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यूपी के चुनाव में हार और पार्टी को 2004 की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए सरकार ने लिए कदम पीछे

Published On :    23 Nov 2021   By : MN Staff
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कृषि कानूनों के वापस लेने के फैसले को सियासी दांव करार दिया जा रहा है. खासकर अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव से इसे जोड़ा जा रहा है.



नई दिल्ली : मोदी सरकार के कृषि कानूनों के वापस लेने के फैसले को सियासी दांव करार दिया जा रहा है. खासकर अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव से इसे जोड़ा जा रहा है. दरअसल पश्चिमी यूपी की 110 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर किसानों का दबदबा है. इन इलाकों में किसान आंदोलन का प्रभाव भी काफी है. खुद राकेश टिकैत इन्हीं इलाकों से आते हैं. किसान आंदोलन के बाद से इन इलाकों में बीजेपी का काफी विरोध हो रहा है.


पश्चिमी यूपी के 14 जिलों में 71 विधानसभा सीटों पर जाट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इसी समुदाय से टिकैत आते हैं. भाजपा ने 2017 के चुनाव में 51 पर जीत हासिल की थी. कभी इस इलाके में राष्ट्रीय लोक दल की तूती बोलती थी, जाट समुदाय इसी पार्टी को वोट देते थे, लेकिन 2017 में उसे सिर्फ एक सीट मिली. इस बार, रालोद-सपा गठबंधन किसान आंदोलन के कारण भाजपा की सीटों पर सेंध लगाने की उम्मीद कर रहा है. बीजेपी के स्थानीय नेतृत्व भी इस कानून वापसी के फायदे और नुकसान पर दो धड़ों में बंटा है.


यह भी पढ़ें: सत्यपाल मलिक बोले- पीएम मोदी कानून वापस नहीं लेते तो जनरल डायर व इंदिरा गांधी जैसा हाल होता 


आम तौर पर सबका यही मानना है कि 2022 में प्रस्तावित उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर विधानसभा के चुनावों में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने ये कदम उठाया है. लेकिन भाजपा के भीतरी सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह अप्रत्याशित कदम 2022 की चुनावी हार से बचने के लिए नहीं बल्कि 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के बुरी तरह से सफाए की आशंका को देखते हुए उठाया गया है. क्योंकि 2024 में लोकसभा चुनावों की जीत का रास्ता विशेषकर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजों के भीतर से निकलेगा.


यह बात किसी और ने नहीं खुद गृह मंत्री अमित शाह ने अपने लखनऊ दौरे के दौरान एक जनसभा में कही जब उन्होंने कहा कि अगर मोदी जी को 2024 में फिर से प्रधानमंत्री बनाना है तो उसके लिए 2022 में उत्तर प्रदेश में योगी जी को मुख्यमंत्री बनाना होगा. और किसान आंदोलन की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सवा सौ विधानसभा सीटों पर भाजपा के समीकरण बिगड़ चुके हैं और लखीमपुर खीरी की हिंसक घटना की आंच तराई से होते हुए मध्य व पूर्वी उत्तर प्रदेश तक पहुंचने की आशंका बढ़ गई है.


इस जमीनी हकीकत की खबरें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भी पहुंचनी शुरू हो गई. रही सही कसर हाल ही में हुए उपचुनावों के नतीजों ने पूरी कर दी. इन नतीजों ने जिनमें हिमाचल में एक लोकसभा और तीन विधानसभा सीटों पर भाजपा की हार, राजस्थान की दोनों विधानसभा सीटों पर भाजपा का तीसरे और चौथे नंबर पर खिसकना, महाराष्ट्र और कर्नाटक की विधानसभा सीटों पर हार, मध्य प्रदेश में रैगांव जैसी भाजपा की मजबूत सीट पर कांग्रेस का जीत जाने का संकेत था कि जमीन पर सब कुछ ठीक नहीं है.


पीएमओ से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक आशंका यहां तक बढ़ने लगी कि अगर इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरता रहा तो लोकसभा चुनावों में भारी चुनौती खड़ी हो जाएगी और विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार से उत्साहित विपक्ष एकजुट हुआ तो 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का बुरा हाल हो सकता है. इसमें आखिरी कील ठोंकी मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जब उन्होंने कहा कि अगर किसान आंदोलन जारी रहा तो न सिर्फ भाजपा यूपी के चुनावों में हारेगी बल्कि लोकसभा चुनावों में भी इस कदर साफ होगी कि संसद में भाजपा ढूंढ़े नहीं मिलेगी.


इन खबरों ने उन्हे बेहद विचलित किया और इसके बाद आनन-फानन में उन्होंने तय किया कि फिलहाल किसानों को संतुष्ट करने के लिए तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लेना चाहिए. पीएम मोदी का आकलन है कि उनके इस फैसले से किसानों का असंतोष खत्म होगा और थोड़ा बहुत गुस्सा रहा भी तो उसका असर विधानसभा चुनावों तक ही होगा. उसके बाद उनके पास करीब दो से ढाई साल का वक्त है जिसमें एक बार वह फिर अपनी लोकप्रियता स्थापित कर 2024 में फिर कोई नया चुनावी दांव चल कर पार्टी को 2004 की पुनरावृत्ति से बचा सकते हैं. इसलिए उन्होंने यह कदम 2022 से ज्यादा 2024 के लिए उठाया है.


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