई हैं. इसके अलावा न केवल गैर जाटव सहित दूसरी निचली जातियों में बहनजी का असर कम हुआ है, बल्कि जो जाटव उनके मुख्य वोटर थे, उसकी युवा पीढ़ी भी अब बसपा से नहीं जुड़ रही है.



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फिर जहां तक मुस्लिम मतदाताओं के बीच बहनजी के प्रभाव की बात है, तो यह याद रखना चाहिए कि पिछले विधानसभा चुनाव के समय मायावती ने खुद मुसलमानों को रिझाने की पहल की थी. लेकिन मुस्लिमों के बीच मायावती का असर अब नगण्य रह गया है. इसकी वजह मुस्लिम समुदाय में पनपी यह धारणा है कि बहनजी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. सतीश चंद्र मिश्र ने रामलला की आराधना करने के बाद अयोध्या से प्रबुद्ध सम्मेलन की जिस तरह शुरुआत की, उससे मुस्लिमों की बसपा के बारे में बनी यह धारणा और मजबूत ही हुई है.


लखनऊ स्थित एक राजनीतिक विश्लेषक ने, जो संयोग से ब्राह्मण हैं, ने यह कहा, आज मायावती की छवि विजेता जैसी कतई नहीं है. यही कारण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा ठाकुरों को वरीयता देने और भाजपा के ब्राह्मण वोटों की उपेक्षा करने के कारण राज्य का ब्राह्मण समुदाय भाजपा को विधानसभा चुनाव में सबक तो सिखाना चाहता है, लेकिन वह यह भी महसूस करता है कि आगामी चुनाव में मायावती की तुलना में अखिलेश यादव भाजपा को पराजित करने में कहीं अधिक सक्षम हैं, इसलिए भाजपा से रूठा हुआ ब्राह्मण समुदाय बसपा के साथ जाने के बजाय सपा के साथ जाना पसंद करेगा.



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दूसरी तरफ राज्य के एक चर्चित दलित विश्लेषक का यह मानना है कि सतीश चंद्र मिश्र के नेतृत्व में हो रहे प्रबुद्ध सम्मेलनों की वजह से दलितों का बसपा से मोहभंग आने वाले दिनों में और व्यापक आकार लेगा. अनेक दलितों का यह भी मानना है कि बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की प्रमुख दलित वैचारिकता से पीछे हटते हुए प्रबुद्ध सम्मेलनों का आयोजन कर सतीश चंद्र मिश्र पार्टी सुप्रीमो मायावती को गुमराह ही कर रहे हैं.



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