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किसानों के ग़ुस्से के आगे नहीं चला मोदी का सख्त मिज़ाज, कृषि कानून वापसी पर वॉशिंगटन पोस्ट का तंज

Published On :    21 Nov 2021   By : MN Staff
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जिस तरह किसानों के प्रदर्शन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिली थीं. उसी तरह पीएम मोदी के कानून वापसी की घोषणा के बाद लग रहा था कि इसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिलेंगी.



नई दिल्ली : जिस तरह किसानों के प्रदर्शन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिली थीं. उसी तरह पीएम मोदी के कानून वापसी की घोषणा के बाद लग रहा था कि इसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां मिलेंगी. प्रधानमंत्री मोदी ने जैसे ही कानून वापसी की घोषणा की वैसे ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस ख़बर को प्रमुखता से अपने यहां जगह देनी शुरू कर दी. 


अमेरिका के मीडिया समूह सीएनएन ने लिखा कि सालभर लंबे प्रदर्शनों के बाद भारत के प्रधानमंत्री कृषि क़ानूनों को वापस लेंगे. आगे लिखा, प्रमुख राज्यों के चुनावों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  कृषि क़ानून वापस लेंगे. अगले साल सात राज्यों में चुनाव होने हैं, जहाँ मोदी की बीजेपी सत्ता में आना चाहेगी. इनमें मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश भी है. ग़ुस्साए किसानों के कारण मोदी बड़ी संख्या में वोट गंवा सकते थे.


अशोका विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर जाइल्स वर्नियर्स ने सीएनएन से कहा कि पीएम मोदी का यह क़दम बेहद दुर्लभ राजनीतिक पल है जो बहुत ही महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा, जो समय है वो इशारा करता है कि वो चुनावी उद्देश्य से है. ये कृषि क़ानून एक साल लंबे प्रदर्शनों के बाद वापस लिए जा रहे है. इस दौरान किसानों ने सर्दी, गर्मी, प्रदूषण, हिंसा जैसी बहुत कठिनाइयां देखी हैं. वर्नियर्स कहते हैं कि पीएम मोदी को इस फ़ैसले को एक उपकार के तौर पर बेच पाने में काफ़ी मुश्किलें आएंगी.


अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि किसानों के ग़ुस्से के आगे मोदी का सख्त मिज़ाज नहीं चला. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पीछे हटने के लिए नहीं जाने जाते. इसलिए इसका ख़ास महत्व है. पीएम मोदी की सात साल की सत्ता में यह गंभीर राजनीतिक झटका है. 


अखबार ने लिखा पिछले साल लिए गए फ़ैसले का उद्देश्य पीएम मोदी ने बताया था कि इससे दशकों पुराना राज्य द्वारा संचालित थोक बाज़ार समाप्त होगा और लोग निजी तौर पर अपनी फ़सल बेच सकेंगे. यह क़ानून बिना चर्चा के लागू किया गया और इस पर तुरंत विवाद खड़ा हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी तौर पर क़ानूनों को निलंबित कर दिया लेकिन प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे. किसान भयंकर सर्दी, गर्मी और कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान डटे रहे. प्रदर्शनकारी किसानों का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान 750 से अधिक किसानों की मौत हुई.


मोदी बिना किसी राजनीतिक परिणाम के जबरन विवादित फ़ैसले लागू करने के लिए जाने जाते हैं. 2016 में बिना किसी चेतावनी के उन्होंने नोटबंदी लागू कर दिया था. जब महामारी आई तो बिना किसी नोटिस के कुछ ही घंटों के अंदर लॉकडाउन लगाने की घोषणा कर दी.


न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, मोदी भारत के किसानों के आगे झुके. लिखा सात सालों से नरेंद्र मोदी का भारत की राजनीति पर वर्चस्व कायम है. प्रधानमंत्री अपनी नाटकीय और नुक़सानदेह नीतियों को आगे बढ़ाते हैं लेकिन शुक्रवार को मोदी वैसे नहीं दिखे जैसे प्रभावशाली दिखते थे.


मोदी पर आलोचनाओं का कोई फ़र्क नहीं पड़ता है लेकिन इसने संकेत दिया कि कई समस्याओं के बीच उनकी स्थिति कमज़ोर हुई है. कुछ सर्वे के अनुसार पीएम मोदी काफ़ी प्रसिद्ध हैं और अव्यवस्थित विपक्ष के कारण ऐसा असंभव है कि वो सत्ता हार पाएंगे. लेकिन भाजपा को पश्चिम बंगाल के चुनाव में काफ़ी झटका लगा. साथ ही सर्वे बताते हैं कि यूपी जैसे महत्वपूर्ण राज्य में उनकी बढ़त कमज़ोर हो रही थी. जहां चुनाव होने वाले है.


अमेरिकी अख़बारों के अलावा हॉन्ग कॅन्ग के मशहूर अख़बार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है महीनों लंबे प्रदर्शन के बाद भारतीय प्रधानमंत्री कृषि कानूनों को ख़त्म करेंगे जो आश्चर्यजनक है. आगे लिखा है कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह चौंकाने वाला यू-टर्न उनके राजनीतिक करियर की एक महत्वपूर्ण हार है.


राजनीतिक विश्लेषक आरती जेराथ अख़बार से कहती हैं कि यह फ़ैसला अभूतपूर्व है क्योंकि मोदी जब कोई फ़ैसला ले लेते हैं तो फिर उसे वापस नहीं लेते. जेराथ का मानना है कि यह फ़ैसला रणनीतिक है और यह  डर से लिया गया है क्योंकि बीजेपी को अगले साल उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों में झटका लग सकता है. दोनों राज्यों के किसान इन क़ानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे. ख़ासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का कहना था कि वो फ़रवरी में होने वाले चुनाव में बीजेपी को हराएंगे. जेराथ कहती हैं कि मोदी की पार्टी उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में सत्ता बचाने को बेकरार है.



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