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केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने जातिगत गणना का किया समर्थन

Published On :    13 Sep 2021   By : MN Staff
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केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने रविवार को कहा कि वह विभिन्न समुदायों की वास्तविक संख्या का पता लगाने के लिए जातिगत जनगणना कराने के पक्षधर हैं.



चेन्नई : केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने रविवार को कहा कि वह विभिन्न समुदायों की वास्तविक संख्या का पता लगाने के लिए जातिगत जनगणना कराने के पक्षधर हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रावधान से मौजूदा आरक्षण प्रणाली प्रभावित नहीं होगी.


विभिन्न वर्गों द्वारा आरक्षण की मौजूदा सीमा को बढ़ाने की मांग के बारे में पूछे गए सवाल पर अठावले ने कहा, तमिलनाडु में विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सबसे अधिक 69 प्रतिशत आरक्षण है. पूरे देश में ऐसे कई तबके हैं, जो आरक्षण बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. चेन्नई के दौरे पर आए अठावले ने पत्रकारों से कहा, मैं व्यक्तिगत रूप से जातिगत गणना के पक्ष में हूं, लेकिन यह फैसला प्रधानमंत्री पर निर्भर करता है.


बता दें कि हर 10 साल में जाति जनगणना होनी ही चाहिए. इससे ओबीसी की संख्या पता चलेगी. इस वर्ग में अलग-अलग जातियों की आर्थिक हैसियत क्या है, कैसी शिक्षा मिली है और दूसरी डेमोग्राफिक जानकारियां भी मिलेंगी. जाति जनगणना से पता चलेगा कि कहीं आरक्षण का लाभ कुछ ओबीसी जातियों को तो नहीं मिल रहा है? और कौन सी जातियां हैं, जिन्हें इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है? एससी-एसटी के बारे में इस तरह की जानकारी मिलने से सरकार को नीतियों में बदलाव करने का आधार मिला. नीतियां बदलकर कोशिश की गई कि दोनों ही समूहों में अलग-अलग जातियों को बराबरी का लाभ मिल सके.


इसीलिए पिछड़ा वर्ग आयोग ने जाति जनगणना की सिफारिश की और सामाजिक न्याय मंत्रालय की संसदीय समिति ने इसे माना. फिर भी बीजेपी सरकार इसका विरोध कर रही है या कम से कम उसने अपने इरादे नहीं बताए हैं। ओबीसी जनगणना की मांग को लेकर बिहार से एक डेलीगेशन हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिला। इस डेलीगेशन में नीतीश कुमार और उनके राजनीतिक विरोधी तेजस्वी यादव दोनों ही शामिल थे. हमें बताया गया कि प्रधानमंत्री इस मांग पर सोच-विचार कर रहे हैं, लेकिन संबंधित मंत्री ने संसद में दो टूक कहा कि सरकार ऐसी जनगणना नहीं कराएगी.



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ओबीसी जनगणना की मांग जायज है, फिर बीजेपी इसके खिलाफ क्यों है? इसके पक्ष में एक तर्क यह दिया जा सकता है कि जाति जनगणना का काम बहुत मुश्किल है, लेकिन इस दलील में दम नहीं. जब एससी-एसटी की जनगणना की जा सकती है तो ओबीसी की क्यों नहीं! हद से हद इसके लिए जनगणना से जुड़े सवालों में एक और कॉलम जोड़ना होगा. जाति जनगणना के विरोध में यह तर्क भी दिया जाता है कि इससे सामाजिक तनाव बढ़ेगा. यह भी खोखली बात है.


क्या देश की जमीनी हकीकत और अगड़ी जातियों की सोच के बीच कोई मेल है? सचाई तो यह है कि देश की कुल आबादी में अगड़ी जातियां 20 प्रतिशत हैं, लेकिन पावर और प्रिविलेज में उनकी हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है। जाति जनगणना से उनके इस दबदबे को चुनौती मिल सकती है और यह ठीक ही होगा. सामाजिक गैर-बराबरी बहुत ज्यादा है, जिसे दूर करने के लिए जाति जनगणना की जरूरत है.



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