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न्यू इंडिया में सफाई कर्मचारियों की मौत जारी, कानपुर में सीवर कि सफाई करने उतरे तीन मज़दूरों की गई जान

Published On :    21 Sep 2022   By : MN Staff
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रात-दिन पीट रहे ‘न्यू इंडिया’ के डंका के बीच भारत में सीवर में सफाईकर्मियों के दम तोड़ने का सिलसिला जारी है.



कानपुर : रात-दिन पीट रहे ‘न्यू इंडिया’ के डंका के बीच भारत में सीवर में सफाईकर्मियों के दम तोड़ने का सिलसिला जारी है. इसी महीने के दूसरे सप्ताह में रोहतक में आईएमटी स्थित वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में सेफ्टी टैंक की सफाई के लिए उतरे दो युवकों की मौत हो गई थी. अब ऐसी ही घटना यूपी के कानपुर जिले से सामने आई है.


कानपुर जिले के बर्रा इलाके में रविवार को एक निर्माणाधीन मकान में बन रहे ‘सेप्टिक टैंक’ की जहरीली गैस के संपर्क में आने से तीन मजदूरों की मौत हो गई. पुलिस के अनुसार, बर्रा इलाके में स्थित मालवीय नगर में बाल गोविंद नामक एक ठेकेदार एक मकान बनवा रहा था. उन्होंने बताया कि इसके निर्माण में शिवा तिवारी, अंकित पाल और अमित कुमार नामक मजदूर भी लगे थे. उन्होंने बताया कि ये तीनों मजदूर मकान के निर्माणाधीन सेप्टिक टैंक के अंदर गए थे कि इसी दौरान जहरीली गैस के संपर्क में आने से वे बेहोश हो गए.


एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, ठेकेदार ने उन तीनों को बचाने की कोशिश की लेकिन सांस लेने में तकलीफ होने पर वह बाहर आ गया. कुमार ने बताया कि सूचना मिलने पर पुलिस ने मौके पर पहुंचकर तीनों मजदूरों को बाहर निकलवाया लेकिन तब तक शिवा की मौत हो चुकी थी. उन्होंने बताया कि अंकित और अमित को रीजेंसी अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. उन्होंने बताया कि इस घटना के बाद मृतकों के परिजनों ने सड़क रास्ता जाम कर हंगामा किया, लेकिन पुलिस ने कार्रवाई किये जाने का आश्वासन देकर उन्हें समझाया. उन्होंने बताया कि परिजनों की तहरीर मिलने पर मामला दर्ज करके आवश्यक कार्रवाई की जाएगी.


बता दें कि विकसीत देशों में सेफ्टी टैंक की सफाई मशीनों द्वारा की जाती है, लेकिन न्यू इंडिया में आज की लोग अपनी जान जोखिम में ड़ालकर सीवर की सफाई करते है और सफाई के दौरान सफाइकर्मियों की मौत हो जाती है. यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. खास बात यह है कि भारत में हाथ से मैला ढोने पर प्रतिबंध है, लेकिन यह प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है. अब तक सीवर सफाई के दौरान कई सफाईकर्मियों की मौत हो चुकी है. संसद में दी गई एक जानकारी के अनुसार, सेप्टिक टैंक और सीवर साफ करने के दौरान पिछले तीन वर्ष में 188 लोगों ने अपनी जान गंवाई है.


इस मुद्दे पर सफाई कर्मचारी आंदोलन चलाने वाले वेजवाड़ा विल्सन का कहना है कि समस्या यह है कि केंद्र और राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश का गंभीरता से पालन नहीं कर रही हैं. दोनों सरकारें सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान नहीं कर रही हैं. विल्सन कहते हैं, दिल्ली में सीवर लाइन कई किलोमीटर तक फैली हुई है, शहर के लिए सरकार को व्यापक कार्य योजना बनानी होगी ताकि सीवर लाइन में इस तरह के हादसे ना हो. लेकिन समस्या यह है कि दोनों सरकारों के लिए दलितों की जिंदगी कोई मायने नहीं रखती है. सरकार तो सीवर में होने वाली मौत की भी जिम्मेदारी नहीं लेती है. वह ठेकेदार पर ही इसका ठीकरा फोड़ती है.


सीवर सफाई करने के लिए जो मजदूर भूमिगत नालों में उतरते हैं उन्हें बहुत कम पैसे दिए जाते हैं और कई बार सीवर सफाई के ठेकेदार अपने कर्मचारियों को बिना सुरक्षा उपकरण के ही काम करने को मजबूर करते हैं. उनके अनुसार 2020 तक सेप्टिक टैंकों में 1876 मौतें हो चुकी हैं. वे कहते है कोर्ट की सख्ती के बाद सरकारी एजेंसियों ने मशीनें भी खरीदी हैं लेकिन गैरसरकारी स्तर पर ठेकेदार इंसानों से सीवर की सफाई करा रहे हैं. विल्सन कहते हैं, देश में दलितों की सुरक्षित जिंदगी को सरकार पूरी तरह से नजरअंदाज कर रही है.


मैनुअल स्केवेंजिग को खत्म करने वाला पहला कानून 1993 में बना. उसके बाद 2013 में बने मैनुअल स्कैवेंजिंग कानून तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में भेजना पूरी तरह से प्रतिबंधित है. अगर किसी खास परिस्थति में सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजे जाने पर कई नियमों का पालन करना होता है. सफाईकर्मी को सीवर में उतारने के लिए इंजीनियर से इजाजत और पास में ही एंबुलेंस की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि आपात स्थिति में सफाईकर्मी को अस्पताल ले जाया जा सके. इसके अलावा सफाईकर्मी की सुरक्षा के लिए ऑक्सीजन मास्क, रबड़ के जूते, सेफ्टी बेल्ट, रबड़ के दस्ताने, टॉर्च आदि होने चाहिए. लेकिन देश में बिना सुरक्षा उपकरणों के सफाईकर्मी सीवर में अपनी जान देने को मजबूर हैं.


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